बीते दिनों हल्द्वानी शहर में भारी अफरातफरी का माहौल रहा। अपनी माँगों को मनवाने के लिए जिस अराजकता का रास्ता नगर में चलने वाले टैम्पो चालकों ने अपनाया और उस अराजकता को रोकने में प्रशासन जिस तरह नाकाम रहा वह स्थापित व्यवस्था के सामने एक चुनौती भरा सवाल भी छोड़ जाता है। नगर में सिटी बसों के संचालन के विरोध में टैम्पो चालकों द्वारा की गई हड़ताल जायज है या नहीं, इस बात पर चर्चा से पूर्व यह माना जा सकता है कि उन्हें अपनी बात रखने का पूरा हक है, लेकिन यह अपने हक की कैसी लड़ाई है जो अराजकता की हदें पार कर जाए। और इससे भी अधिक चिन्ता की बात यह है कि इस अराजकता को रोक पाने में पुलिस और प्रशासन पूरी तरह नाकाम साबित हुआ। टैम्पो चालकों ने इंटर सिटी बसों से यात्रियों को उतार दिया और बसों के चालक-परिचालकों के साथ मार-पीट शुरू कर दी। इस मार-पीट के विरोध में इंटर सिटी बस यूनियन के पदाधिकारियों ने कोतवाली का घेराव कर दिया और बसें कोतवाली के पास खड़ी कर दीं। भीषण गर्मी में चालक-परिचालकों को बसों से उतार कर न केवल पीटा गया, बल्कि सवारियों में इस अराजकता के कारण भगदड़ मच गई। सवारियाँ कुछ समझ पायें, इससे पहले ही टिड्डियों का सा दल बसों में तोड़-फोड़ करने लगा। बूढ़ी महिलायें, चलने में असमर्थ बुजुर्ग, छोटे-छोटे बच्चे, चिलचिलाती धूप में तपती सड़क में हाँफते रहने के लिए छोड़ दिए गए। परीक्षाओं के चलते दूर से आने वाले छात्र-छात्राओं को भी इस अफरातफरी का शिकार होना पड़ा। खतरा यह भी कि सैकड़ों की तायदाद में मरने-मारने पर उतारू हो आए लोगों की यह कार्यवाही कब बलवे का रूप धारण न कर ले।
यही नहीं इस अराजकता के समर्थन में रोडवेज कर्मचारी संगठन, मैटाडोर एवं विक्रम संचालक भी उतर आए। जो टैम्पो चालक इधर-उधर सवारियाँ ढोते देखे गए उन्हें भी हड़ताली लोगों की नोक-झोंक का सामना करना पड़ा और सवारियों की फजीहत अलग से। उन्होंने एस.डी.एम. कोर्ट के समक्ष परिवहन मंत्री बंशीधर भगत का पुतला भी फूँक दिया। इस अराजक माहौल को रोकने के साथ जन-सुरक्षा और व्यवस्था उपलब्ध कराने में शासन इतना अशक्त और बेबस क्यों हो गया, यह सवाल भी सोचने का है। दरअसल राजनीति जिस जन कल्याण की बात करती है, उसके विपरीत उसका आचरण हो गया है। कुछ कांग्रेसी और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने इंटर सिटी बसों के संचालन से टैम्पो चालकों की रोटी छिन जाने का सवाल खड़ा कर दिया और उनके समर्थन में उनके बीच जाकर बयानबाजी शुरू कर दी और उनके समर्थन में सड़कों पर उतरने का तक ऐलान कर डाला। इन राजनीति करने वालों ने जनता का हित किस बात पर निर्भर है, इस ओर भी ध्यान नहीं दिया। हल्द्वानी नगर में पूर्व में रोडवेज द्वारा सिटी बसों का संचालन किया जाता था, जो प्रातः 5 बजे से रात्रि 9 बजे तक हल्द्वानी- काठगोदाम- रानीबाग तक बराबर चलती रहती थी। फिर लालकुआ-काठगोदाम, रुद्रपुर-हल्द्वानी, हल्द्वानी-लामाचैड़ नगर सेवायें भी चलने लगीं। उन दिनों नगर में एक भी टैंपो नहीं चलता था। लेकिन बाद में घाटे का हवाला देकर इन बसों का संचालन बंद कर दिया गया। यह घाटा क्यों हुआ, इस बात पर न कभी चर्चा हुई और न इस घाटे की जाँच ही हुई। बस, घाटा हो गया सो हो गया। जो खा गया उसका भी भला जो पचा गया उसका भी भला। जनता का हित तो हमेशा गौण ही रहा है। लेकिन अब जब 34 इंटरसिटी बसों को परमिट जारी कर दिए गए, तो इस तरह की अराजकता सामने आ खड़ी हो गई।
जब भी प्रशासनिक तौर पर नगर की यातायात व्यवस्था आदि पर चर्चाओं और सुझावों का दौर चला, यह बात सामने लाने का प्रयास किया गया कि बढ़ते तिपहिया वाहनों के दबाव को कम करने के लिए पुनः सिटी बसों का संचालन शुरू किया जाए। किन्तु इस ओर कभी संजीदगी से ध्यान नहीं दिया गया। यही नहीं वर्तमान में तैनात अधिकारी तो यह भी नहीं जानते हैं कि यहाँ पहले सुव्यवस्थित रूप से सिटी बसों का संचालन होता था और नगर के लोग इन्हीं सिटी बसों पर पूरी तरह निर्भर हुआ करते थे। इधर तिपहिया वाहनों की बेहिसाब बढ़ोतरी के कारण यातायात व्यवस्था अव्यवस्थित हो गई है। इन तिपहिया वाहनों के संचालकों में बहुत से ऐसे तत्व भी शामिल हो गए हैं, जो यात्रियों के साथ अभद्र व्यवहार तो करते ही करते हैं, वाहनों का संचालन भी बेतरतीब तरीके से करते हैं, जिससे सड़क दुर्घटनाओं का ग्राफ भी बढ़ गया है। जहाँ तक इन तिपहिया वाहन चालकों की रोजी-रोटी का सवाल है, तब यह क्यों नहीं सोचा जा रहा है कि इनके सड़क पर आने से पहले सैकड़ों रिक्शा चालकों को रोजगार मिला हुआ था। अब उनके व्यवसाय में अन्तर आया है और कइयों की रोजी-रोटी पर हमला हुआ है। क्या उनकी रोजी-रोटी का सवाल महत्वपूर्ण नहीं है ? इसी तरह नगर में जब भी अतिक्रमण हटाए जाते हैं, तो उसकी मार आम ठेले-खोमचे वाले गरीब तबके पर ही पड़ती है। क्या उनकी रोजी-रोटी की दुहाई देकर उनसे तहबाजारी वसूल न की जाए ? क्या उन्हें भी अराजक तरीके से सड़कों पर आने के लिए प्रेरित किया जाए ? राजनीति का खेल खेलने वालों को भी यह सोचना होगा कि जनहित किस बात पर है ? इस तरह की अराजकता का साथ देने में है या आम लोगों को परेशानियों से निजात दिलाने में है। क्या वे यह नहीं जानना चाहेंगे कि टैम्पो चालकों की अराजकता और बार-बार किराये में वृद्धि किए जाने और ठूँस-ठूँस कर यात्रियों को ले जाने से आम लोगों को कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। क्या वे नहीं जानना चाहेंगे कि सिटी बसों के संचालन से आम लोगों को अधिक राहत मिलेगी। इस बार की हुड़दंग के बीच भी उन्होंने देखा होगा कि उनके साथ उन्हीं की पार्टी के लोग शामिल नहीं हुए। जाहिर है, वे इस अराजकता का साथ देकर अपनी फजीहत नहीं कराना चाहते होंगे। किन्तु इस अराजकता में कुछ राजनेताओं के प्रवेश होने के कारण पुलिस व प्रशासन के सामने भी सख्ती न बरते जाने का सवाल पैदा हो गया और चिलचिलाती धूप में आम लोगों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा।
इसके अलावा मीडिया की भूमिका भी सरासर एकतरफा रही, जो इस हड़ताल और इसके नेताओं को चमकाती रही। हड़ताल का समाचार निश्चित रूप से जरूरी है, किन्तु जनहित से जुड़े सवालों को भी उन समाचारों के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए था।