प्रस्तुति : हेमन्त तिवारी
गांधी जी की एक प्रसिद्ध प्रार्थना है, ‘वैष्णवजन तो तेने कहिये।’ आशय दूसरे के दर्द को समझ उसे दूर करने की कोशिश से था। समाज के दर्द को समझने व उसे एक आवाज देने को लेकर गाँव का एक शख्स आज एक प्रतीक बनता जा रहा है। 60 वर्ष की अवस्था में भी एक युवा क्रांतिकारी की तरह समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं ‘बिशन दा’।
गांधी जी के सत्याग्रह की राह चल कर बिशनदा ने जिले में विभागीय अनियमितताओं व भ्रष्टाचार के विरुद्ध लडाई छेड़ रखी है। इस मिशन को उन्होने ‘धरातल का सत्य’ नाम दिया है। रोज एक विभाग के आगे एक दिवसीय धरना दे देने के बाद अब बिशनदा बागेश्वर के प्रसिद्ध चौक बाजार पर हर रोज धरना देने के साथ ही लोगों को जागरूक भी कर रहे हैं। उनकी बातों पर हर कोई कहता फिरता है कि काश तुम्हारा सपना सच हो जाए! बिशनदा का कहना है कि गाँवों में जब अधिकारियों ने ही ध्यान देना छोड़ दिया तो अब जनता आम कर्मचारियों को क्या कहे ? वे कहते हैं कि बिजली विभाग ने गढियातोक गाँव के लिए जब अपनी आँखें ही बंद कर रखी हों तो उससे बिजली की बात करना अब बेमानी लगता है। शिक्षा विभाग सोचता है कि गाँव की पीढ़ी ने पढ़-लिख कर क्या करना है और पेयजल महकमा तो मानता है कि ग्रामीण तो काफी जीवट होते हैं, कम पानी में या फिर पहाड़ी स्रोतों से ही इनकी गुजर-बसर हो जाती है। इधर पूर्ति विभाग को गाँव में अनाज पहुँचाने के बजाय उसे बेच अपनी जेब गर्म करने की रहती है। बिशनदा ने ठान रखी है कि अगर समय रहते विभाग नहीं चेते तो सत्याग्रह को उग्र रूप दिया जायेगा।
जिले के अति दुर्गम गाँव डोबा के गडियातोक निवासी बिशन सिंह कई वर्षों से जनता के मुद्दों को जोर शोर से उठा रहे हैं। चिपको आन्दोलन से लेकर राज्य आन्दोलन हो या फिर ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याएँ, हर जगह उनकी उपस्थिति रहती है। चिपको आन्दोलन में डोबा के लेटी गाँव के जंगल में बालम सिंह जनौटी के नेतृत्व में उन्होंने एक ठेकेदार प्रीतम सिंह व उसके कामगारों को भागने पर मजबूर कर दिया था। इसी तरह नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन के दौरान बड़े स्तर पर जागरूकता फैलाने, धरना प्रदर्शनों आदि में खुलकर सहयोग किया था। राज्य आन्दोलन में भी उन्होंने अपने गीतों से जनता को प्रेरित किया।
उत्तराखण्ड बनने के बाद आम जनता की तरह बिशन सिंह ने देखा कि जनता की उम्मीदें ध्वस्त हो गई हैं। समस्याएँ जस की तस थीं। राज्य का लाभ केवल अधिकारी व नेता ले रहे थे। यह सब देखकर उन्होंने फिर लड़ने का मन बनाया और एक मंच ही बना डाला। एक अगस्त 2006 को ‘गाँव गरीब महिला उत्थान मंच’ के नाम से स्थापित इस बैनर के तहत नये सिरे से लड़ाई शुरू कर दी। इस लड़ाई में उनकी पत्नी कमला टंगड़िया ने भी उनका साथ दिया।
एक से तीन अगस्त 2006 तक उनकी पत्नी ने डोबा में आमरण अनशन किया जो कि प्रशासन के आश्वासन के बाद तोड़ दिया गया। इसके बाद स्थानीय माँगों को लेकर डोबा के ग्वालबाल मन्दिर में 15 से 23 नवम्बर तक आमरण अनशन किया। दस सूत्रीय माँगो को लेकर मंच ने अपना आन्दोलन जारी रखा। वर्ष 2009 में 32 दिन का धरना व सात दिन का आमरण अनशन चलाया। 2010 की शुरूआत से ही अब तक आठ बार अपनी माँगो को लेकर उनके द्वारा धरना जुलूस व उपवास किया जा चुका है। अव्यवस्थाओं के विरुद्ध आवाज मुखर किये हुए बिशन सिंह टंगड़िया लोकगायक भी हैं। उन्होंने आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के माध्यम से कई स्वरचित गीत भी गाये हैं।
























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