महिला समाख्या द्वारा प्रकाशित ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे…’ पुस्तक पर एक दिवसीय गोष्ठी देहरादून के अकेता होटल में आयोजित की गई। विषय प्रवेश करते हुए महिला समाख्या की राज्य निदेशक गीता गैराला ने कहा कि “बोल की लब आजाद हैं तेरे” महिला दिवस की सौवी वर्षगांठ पर महिला समाख्या द्वारा उन महिलाओं के हक में की गई एक पहल है जिन्होंने अपने संघर्षों को अपना हथियार बनाकर बेहतर समाज और दुनिया के लिए पहल की। इस पुस्तक में कमला, अनामिका, मधुली, सितारा, मोहिनी, सुनीता, नंदी और मंगला जैसी उन महिलाओं के जीवन पर लिखा गया है जिन्हें अपने घर के लोगों पति, देवर, सास, ससुर और यहाँ तक कि ननद के हाथों हिंसा का शिकार होना पड़ा था।
प्रसिद्ध कथाकार सुधा अरोड़ा ने कहा कि हमारे देश में महिलाओं के लिए संघर्ष करने वाले संगठनों के प्रति भी समाज दुराग्रहों से ग्रसित रहता है। यहाँ तक कि इस प्रकार के संगठनों को घर तोड़ू दस्ता के रूप में जाना जाता है। उन्होंने कहा कि माँ-बाप केवल शादी करने तक ही बेटी के प्रति अपना दायित्व समझते हैं। ससुराल में औरत के लिए विकल्पहीनता की स्थिति बन जाती है। साहित्यकार सिद्धेश्वर सिंह ने ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे…’ को एक महत्वपूर्ण शुरूआत बताया तो सुप्रसिद्ध दलित कथाकार ओमप्रकाश बाल्मीकि ने महिलाओं की लड़ाई को रामायण के उस प्रसंग से जोड़ा, जहाँ राम ने सीता से कहा कि मैंने यह युद्ध तुम्हारे लिए नहीं अपने कुल की मर्यादा के लिए लड़ा था। बाल्मीकि ने कहा कि पढ़े-लिखों के बीच महिलाओं के प्रति अपराध अधिक हो रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता वीरेन्द्र पैन्यूली ने कहा कि राज्य आन्दोलन में महिलाएँ बराबर की भागीदार रहीं, लेकिन उनकी भूमिका को भुला दिया गया। कृष्णा खुराना और जनकवि अतुल शर्मा ने कहा कि इन महिलाओं के दर्द को सुनना और उसे शब्दों में पिरोना भी किसी यातना से कम नहीं था। ऐसे में यह समझा जा सकता है कि इन महिलाओं ने कितना दर्द सहा है। इन कहानियों के जरिए उत्तराखंड ही नहीं, पूरे देश और दुनिया की महिलाओं के संघर्ष को समझा जा सकता है। साहित्यकार सुभाष पंत ने आँकड़ों के माध्यम से बताया कि महिलाओं के प्रति होने वाली
हिंसा एक गंभीर समस्या है।
कमल जोशी ने ‘बोल के लब आजाद हैं तेरे…’ में उल्लिखित कहानियों में टिहरी की कमला के जीवन का उदाहरण देते हुए बताया कि ससुराल से पीडि़त औरत को मायके से भी सहारा नहीं, सिर्फ दिखावा मिलता है। अनामिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पुरुष को कोई सफाई नहीं देनी पड़ती, जबकि अनामिका की तरह औरत पर गैर के साथ संबंध होने के आरोप अकारण भी लग जाते हैं। नौकरी के कारण परदेश में रह रहे पति की अनुपस्थिति में ससुर से दैहिक शोषण झेल रही मधुली का उठ खड़ा होना औरत को सबला बनने की प्रेरणा देता है। सितारा पर चर्चा करते हुए गीता गैरोला ने दहेज और झूठ बोल कर की जाने वाली शादियों के दुष्चक्र के बारे में चर्चा की कि किस प्रकार पढ़ा-लिखा होना भी लड़कियों के शोषण का बहाना बन जाता है। ‘बोल की लब आजाद हैं तेरे…’ में इसी तरह सुनीता, नंदी और मंगला जैसी ऐसी ही संघर्षशील महिलाओं की कहानियाँ हैं।
गोष्ठी में प्रदेश भर से पहुँची महिलाओं के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।
kabhi divaron me chuni jati hai kabhi bistar me kya aurat ka badan ke siva koi vatan nahi……………!