तुम नज़रें उठाने लगती हो
तो धड़कने लगता है इस
दुनिया का
रुपहला दिल, हे भारतमाता !
नारंगी खुशबू उड़ती है
और मैं बंद कर देता हूँ
अमरकोश![]()
तुम्हारा अर्थ करने का व्यर्थ
प्रयास
आसपास रूपहला दिल यहाँ
आसपास नारंगी खुशबू यहाँ
और जिसे ग़रीबी की नहीं कोई
पहचान
वह दस गुना अमीरी भी यहाँ
कहाँ से लाऊँ अब मैं
तुम्हारे लिये इस दुनिया को
देखने का
एक ऐनक धूल से सना
तुम्हारी थक कर बंद हो चुकीं
उदास गहरी आँखें
तुम्हारा बीत चुका-सा करिश्मा
कैसे रोपने की हिम्मत करूँ
तुम्हारे रूपहले दिल पर
अपने दर्द का यह झुनझुना
तुम्हारा सामुद्रिक विजेता
पागलपना
कैसे दिखा दूँ तुम्हें कड़वी
कसैली
मौत की अकाल गिरती शाख़
और मौसम जाड़े का
सूना-सूना
तुलसी परब
(मराठी कवि)
(साभार: समकालीन भारतीय साहित्य)