दिसम्बर 2003 की कोई रात थी। रात बिस्तर पर जाते पत्नी ने हुक्म दिया, ‘‘हाथ के दोनों पंजों के नाखूनों को रगड़ो। इस तरह से……।’’ इससे क्या होगा, मैंने पूछा। सिर में बाल उग आयेंगे, उनका जवाब था। मैं उपहास के साथ सो गया। अगली सुबह श्रीमती जी ने टी.वी. के पर्दे पर एक संन्यासी से भेंट करवाई, जिसकी बायीं आँख दाहिनी आँख से थोड़ी छोटी थी। यह फुर्तीला संन्यासी एक बहुत ऊँचे मंच से नीचे जमीन पर बैठे सैकड़ों जिज्ञासुओं को योग और प्राणायाम सिखा रहा था। लेकिन यह सिखाने से भी रोचक था उसका वह अनवरत व्याख्यान, जो वह राष्ट्रीय चरित्र, भ्रष्टाचार और विदेशों में जमा काले धन के बारे में दे रहा था। यह व्यक्ति अन्य योग शिक्षकों अथवा मनुष्य को परलोक के नशे में डुबाये रखने वाले फाईव स्टार आध्यात्मिक गुरुओं से कितना अलग है, मैंने सोचा।
उस दिन से गुरु-शिष्य के जिस रिश्ते की शुरूआत हुई।
योगासन बहुत पहले हमें शिवानन्द आश्रम, मुनि की रेती वाले स्वामी अध्यात्मानन्द ने सिखाये थे। लेकिन प्राणायाम सिखाने में वे भी कंजूसी कर गये। बचपन से ही सुनते आये थे कि प्राणायाम बहुत खतरनाक क्रिया है और इसे किसी योग्य गुरु की निगरानी में ही करना चाहिये। स्वामी रामदेव ने इस वर्जना को तोड़ा और हम भी उनके हजारों अनुयायियों में शामिल होकर टी.वी. के सामने बैठ कर कपालभाति और अनुलोम-विलोम करने लगे। जनवरी 2004 में हमें हरिद्वार की दिव्य योग फार्मेसी से कुछ दवाइयाँ लाने का मौका मिला और अप्रेल 2005 में बरेली में बाबा के एक पाँच दिवसीय शिविर में सपत्नीक प्रशिक्षण लेने का। तब बाबा का कॉरपोरेट साम्राज्य स्थापित नहीं हुआ था और वे योग सिखाते-सिखाते ‘ठंडा मतलब टॉयलेट क्लीनर’ का नारा लगाते हुए कोक-पेप्सी का बहिष्कार भी सिखाते थे और ईराक पर हमला करने के लिये बुश को गरियाते भी थे। इन तीखे-तर्रार विचारों के सम्मोहन में हम बँध गये। हालाँकि यह बात हमें शंकित करती थी कि उनके मंच पर भगतसिंह और वीर सावरकर के फोटो साथ-साथ क्यों लगे रहते हैं।
बरेली शिविर से लौट कर हम स्वामी रामदेव से सीखे योग-प्राणायाम अपने परिवार वालों के साथ अड़ोसी-पड़ौसियों को भी सिखाने लगे। अच्छी खासी भीड़ हो जाती थी। यहाँ तक कि उत्तराखंड लोकवाहिनी के अपने साथी दयाकृष्ण कांडपाल, जो प्रशिक्षित ‘नेचुरोपैथिस्ट’ हैं, के साथ मिल कर हमने अल्मोड़ा में भी योग शिविर लगाये। पहले लक्ष्मी भंडार तथा फिर एन.सी.सी. मैदान में। तब स्वामी जी के प्रशिक्षित योग शिक्षक नहीं होते थे। हमारी इस सक्रियता को देख कर हमारे कुछ करीबी दोस्त मजाक में हमें ‘छोटा रामदेव’ ही कहने लगे।
लेकिन तभी एक जबर्दस्त झटका लगा, जब वृन्दा करात द्वारा दिव्य योग फार्मेसी की श्रमिक समस्या को मुद्दा बनाने पर स्वामी जी अपना आपा खो कर कम्युनिस्टों को कहनी-न कहनी कहने लगे। तब हमने नैनीताल समाचार में ‘स्वामी रामदेव को गुस्सा क्यों आता है’ (15 से 31 जनवरी 2006) शीर्षक से एक टिप्पणी प्रकाशित की थी। वह शिष्य की गुरु में निष्ठा खत्म होने की शुरूआत थी। फिर तो कई झटके लगे। कभी नारायण दत्त तिवारी की कांग्रेस सरकार से कौडि़यों के भाव भूमि झपट कर पतंजलि योगपीठ में तमाम भ्रष्ट नेताओं, विशेषकर मुलायम सिंह यादव जिन्हें उत्तराखंड आन्दोलन के कारण हम आज भी बर्दाश्त नहीं कर पाते, की भीड़ लगाने के कारण तो कभी साध्वी प्रज्ञा भारती की गिरफ्तारी पर यह बयान देने पर कि ‘कोई भी हिन्दू संत आतंकवादी नहीं हो सकता।’ कभी संजीवनी बूटी खोजने का हास्यास्पद दावा करने के कारण, कभी गंगा बचाने का मुद्दा हथिया कर हाई वे जाम करने के कारण तो कभी नित नये विवादास्पद बयान देकर तत्काल उससे मुकर जाने के कारण।
जैसे-जैसे स्वामी रामदेव का कॉरपोरेटी साम्राज्य बढ़ने लगा और उनके अनुयायियों की संख्या लाखों में पहुँच गई, वैसे-वैसे कॉरपोरेटी संस्कृति के प्रति उनका गुस्सा कम होता चला गया। अलबत्ता काले धन का मुद्दा उन्होंने बनाये रखा। उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षायें बढ़ती गयीं। उन्हें लगने लगा कि रसातल को जाते इस देश को बचाने के लिये ही उनका अवतरण हुआ है। राजनीति में प्रवेश न करने के तमाम दावे करने के बावजूद उन्होंने ‘भारत स्वाभिमान ट्रस्ट’ की स्थापना उसी तर्ज पर की, जैसे कोई औद्योगिक घराना अपना व्यावसायिक ब्रांड मार्केट में इन्ट्रोड्यूस करता है। जाहिर है कि इसमें तपे-तपाये कार्यकर्ता तो होने नहीं थे, अतः वे लोग ही इसमें आये, जो जनान्दोलनों का ककहरा भी नहीं जानते थे और अपने भोलेपन में विश्वास करते थे कि भस्त्रिका और कपालभाति प्राणायाम से ब्लडप्रेशर नियंत्रित करने की तरह वे भ्रष्टाचार का नामोनिशाँ भी मिटा सकते हैं। बंदूक के बल पर कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में शासन करने वाले तथा माओवाद के नाम पर निर्दोष गरीबों का संहार करने वाले सत्ता प्रतिष्ठान की बर्बरता की वे सपने में भी कल्पना नहीं कर सकते थे। बाबा भी शायद नहीं चाहते थे कि समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम तैयार की जाये, क्योंकि उससे उनकी अतिशय महत्वाकांक्षा को नुकसान पहुँचता था। उन्हें तो एक भीड़ तैयार करनी थी, जिसके ऊपर चढ़ कर वह आकाश छू सकें। इसीलिये 4 जून की रात रामलीला मैदान से जब वे जनाना सलवार-कमीज पहन कर भाग निकले तो उनके अनुयायियों में ऐसा कोई नहीं बचा, जो पुलिस की बर्बरता के सामने असुरक्षित औरतों-बूढ़ों की हिफाजत कर सकता।
रामलीला मैदान में हुई यह बर्बरता इसलिये महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह देश की राजधानी के बीचोंबीच हुई है। अन्यथा देश के ओने-कोनों में ऐसा दमन तो हमारी सरकारों के लिये आम बात है। इसके निहितार्थ यह हैं कि सत्ता अब बेहद ढीठ हो गई है और निरंकुश तानाशाही आने में ज्यादा विलंब नहीं है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हित पूरा करने के लिये अब कभी भी इमर्जेंसी जैसे हालात बनाये जा सकते हैं। रामलीला मैदान की घटना की जितनी निन्दा की जाये, कम है। लेकिन इस घटना की तुलना जलियाँवाला बाग से करना अतिशयोक्ति होगी। हम लोगों ने राज्य आन्दोलन के दौरान मुजफ्फरनगर कांड जैसा आघात झेला है, जिसके बारे में बहुत सारे लोगों को अब याद भी नहीं है। स्वामी रामदेव को तो कतई नहीं होगा, अन्यथा वे उत्तराखंड सरकार से जमीन प्राप्त कर मुलायम सिंह को पतंजलि योगपीठ के मंच पर नहीं बिठलाते। उस जालिम वक्त में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहाराव धृतराष्ट्र की तरह आँखें मूँदे रहे थे और भारतीय जनता पार्टी ने एक घंटे के लिये भी राजघाट पर धरना नहीं दिया था। यह दीगर बात है कि राज्य बनने के बाद लूट-खसोट के लिये यही पार्टियाँ सत्ता पर काबिज हुईं।
स्वामी रामदेव द्वारा रामलीला मैदान पर अनशन करना अण्णा हजारे के अभियान की प्रतिक्रिया ज्यादा लगता है। उन्हें लगा होगा कि अण्णा बाजी मार ले गये और वे पिछड़ गये। अनशन से पहले किसी अतिथि राष्ट्राध्यक्ष की तरह हवाई अड्डे पर बाबा का सम्मान करने के बाद केन्द्र सरकार एकदम सख्त हो गई और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में बढ़त बनाने की स्वामी रामदेव की मंशा धरी की धरी रह गईं। फिर एकाएक उनका स्वास्थ्य खराब होने और उनके अस्पताल में भर्ती किये जाने की खबरें आने लगीं। यह समझ में नहीं आता कि प्राणायाम से कैंसर और एड्स ठीक कर देने वाला योगगुरु महज छः दिन में कैसे पस्त हो गया ? चार-पाँच दिन का उपवास तो कोई सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है। अभी-अभी आपके पड़ौस में स्वामी निगमानन्द खनन माफिया के खिलाफ लड़ते हुए 64 दिन का अनशन कर शहीद हुए। उससे पूर्व 2004 में बाबा मोहन उत्तराखंडी ने गैरसैंण राजधानी की माँग को लेकर 38 दिन का उपवास कर प्राण तजे।
अब जब श्री श्री रविशंकर ने स्वामी रामदेव को जूस पिला कर एक जटिल परिस्थिति से उन्हें निकाल दिया है, हमें यह कामना करनी चाहिये कि बाबा जल्दी स्वस्थ हो जायेंगे और उसके बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन को एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी के चेयरमैन की तर्ज पर नहीं चलायेंगे। अपने बड़बोलेपन पर नियंत्रण रखेंगे और दिग्विजय सिंह के भौंकने या सुषमा स्वराज के नाचने से निर्लिप्त रहेंगे। इस देश में स्वाधीनता संग्राम के दौर के भी इक्के-दुक्के लोग सक्रिय हैं और जयप्रकाश आन्दोलन के तो सैकड़ों लोग समाज बदलने की लड़ाई में जुटे हैं। ऐसे अनुभवी लोगों का मार्गदर्शन लेने से उनके अहं को कोई ठेस नहीं पहुँचनी चाहिये। उन्हें एनकाउण्टर से भयभीत होकर ग्यारह हजार की सेना बनाने का विचार भी छोड़ देना चाहिये, क्योंकि एक काबिल सत्याग्रही तो अकेले एक फौज के बराबर होता है। उन्हें संतोष भी होना चाहिये कि उनके अनशन को मीडिया ने तूफान बना दिया, अन्यथा मणिपुर की ईरोम शर्मिला चानू तो दस साल से गांधीवादी तरीके से उपवास कर रही हैं, उन्हें कोई अखबारवाला पूछता भी नहीं। स्वामी रामदेव ने संचार माध्यमों का कुशल उपयोग कर जिस तरह प्राणायाम को जन-जन के लिये सुलभ कर दिया और जिस तरह विदेशों में जमा काले धन का मुद्दा सामान्य भारतीय के दिमाग में ठोंक-ठोंक कर बैठा दिया, वही किसी एक व्यक्ति के लिये कम उपलब्धि नहीं है।
बहरहाल, हमारा रिश्ता स्वामी रामदेव के साथ प्राणायाम के कारण था और अब भी बहुत नियमित न सही, हम स्वामी जी के सिखाये प्राणयाम करते ही हैं…..