उत्तराखण्ड के बागेश्वर जनपद के कपकोट तहसील में सरयू व रेवती नदियों के घाटियों में 18 अगस्त को मची तबाही में सुमगढ़ स्थित सरस्वती शिशु मन्दिर के 18 बच्चे जिन्दा दफन हो गये। देश भर में मीडिया ने यह प्रचारित किया कि बादल फटने से यह हादसा हुआ। यह बात बिल्कुल झूठ है। अब मारे गये बच्चों के अभिभावकों ने भी जिलाधिकारी बागेश्वर को ज्ञापन दिया है कि इस हादसे की मजिस्ट्रेटी जाँच की जाये। एक बच्ची खुशबू के दादा जगदीश चन्द्र जोशी के अनुसार 18 अगस्त की सुबह 140 बच्चों में से सिर्फ 39 बच्चे स्कूल आये थे। बच्चों ने जब कक्षा में पानी आने की शिकायत अपने आचार्यों से की तो आचार्यों ने उन्हें डाँट दिया तथा बाहर से कक्षों में चिटखनी चढ़ा दी। बच्चे कक्षाओं में बन्द थे।
दरअसल लगभग 100 मीटर दूर सरयू नदी जर्बदस्त उफान में थी। नदी पर बने पुल से ही बच्चों को आना-जाना था। अध्यापकों को यह डर था कि कहीं कोई बच्चा नदी में न बह जाये, इसीलिये उन्होंने बच्चों को कक्षा में बंद कर दिया। इसी समय सुमगढ़ के ठीक सामने वाली पहाड़ी, जिसमें सिलिंग, उडियार, तप्तकुंड आदि बसे हैं, में जबर्दस्त धमाके की आवाज हुई। सारे अध्यापकों का ध्यान उसी तरफ चला गया। वहाँ जबर्दस्त नाला आ गया, जिसने खड़क सिंह के पूरे मकान व दुकानों को ही नष्ट नहीं कर दिया, वरन् वहाँ खड़ी कार आदि को भी अपनी चपेट में ले लिया। जान-माल को कोई नुकसान इसलिये नहीं हुआ, क्योंकि सभी लोग पहले ही सतर्क हो चुके थे। दयाल सिंह दियारकोटी, जिनकी सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान सहित चार दुकानें पूरी नष्ट हो गईं, का कहना है कि उन्हें लगभग छः लाख रुपये की हानि हुई है। मगर उन्हें कहीं सामान्य चोट तक नहीं आई। जिस समय सरस्वती शिशु मन्दिर के अध्यापक सिलिंग, उडियारी, तप्तकुंड की तबाही का नजारा देख रहे थे, उसी समय स्कूल के ऊपर भूस्खलन होने से मलवा स्कूल की कमजोर दीवार को तोड़कर कक्षाओं में भर गया तथा 18 बच्चे दबकर मर गये। ये बच्चे 7-8 वर्ष से कम उम्र के थे।
सुमगढ़ गाँव में इस स्कूल के अलावा कोई हानि नहीं हुई। यह स्कूल नदी के समीप है, जबकि गाँव की आबादी नदी से दूर है। अध्यापकों के लिये नदी के पार सिलिंग, उडियार, तप्तकुंड समीप पड़ता है। लेकिन सरयू नदी के तेज उफान के कारण पुल का एक हिस्सा टूट गया था, जिस कारण मदद देर से मिली। यह बात सच है यह क्षेत्र भूकंप के सबसे खतरनाक, पाँचवें जोन में बसा है। इसी स्कूल से कुछ दूरी पर उत्तर भारत हाइड्रों पॉवर कारपोरेशन द्वारा पहाड़ को खोदकर सुरंग भी बनाई जा रही है, इसलिये यह कहना गलत नहीं होगा कि इस सुरंग का प्रभाव भी स्कूल के ऊपर आये भूस्खलन का कारण हो सकता है। स्कूल की लापरवाही तो दुर्घटना का मुख्य कारण है ही। सरस्वती शिशु मन्दिर का यह स्कूल था, इसलिये इस स्कूल की दीवार का सिर्फ सिंगल ईंट पर खड़ा होना निर्माण कार्य को तो घटिया साबित करता ही है।
इस सरयू घाटी के लगभग 10 किमी. क्षेत्र के अन्तर्गत पहाड़ों को छेदकर तीन बड़ी-बड़ी सुरंगें बनाई जा रही हैं। जाने माने भूगर्भविज्ञानी डॉ. खड्ग सिंह वल्दिया इस क्षेत्र को पहले ही संवेदनशील घोषित कर चुके हैं। लेकिन उत्तराखंड व केन्द्र की सरकारें इस क्षेत्र के संवेदनशील नही हैं, जिसके कारण उत्तराखंड की नाजुक पहाड़ियाँ खतरनाक बनती जा रही हैं। उत्तर भारत हाइड्रो पॉवर कॉरपोरेशन का कार्य इस क्षेत्र में तीन चरणों में होना है। द्वितीय व तृतीय चरण में तो कार्य चल रहा है, परन्तु प्रथम चरण का कार्य जनता के प्रतिरोध के कारण आरम्भ नहीं हो पाया है। ‘सरयू हक-हकूक बचाओ संघर्ष समिति’ के नेतृत्व में यह आन्दोलन नौ माह तक चला। कई प्रलोभनों, दमन के बाद भी यह आन्दोलन टूट नहीं पाया। सरकार व कम्पनी मिलकर भी विद्युत परियोजना का प्रथम चरण का कार्य आरम्भ नहीं कर पाये। एक पूर्व मुख्यमंत्री इस क्षेत्र से विधानसभा सदस्य रहे हैं। उन्होंने अपनी पूरी क्षमता से इस आन्दोलन को तोड़ने का प्रयास किया। वे हमेशा कंपनी के पक्ष में खड़े रहे। उनके लिए विद्युत परियोजना का बनना ही विकास का मापदण्ड है, चाहे पहाड़ व उसके निवासी नष्ट हो जायें। इस क्षेत्र में हर वर्षा में जर्बदस्त तबाही होती है। सन् 1957 में सुडिंग में, 1991 में कर्मी में, सन् 1983-84 में रिखोड़ी -मोनार तथा 2004 में पुनः सुडिंग में जन धन की भारी हानि हुई थी। लेकिन इन सच्चाइयों को दरकिनार कर, स्थानीय जनता के विरोध के बावजूद सरकार बाँध बनाने में अड़ी है। इन योजनाओं का पुरजोर समर्थन स्थानीय जन प्रतिनिधि भी करते हैं, क्योंकि उन्हें चुनाव के लिये चन्दा इन कम्पनियों से ही मिलता है।
इसीलिये स्थानीय विधायक शेर सिंह गड़िया भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल अन्य नेता बिना पूछे ही यह दावा कर रहे हैं कि इस हादसे में विद्युत परियोजना की या कम्पनियों का कोई दोष नहीं है। इनसे जब यह पूछा गया की सुमागढ़ में तो बादल फटा ही नहीं, 18 बच्चे कैसे मारे गये थे, तो बस इतना ही कहते हैं की कंपनी की गलती नहीं है।
सौंग में ‘सरयू हक-हकूक बचाओ संघर्ष समिति’ के नेतृत्व में चले आन्दोलन में सक्रिय रहे मोहन सिंह टाकुली कहते हैं कि सुमगढ़ की दुर्घटना परियोजना की सुरंग बनाने से ही हुई। सौंग का क्षेत्र इसलिये बच गया, क्योंकि वहाँ हमने सुरंग बनने ही नहीं दी। आन्दोलन के ही एक और नेता खड़क सिंह कुमल्टा कहते हैं कि अब लोग समझ गये हैं कि यह परियोजना हमारे लिये कितनी खतरनाक है। इस हादसे में मरे 18 बच्चों के लिये देश की संसद ने श्रद्धांजलि अवश्य अर्पित की, लेकिन हमारी संसद को यह भी समझना होगा कि विकास का मौजूदा मॉडल व भ्रष्टाचार इन बच्चों की जान लेने में अधिक सहायक रहे हैं। प्राकृतिक नहीं, मानवीय कृत्य इस दुर्घटना में घातक साबित हुआ है। लेकिन दुःख यह है इनकी मौत का कारण बादल फटना मान लिया गया। नेताओं की समझदारी का यह हाल है कि उत्तराखण्ड सरकार में राजस्व व आपूर्ति मंत्री दिवाकर भट्ट ने कहा है कि लोहारी नागपाल जल विद्युत परियोजना का विरोध करने वाले सी.आई.ए. के एजेन्ट है। मंत्री जी को शायद यह मालूम नहीं कि मुख्यमंत्री निशंक ने ही केन्द्र सरकार से लोहारी नागपाल परियोजना बंद करने की माँग की थी।
पहाड़ में आई इस विपदा से ठेकेदारों व अधिकारियों की बाँछें खिल गई हैं। अधिकांश ठेकेदार दलों के ही नेता हैं इसलिये जनता के नाम से लूटने का मौका मिल गया। कपकोट के विधायक शेर सिंह गड़िया ने सरकार को प्रस्ताव भेजा है कि एक अरब की हानि हुई है, तत्काल राहत देकर निर्माण कार्य करवाये जांय। राहत कार्यों में जबर्दस्त धाँधली मची है। सुमगढ़ का सभापति हरिश्चन्द्र सत्तारूढ़ दल का नेता है। पिता कानूनगो हैं। सरकारी सहायता इनसे आगे बढ़ नहीं पा रही है। क्षेत्र में भ्रमण करने के बाद यह मालूम हुआ कि रिखाड़ी की गंगा देवी को 10 किलों आटा, 5 किलो चावल, 6 मुट्ठी दाल व एक चाय की पुड़िया के अलावा कुछ नही मिला। खड़क सिंह व जसमल सिंह का पूरा कारोबार समाप्त हो गया है। परियोजना की सुरंग के ऊपर के गाँव कफलानी में लोग इतने डरे हैं कि रात में स्कूल में जाकर सोते हैं। बिचला, मल्ला दानपुर क्षेत्र में जबर्दस्त हानि हुई है। लेकिन नेता, मंत्री दौरा कर सिर्फ सुविधाओं की घोषणा कर रहे हैं। विकास नीति में बुनियादी बदलाव की बात कोई नहीं कर रहा है। इसलिये हादसे तो होते रहेंगे, लोग मरते रहेंगे, नेता आते रहेंगें, लाशों के नाम से ठेके बँटते रहेंगे।
(सभी फोटो बागेश्वर से हमारे साथी श्री केशव भट्ट द्वारा)
ये सबके सब लाशों के सौदागर हैं ,वहां की जनता को चाहिए की इन सब भ्रष्टाचारियों को बीच चौराहे पे लाकर फांसी पे लटका दे ….
दुखद घटना। पीड़ित परिवारों के साथ संवेदना रखते हैं।
[...] बादल फटने से नहीं दफन हुए 18 बच्चे [...]
[...] Posted in आपदा, जनमवार अंक, विविध, विशेषांक | Tagged bageshwal school wall collapsed, bageshwar, birthday edition-10, cloud burst, hydro power projects, landslide, media responsibility, natural disaster, tragedy | 2 Responses [...]