इस साल इत्तफाक ऐसा हुआ कि एक ओर 35 साल पहले का 25 जून 1975, इमर्जेंसी वाला दिन याद आ रहा था तो दूसरी ओर 26 जून, ज्येष्ठ पूर्णिमा बाबा नागार्जुन का जन्मदिन। वह भी शताब्दी वर्ष। इस पर इन सब बातों को खचोरने के लिये बनारस से प्रो. वाचस्पति का फोन। तो जाहिर है कि बाबा की स्मृति और ये पंक्तियाँ दिलो-दिमाग को शिद्दत से झिंझोड़ती रहीं।
सुन रही गिन रही
गिन रही सुन रही, हिटलर के घोड़े की
एक-एक टाप को। इन्दु जी इन्दु जी
क्या हुआ आपको।
यों भी वर्तमान परिस्थितियों में ‘बाबा’ अकसर याद आते रहते हैं। बेशर्म-आर्थिक उदारीकरण। महंगाई का चढ़ता पारा। पेट्रोल-डीजल-तेल का मनमाना खेल। बाढ़-सूखा-अकाल और ‘बाबा’-
कई दिनों तक चूल्हा रोया
चक्की रही उदास।
कई दिनों तक कानी कुतिया
सोई उनके पास।
कई दिनों तक लगी भीति में
छिपकलियों की गश्त।
कई दिनों तक चूहों की भी
हालत रही शिकस्त।
कहाँ-कहाँ तक याद करें बाबा तुम्हें। ऐसा लगता है जैसे सामने खड़े होकर सुना रहे हो-
‘पाँच पूत भारत माता के,….
पुलिस पकड़ के जेल ले गई
बाकी बच गया अंडा।’’
बात पुलिस की आई तो लो फिर तुम सुनाने लगे-
‘…सभ्य देश की शिष्ट पुलिस हैं तो विनम्र रहिये…’
‘बाबा’ जाने क्या-क्या रच दिया तुमने- ‘…
मैं तुम्हारा चुम्बन लूँगा
मैं तुम्हें अपना चुम्बन दूँगा।’
कहाँ तक गिनायें – लालगढ़, दन्तेवाड़ा, आदिवासी समाजों की पीड़ा, बिरसा मुंडा, नक्सलबाड़ी, खाप पंचायत पता नहीं कहाँ-कहाँ तक की यात्रा करा जाते हो तुम हमें-
हो न सके जो पूर्ण काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम।
कृत कृत्य नहीं जो हो पाये
प्रत्युत फाँसी पर गये झूल
कुछ दिन ही बीते हैं
फिर भी यह दुनिया जिनको गई भूल। -
उनको प्रणाम।
‘बाबा’ का हिमालय से, उत्तराखंड से विशेष लगाव था-
‘अमल-धवल हिमगिरी शिखरों पर
बादल को घिरते देखा है।’‘
उत्तराखंड प्रवास के दौरान काशीपुर, जयहरिखाल में वाचस्पति-शकुन्तला का आवास, नैनीताल में उमा भट्ट-प्रो. शेखर पाठक, भवाली में पुष्पा जोशी-निर्मल जोशी का प्रतीक छापाखाना, अल्मोड़ा में पी.सी.तिवारी के साथ रामकृष्ण धाम आदि उनके अड्डे हुआ करते थे। खूब महफिलें जमतीं। देश-विदेश से लेकर स्थानीय समस्याओं तक कई-कई मुद्दों पर बात-बहसें चलतीं। जब तक बाबा रहते पूरा वातावरण जीवंत रहता था। कवि गोष्ठियों, सांस्कृतिक जलसों-जलूसों का क्रम निरंतर चलता रहता। 10 सितम्बर 1983 को जब बाबा ‘नैनीताल समाचार’ कार्यालय में बैठे थे तो हमने उनको उसी समय राजहंस प्रेस से छप कर निकला पेड़ के अवैध कटान के विरोध में जारी पर्चा दिया। उन्होंने तुरंत अपनी प्रतिक्रिया इस कविता के रूप में सामने रख दी-
फिलहाल।
तुम्हारा यह मारक खेल
अभी कुछ समय और चलेगा
लेकिन याद रखो-
हम तुम्हारी बिरादरी के
एक-एक सदस्य का वध करेंगे !
तुम-मुनाफा लोभी
तुम-स्वार्थ के नारकीय कीड़े
हम जंगलों का एक-एक बिरवा
तुम्हारे समूचे वर्ग के लिए
प्रतिहिंसा का महारुद्र/प्रमाणित होगा !
बाबा ! तुम्हारी ये कविता हमारे सामने अभी भी पोस्टर के रूप में टँगी है।
हम सब तुम्हें बहुत याद करते हैं। ओ प्रतिरोधी अभिव्यक्ति के अनूठे कवि ! तुम्हारी पावन स्मृति को प्रणाम।
























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