कुछ दिन पहले सब्ज़ी लेने गया तो पाया कि सेम (जिसे यहाँ छीमी कहते हैं) एक सौ रुपए किलो बिक रही थी। कोई भी सब्ज़ी पचास रुपए किलो से कम नहीं थी. सब सब्जियाँ यहाँ दूर, नज़ीबाबाद तथा अन्य मैदानी भागों से आती हैं। अधिक वर्षा के कारण हरिद्वार से आनेवाला राजमार्ग सितंबर माह से जगह-जगह टूट गया। अधिकतर सामान लानेवाले ट्रक नहीं आ पाए, जिसके कारण खाने की ही नहीं, खाना पकाने की गैस सहित सभी वस्तुओं की कमी हो गई और मूल्य आसमान छूने लगे। दाल 100 रुपए किलो, अधिकतर सब्ज़ी भी उसी भाव!
यहाँ ऊँचाइयों पर आजकल लोग खेतों से आलू निकाल रहे हैं। अधिकतर तो सुअर खोद कर खा गए। जो थोड़े-बहुत बचे, वह किसान 350 किलो की बोरी 400 रुपए में बेच रहे हैं। यह हुआ एक रुपया पंद्रह पैसे किलो। लेकिन दुकानों में आलू 20 रुपए किलो से कम नहीं हैं। यह है यहाँ नफाखोरी का आलम!
पहाड़ को सब्ज़ी उगाने में आगे होना चाहिए था। यहाँ कई प्रकार के जलवायु क्षेत्र हैं। शीतोष्ण से लेकर खूब ठंडे, अधिकतर भूमि सब्जियों के लिए बहुत अच्छी समझी जाती है। वर्षा के समय यहाँ कई प्रकार की सब्ज़ियाँ, कोहड़े-कद्दू से लेकर बंद और फूल गोभी, तोरई, लौकी, सेम, भिंडी, पालक, राई तथा अन्य सभी सब्जियाँ बहुतायत से होनी चाहिए। लेकिन इन विस्तृत पहाड़ों में कहीं भी जाइए तो पाइएगा कि सब्जियाँ सब-की-सब मैदानों से आ रही हैं।
एक समय अखबारों में खबर छपी थी कि किसी किसान ने एक गाँव में अनेक प्रकार की सब्जियाँ बड़ी मात्रा में उगाई हैं और उसे कृषि-पंडित की उपाधि तथा नकद पुरस्कार भी मिला था। खबर तो दिखाई दी लेकिन सब्ज़ियाँ नहीं! अब भी सब मैदानी भागों से ही आ रही हैं।
इस साल अतिवृष्टि के कारण हरिद्वार-बदरीनाथ राजमार्ग सितंबर से अधिकांश बंद रहा और अक्टूबर 11 से तो छातीखाल के नीचे, सिरोबगड़ में लगातार। सीमा सड़क संगठन उसे जैसे ही मशीनों से खोलता है, वैसे ही ऊपर से पत्थर तथा मलवा आने लगता है और मार्ग फिर अवरुद्ध हो जाता है। मुसाफिर प्राण हाथ में ले दौड़ लगा वह भयंकर भाग पार करते हैं और तब दूसरे छोर पर खड़ी गाड़ी पकड़ कर आगे यात्रा करते हैं। बस तथा ट्रकों और भारी वाहनों को कभी टिहरी घूम कर यात्रा करनी पड़ती है, जिससे वह लगभग 100 किमी. ज्यादा लंबी तथा अधिक महंगी हो जाती है। इस स्थान में सड़क के ऊपर छातीखाल में सात परिवारों के घर हैं। उनके नीचे की भूमि धँसती-खिसकती जा रही है। यह परिवार सीमा सड़क संगठन को विस्फोटकों के द्वारा मार्ग चौड़ा करने से रोक रहे हैं। उनका कहना है कि विस्फोटों से उनके घर और जल्दी टूट कर नीचे आ जाएँगे। उनकी माँग है कि उन्हें पहले कहीं और बसाया जाये और तब सड़क चौड़ी करने का काम किया जाये। विस्थापन से पहले वे विस्फोटकों का उपयोग नहीं करने देंगे। राज्य सरकार ने उनके विस्थापन के बारे में अभी कुछ तय नहीं किया है। सड़क ऊपर से पत्थर-मिट्टी आने के कारण लगातार बंद होती रहती है, जिससे रुद्रप्रयाग तथा चमोली जनपदों में सामान नहीं पहुँच पाता। गैस और अन्य वस्तुओं की कमी हो गई है और दाम बढ़ते जा रहे हैं।
कहा जा रहा है कि सिरोबगड़ और खांकरा के बीच एक पतला वैकल्पिक 10 किलोमीटर लंबा मार्ग बनाया गया है, जिस पर फौज की कुछ गाड़ियाँ चली हैं। यदि छांतीखाल के परिवारों को कहीं और नहीं बसाया जाता तो उस वैकल्पिक मार्ग को चौड़ा कर उसे बड़े वाहनों के यातायात के लिए उपयुक्त बनाया जाये ताकि यात्रा सुगम हो सके। इस स्थान में सड़क के अधिकतर बंद होने से आजकल श्रीनगर से 30 किलोमीटर दूर रुद्रप्रयाग का किराया पहले के 20 रुपए से 130 रुपए हो गया है। यदि स्थिति ऐसी ही रही तो आने-जाने की कठिनाइयों के अलावा रुद्रप्रयाग तथा चमोली जिलों में अन्न और अन्य वस्तुओं की बहुत कमी हो जाएगी और उनके दाम बहुत बढ़ जाएँगे। यदि स्थिति ऐसी ही रही तो अगले वर्ष की बदरीनाथ-केदारनाथ यात्रा कठिनाई में पड़ जाएगी। अब राज्य सरकार के हाथ में है कि वह छातीखाल के परिवारों को कहीं और बसाती है या वैकल्पिक मार्ग का विकास करती है। वरना चमोली जिला तथा उसका सरहदी भाग तो बाकी देश से कट जायेगा।