बिनसर वन्य जीव विहार प्रभावित गाँवों में जंगली जानवरों के आतंक से ग्रामीण दहशत में हैं। खुंखार जंगली जानवरों से खेती-पाती तो चौपट हो ही गई जान का खतरा भी बढ़ते जा रहा है। आलू, गडेरी व अन्य साक-शब्जियों के लिए प्रसिद्ध इस इलाके में धान, गेहूँ आदि की फसल भी काफी अच्छी होती थी लेकिन ‘विनसर वन्य जीव विहार’ बनने के कुछ वर्षों बाद से बढ़ते जंगली जानवरों के आतंक से यहाँ की खेती चौपट हो गई। कृषि व पशु पालन यहाँ के वाशिन्दों का मुख्य व्यवसाय है जो जंगल पर आधारित है। जंगल के छिन जाने व जंगली जानवरों का विहार बन जाने से यहाँ जीवन-यापन मुश्किल हो गया है।
शुरू में लोग बाघ के आतंक से त्रस्त थे लेकिन अब जंगली सुअरों के झुंड आकर फसल चौपट करने के साथ ही ग्रमीणों पर भी झपटने लगे हैं। पिछले वर्ष ताकुला विकास खंड के ग्राम सभा सुनोली के तोक गाँव तिलकपुर में 31 जनवरी को बसन्त पंचमी के दिन प्रातः तीन-चार सुअर घुस आये थे और उन्होंने तिलकपुर ही नहीं हड़ौली, भैंसोड़ी के आधे दर्जन से अधिक महिला-पुरुषों को घायल कर दिया। यहाँ इस तरह के हादसे विनसर के दूसरी तरफ के गाँवों में भी होते रहे हैं। इधर ठीक एक साल के भीतर बसन्त पंचमी के दो दिन पूर्व 18 जनवरी को सुनोली ग्राम सभा के बालम सिंह भाकुनी व हयात सिंह भाकुनी को घायल कर दिया। इसके चार दिन बाद 22 जनवरी को तिलधार के उमेद सिंह का पैर सुअर ने बुरी तरह जख्मी कर दिया। हिंसक जानवरों से जान-माल की सुरक्षा और इनसे हुई क्षति का मुआवजा देने की मांग ग्रामीण पिछले बीस वर्षों से लगातार करते आ रहे हैं। इसी सिलसिले में 19 जनवरी को विभिन्न संगठनों की अगुवाई में क्षेत्र के ग्रामीणों ने बसौली में एक बैठक कर वन विभाग से हिंसक जंगली जानवरों से बचाने की गुहार लगाई है। कॉर्बेट नेशनल पार्क के निदेशक को एक ज्ञापन भेजकर इन लोगों ने कहा है कि तेंदुआ आये दिन मवेशियों को अपना शिकार बना रहा है, जबकि जंगली सुअर, सेही, बन्दर आदि फसल चौपट कर रहे हैं। अकेले सुनोली गाँव में ही एक वर्ष के भीतर सुअरों ने एक दर्जन लोगों को घायल किया है। बिनसर वन्य जीव विहार के राजि अधिकारी के माध्यम से भेजे गये इस ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि अभयारण्य प्रशासन ग्रामीणों की समस्याओं की अनदेखी कर रहा है। तेंदुओं द्वारा मारे गये पशुहानि संबंधी मुआवजे का भुगतान वर्षों से लम्बित पड़ा है। फसल की क्षति का मुआवजा शासनादेश के बावजूद नहीं दिया जा रहा है, न ही सुअरों को मारने की अनुमति दी जा रही है। जबकि शासनादेश में पत्र प्राप्ति के एक सप्ताह के भीतर सुअरों को मारने अथवा न मारने की अनुमति का निर्णय लेते हुए ग्रामीणों को बताना जरूरी है। अतः सुअरों को मारने की तत्काल अनुमति दी जाय। फसल क्षति और मवेशियों के मुआवजे का भुगतान भी यथाशीघ्र किया जाये।
ज्ञापन में कहा गया है कि कृषि व पशुपालन के चौपट होने से क्षेत्र के कई ग्रामीण निजी प्रयासों से पर्यटन व्यवसाय चला रहे हैं। लेकिन 1 जनवरी 2010 से बिनसर में पर्यटकों से लिये जाने वाले प्रवेश शुल्क में की गयी बेतहाशा वृद्धि के चलते उनकी आजीविका पर भी हमला हुआ है। मात्र 47.07 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैले बिनसर अभयारण्य के भीतर 5 गाँव, 5 निजी स्टेट सहित कई सरकारी एवं निजी विश्राम गृह हैं। इस अभयारण्य से 85 राजस्व गाँव प्रभावित हैं। इसलिए अन्य संरक्षित क्षेत्रों की भाँति यहाँ भी वैसे नियमों को लागू करना अव्यावहारिक है। अतः पर्यटन शुल्क को पूर्ववत रखा जाय।
बिनसर जंगल को बचाये रखने तथा यहाँ के नैसर्गिक सौन्दर्य को बनाये रखने में यहाँ के ग्रामीणों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अतः बिनसर में प्रवेश शुल्क से प्राप्त धनराशि का 50 प्रतिशत प्रभावित गाँवों के विकास में खर्च किया जाय। उ. संसाधान पंचायत के संयोजक ईश्वर जोशी, ग्राम प्रधान संगठन ताकुला के अध्यक्ष चन्दन सिंहबिष्ट, डी.वाई.एफ.आई. के दिनेश पाण्डे तथा पर्यटन विकास समिति के शेखर जोशी की ओर से दिये गये ज्ञापन में चेतावनी दी गई है कि उपरोक्त समस्याओं का समाधान न किये जाने पर क्षेत्र की जनता 10 फरवरी 2010 को राजि कार्यालय, विनसर वन्य जीव विहार, अयारपानी, अल्मोड़ा के समक्ष-धरना प्रदर्शन कर आन्दोलन प्रारम्भ करेगी, जिसकी सारी जिम्मेदारी अभयारण्य प्रशासन की होगी।
इस बीच सूचना मिली कि 26 जनवरी की प्रातः पाँच बजे एक बाघ ने भट्ट गाँव निवासी पूरन चन्द्र भट्ट जी के घर में घुस उनकी पत्नी हीरा देवी (59 वर्ष) को जख्मी कर दिया। बाद में ग्रामीणों की सहायता से उन्हें जिला चिकित्सालय पहुँचाया गया। इस घटना से गाँवों में दहशत ब्याप्त है और विनसर वन्य जीव विहार प्रशासन के प्रति आक्रोश और बढ़ गया है। ग्रामीणों की शिकायत है कि वन्य जीव विहार प्रशासन स्वयं कहता है कि एक एक बाघ के लिए 15 किमी. परिधि का जंगल होना आवश्यक है। विनसर अभयारण्य का क्षेत्रफल 45.47 वर्ग किमी. है और 2001 की गणना के अनुसार इसके भीतर बाघों की संख्या 18 आंकी गई जबकि इन आठ वर्षों में बाघों की संख्या बढ़ी ही होगी। मई 1988 में इस वन क्षेत्र को ‘वन्य जीव विहार’ घोषित कर देने के बाद इस पर निर्भर ग्रामीणों के समस्त परम्परागत अधिकार व हक-हकूक बंद कर दिये गये। तबसे हर साल यह जंगल जलते रहता है और यहाँ से लकड़ी की तस्करी कर बाहर भेजी जाती रही है। चौड़ी पत्ती के वन खत्म होते जा रहे हैं और चीड़ का जंगल तेजी से बढ़ रहा है। इससे जल स्रोत सूख गये हैं। ग्रामीण अपने ही वन से अब चोरी-छिपे ईंधन व चारा-पत्ती लाने को मजबूर हो गये हैं। इसीलिए ग्रामीण जंगल की सुरक्षा व आग लगने पर उसे बुझाने नहीं जाते। वन क्षेत्र की सघनता व जैव विविधता खत्म होती जा रही है। यही कारण है कि जंगली जानवर अपने भोजन की तलाश में आबादी की ओर रुख कर रहे हैं।