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( बगरो बसन्त में इस बार प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध साहित्यकार व पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी का उनके द्वारा साप्ताहिक प्रताप शिखर में लिखा गया (18 मार्च 1914) लेख ‘जातीय होली’ जो उनकी ‘चुनी हुई रचनाएं’ पुस्तक से लिया गया है और प्रस्तुत हैं सुप्रसिद्ध युवा कवि शिरीष मोर्य व वरिष्ठ राजनीतिज्ञ वरवर रॉव की हिन्दी कविता। – संपादक)
जातीय होली
जी खोलकर हँसना, बोलना और खुशी मनाना उन्हीं लोगों का काम है जिनके शरीर भले और मन चंगे हों। लेकिन जिनके ऊपर विपत्ति और पतन की घनघोर घटा छाई हो, जिनका घर और बाहर सभी कहीं अपमान हो रहा हो और जिनकी दुर्दशा उनके सारे पौरुषेय गुण की जड़ पर कुठार चला रही हो, उनका हँसना, बोलना और खुशी मनाना या तो नीचातिनीच प्रकार की मूर्खता है, या फिर पूरा पागलपन।
हमारे सामने होली उपस्थित है। वह रूढ़ि और समाज के नाम पर हमसे अपील करती है कि जी-भर हँसो और जी-भर खुशी मनाओ। लेकिन उसी के मुकाबले में, हमारे सामने नहीं, उन सबके सामने भी जिनके सामने होली अपना मनोहर संदेश रख रही है, देश और जाति की भयंकर दुर्दशा, उनका हर जगह का अपमान, उनकी उन्नति की जड़ पर कुठार चलाने वाली शक्तियाँ, उनको अंधकार में जबर्दस्ती घसीट लिये जाने वाली रुढ़ियाँ, नीच-ऊँच का विचार, झूठी बातों पर गर्व, स्वार्थ, फूट, निबर्लता, कापुरुषता आदि-आदि की भयंकर मूर्तियाँ नाच-नाचकर अपने विकट हास्य से हमारे हौसलों को पस्त कर रही हैं। हमें देश के बड़े भविष्य में पूरा विश्वास है। हमें अपने देश वालों की उज्जवल उन्नति का दृढ़ निश्चय है। संसार में उच्च मानसिक, नैतिक, आत्मिक, शारीरिक और आर्थिक जो उन्नति हो सकती है, हमें विश्वास और पूरा विश्वास है कि हम और हमारा देश उसे एक-न-एक दिन अवश्य पायेंगे। संसार अभी चाहे कितना टेढ़ा रहे और आगे भी यह हमारे रास्ते में चाहे जितने काँटे बोए, लेकिन हमारे जातीय जीवन में एक दिन ऐसा अवश्य होगा कि उसे हमारे रास्ते में अपनी आँख तक बिछानी पड़ेगी। भविष्य में इतना प्रबल विश्वास है, लेकिन उसके कारण हम अपनी वर्तमान दुर्दशा को नहीं भूल सकते। हँसने का नहीं, रोने का स्थान है, जब हम देखते हैं कि हर तरह की पराधीनता की बेड़ियों में बँधे होने पर भी, पेट-भर भोजन के लिये तरसते और शरीर को रोगों का घर बनाये हुए भी, लोग ऐसे अवसर पर कहकहे मारने से बाज नहीं आते। बाहरी संसार उनके फक्कड़पन पर आश्चर्य कर सकता है, लेकिन जिन्हें इस फक्कड़पन की तह के भीतर का हाल मालूम है, वे इस सूखे कहकहे का मूल्य उस गीत से अधिक नहीं रखेंगे जो रोते हुए भूखे मनुष्य के गले से भिक्षा में कुछ दानों को पा जाने के लोभ से निकलता है। होली के हँसी-ठिठोली जातीय जीवन के चिन्ह उस समय तक कदापि नहीं कहे जा सकते, जब तक कि उनके वेग में बहने वाले प्राणी मनुष्य के औसत भावों के अधिकारी नहीं बन जाते, जब तक वे अपनी स्थिति को नहीं समझते और उसके समझने पर हृदय में जल उठने वाली अग्नि की शान्ति का उपाय नहीं करते।
हमारी वर्तमान होली रुढ़ि की होली है। उसमें स्वयं जीवन नहीं। कालचक्र उसके अस्तित्व को मिटाने के लिये आगे बढ़ रहा है। वह मिट जायेगी और फिर जन्मेगी। फिर जन्म लेगी-लोगों के सिर फेरने के लिये नहीं, गालियों को बकवाने के लिये नहीं, फाके मस्ती में घर-मस्ती का तमाशा दिखाने के लिये नहीं, किन्तु लोगों में जीवन का संदेश पहुँचाने के लिये मद और भ्रम से आकाश में उठे हुए सिरों को चरणों के पास ला डालने के लिये, सच्चे प्रेम से करोड़ों बिछुड़े हुए प्राणियों को मानव-अधिकारों का अधिकारी बनाने के लिये, कायरों में पौरुषेय गुणों को पैदा करने के लिये, जातीयता, मनुष्यता, सेवाभाव और प्रेम का संदेश देश के प्राणी-प्राणी को सुनाने के लिये, संसार में देश और देशवालों के लिये उचित स्थान लेने के लिये और देश की असामनता, भ्रम, स्वार्थ और दम्भ को अपनी चिता में जलाने के लिये। और इस पवित्र और शुभ होली का नाम होगी – जातीय होली !
बसन्त कभी अकेले नहीं आता
बसन्त कभी अकेले नहीं आता
गर्मियों के साथ मिल
कर आता है
झड़े हुए फूलों की याद के करीब
नई कोंपलें फूटती हैं
वर्तमान पत्तों के पीछे अदृश्य भविष्य जैसी
कोयल विगत विषाद की मधुरता सुनाती है
निरीक्षित क्षणों में उगते हुए
सपनों की अवधि घटती है
सारा दिन तवे-से तपे आकाश में
चंद्रमा मक्खन की तरह शायद पिघल गया होगा
मुझे क्या मालूम
चांदनी कभी अकेले नहीं आती
रात को साथ लाती है
सपने कभी अकेले नहीं आते
गहरी नींद को साथ लाते हैं
गिरे हुए सूर्य बिंब जैसे स्वप्न से छूटकर भी
नींद नहीं टूटती
सुख कभी अकेले नहीं आता
पंखों के भीतर भीगा भार भी
कसमसाता है !
बसंत जो पृथ्वी की आंख है
पृथ्वी के साथ जुड़े खून के इतिहास को
पोंछते हुए अब मैं बसंत कहना चाहता हूँ
बसंत जो पृथ्वी की आँख है
जिससे वह सपने देखती है
मैं पृथ्वी का देखा हुआ सपना कहना चाहता हूँ
यही सपना मुझमें कविताएं उगाता है।
- वरवर राव
भीमसेन जोशी को सुनकर
इस तरह भी उतरता है बसन्त
धरती पर
बेमौसम बेवक़्त
मन के भीतर बदल जाता है ![]()
सभी कुछ
बाहर भले ही पत्ते झर रहे हों
भीतर कोंपलें फूटती हैं
जाड़ों की लम्बी रातों में
घोसलों में दुबकी
चिड़ियाँ आपस में कुछ
पूछती हैं
भूरे से हरा हो जाता है
टिड्डों का रंग
इस तरह भी उतरता है बसन्त
जो किसी साजिश में शामिल नहीं
खून में नहीं सने हैं
जिनके हाथ
वे सभी महसूस कर सकते हैं
,कि आवाज़ का हाथ पकड़कर
यों बसन्त का आना!
- शिरीष मौर्य