3 फरवरी को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व सामाजिक कार्यकर्ता बाँके लाल कंसल के देहान्त के साथ एक शताब्दी तक फैला एक युग समाप्त हो गया। 4 अप्रेल 1911 को बड़ा बाजार, नैनीताल में जन्मे बांके लाल जी की शिक्षा प्राइमरी स्कूल मल्लीताल, हम्फ्री हाईस्कूल नैनीताल, सरस्वती विद्यालय बरेली और डी.ए.वी. कॉलेज, अलीगढ़ में हुई थी। 1919-20 में जलियाँवाला बाग गोली काण्ड के जब्त साहित्य का प्रचार-प्रसार करने तथा कागज के झंडे बनाकर देशगान द्वारा जन जागृति लाने का प्रयास करने के कारण पुलिस सुपरिंटेंडेंट थॉमसन द्वारा उन्हें पीटा गया था। उनके परिवारजनों को जेल यातना दी गई। 1928 से 1930 तक बरेली तथा अलीगढ़ के अनेक स्थानों पर वे स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय रहे। जंगलात के दफ्तर पर सत्याग्रह करते हुए दिनांक 26 अगस्त 1930 को उनकी गिरफ्तारी हुई तथा दिनांक 20.10.30 को फैसला देते हुए एस.डी.एम. मिस्टर निबलैट ने 50 रु. का जुर्माना तथा जुर्माना न देने पर 5 माह का सश्रम कारावास सुनाया।
1931 में उनका विवाह सुमित्रा जी से हुआ। लेकिन समाज ने हुक्का-पानी बन्द कर इस विवाह का बहिष्कार किया। बाल्मीकि समाज हेतु पाठशाला की स्थापना तथा उन्हें धार्मिक कार्यां में समान अधिकार देने, हरिजनों के मन्दिर प्रवेश, सहभोज, यज्ञोपवीत, हरिजन महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने जैसे उनके कार्यों से बिरादरी वाले अत्यन्त रुष्ट थे। सन् 1941 से 1957 तक वे नैनीताल नगरपालिका के सदस्य रहे। उन्होंने नगरपालिका की कार्रवाही हिन्दी में लिखवाने की परम्परा शुरू की। नगरपालिका के कार्यकाल में भी उन्होंने तत्कालीन स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मायादास के साथ मिल कर दलित और कमजोर वर्ग के लोगों को साफ-सफाई से रहना सिखाया।
सरला बहन की भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रियता से नाराज कमिश्नर एक्टन साहब ने सरला बहन को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया था। सरला बहन की तलाश में पुलिस ने बाँके लाल जी के घर को घेर लिया। मगर सर्च वारंट न होने के कारण घर की तलाशी नहीं करने दी गई। फिर रातोंरात सरला बहन को मेरठ पहुँचाकर उनकी प्राण रक्षा की। सन् 1942 में उनके तीनों भाइयों, बंशीधर कंसल, विद्याप्रकाश कंसल और भूप्रकाश कंसल को छः-छः मास का कारावास हो गया। संयुक्त परिवार होने के कारण पूरे परिवार की जिम्मेदारी बाँके लाल जी पर आ गयी। आन्दोलन में भूमिगत कार्यकत्र्ताओं के घरों की देखभाल तथा भोजन पहुँचाने की जिम्मेदारी भी उन्होंने सम्हाली।
सीतावर पंत जी के साथ मिल कर उन्होंने हरिजन सेवक संघ की स्थापना की। राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार, कवि सम्मेलनों के आयोजन, मद्य निषेध, विधवा विवाह, अनाथालयों की स्थापना, खादी प्रचार, पशुबलि बंद करने आदि कार्यक्रमों में वे जीवन भर सक्रिय रहे। आजादी के बाद उनकी पहल पर नगरपालिका अध्यक्ष जसोद सिंह बिष्ट ने आर्य समाज के लिये 50 फीट गुणा 40 फीट का भूखण्ड नगर के मध्य में उत्तर प्रदेश सरकार से दिलवाया। 3 जून 1951 को मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत ने आर्य समाज मन्दिर की आधारशिला रखी।
कुछ समय वे बापू के वर्धा आश्रम में भी रहे। जवाहर लाल नेहरू, इन्दिरा गांधी, महादेव देसाई, आनन्द टी. हिंगोरानी, स्वामी आनन्द, महात्मा नारायण स्वामी, आचार्य कृपलानी, सुचिता कृपलानी, श्रीमन्नारायण, गोविन्द बल्लभ पंत, सम्पूर्णानन्द आदि के वे निजी सम्पर्क में रहे। हालाँकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राजनीति से अलग होकर उन्होंने आर्य समाज के माध्यम से समाज सेवा में ही जीवन समर्पित कर दिया। उनके प्रयासों से बबुलिया की हरिजन बस्ती का नाम बदलकर नारायण नगर रखा गया। डॉ. खजान चन्द, डॉ. प्रेमलाल साह, ठा. केशर सिंह आदि के साथ मिल कर उन्होंने भवाली में ‘टी.बी. पेशेंट वैलफेयर सोसायटी’ का गठन किया, जिसमें क्षय रोगियों के पुनर्वास में मदद की जाती थी।
जमना लाल बजाज पुरस्कार से प्रदत्त राशि से सरला बहन की पुस्तक ‘संरक्षण या विनाश’ छपवाने के लिये उन्होंने ज्ञानोदय प्रकाशन को स्थापित किया, जिसने डॉ. के.एस. वाल्दिया, डॉ. जे.एस. सिंह, डॉ. एस.पी. सिंह, डॉ. शंकर लाल साह आदि विद्वानों की पुस्तकें भी प्रकाशित कीं। सन् 1990 से वे आर्य समाज की ओर से हर वर्ष दो निःशुल्क नेत्र कैम्प लगाते थे। इस क्रम में अब तक लगभग 3,000 ऑपरेशन किये जा चुके हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय योगदान देते हुए बाँके लाल कंसल जी चेतराम साह ठुलघरिया इण्टर कालेज नैनीताल, आर्य कन्या इण्टर कालेज काशीपुर, आर्य कन्या इण्टर कालेज रामनगर और डी.ए.वी. कालेज देघाट की प्रबन्ध समितियों के सदस्य रहे। वे क्षेत्रीय रेडक्रास सोसायटी, क्षेत्रीय मद्य निषेध परिषद, क्षेत्रीय पर्यटन समिति के भी सदस्य रहे।