हरेला तो बर्बाद हो रही प्रकृति को सँवारने का प्रयास होना चाहिये
पर्यावरण की उलटबांसियाँ – 3 प्राकृतिक संसाधन मनुष्य के अस्तित्व का आधार हैं, इसीलिए ये किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नहीं हो सकते। इन्हें कॉमन पूल रिसोर्सेज (कॉमन्स) कहते हैं। साझे प्राकृतिक संसाधन या कॅामन्स की परिभाषा करना आसान नहीं है। कॉमन्स न तो सरकारी संपत्ति है न सार्वजनिक। न ये कोई वाणिज्यिक परिसर [...]
जंगल जल रहे हैं और कहीं कोई बंसी बजा रहा है !
पर्यावरण की उलटबांसियाँ – 2 इस साल उत्तराखण्ड के जंगल बहुत अधिक जले हैं। पिछले सालों में भी आग लगती थी, पर मई या जून की शुरूआत में बारिश हो जाने से नुकसान उतना नहीं होता था। उत्तराखण्ड का वन विभाग बड़े गर्व के साथ घोषणा करता है कि उत्तराखण्ड के 65 प्रतिशत से अधिक [...]
गंगा में पाप धोने जैसा पाखण्ड है वृक्षारोपण
पर्यावरण की उलटबांसियाँ – 1 विनोद अरविन्द यह विडंबना है कि पर्यावरण को जिस तरह समझा जाना चाहिये, नहीं समझा जा रहा है। जिस तरह लिखा जाना चाहिये नहीं लिखा जा रहा है। कहीं पर पर्यावरण व्यापार है तो कहीं पर जन सामान्य को डराने का औजार। जैसी चर्चा पर्यावरण को लेकर होनी चाहिये, नहीं [...]
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