स्मारक ग्रन्थ एक मायने में महत्वपूर्ण होते हैं, क्योकि इसमें संग्रहीत लेखों से सम्बधित व्यक्ति के व्यक्तित्च का समग्र आँकलन संभव होता है। उस व्यक्ति, जिसको हम सिर्फ अपने नजरिये से देखते रहे, को अब बहुतों के नजरिये से देखते-समझते हैं। केदार सिंह कुंजवाल से सामान्य रूप में परिचित कोई भी व्यक्ति उन्हें एक सर्वोंदयी के रूप में जानता है। उनके देहावसान के करीब 3 वर्ष बाद उनकी स्वयं की रचनाओं व परिचितों-प्रशंसकों के सस्मरणों का संग्रह ‘ऐच्छिक वनवास’, जिसका लोकार्पण 6 मार्च 2010 को उनके जैंती (अल्मोड़ा) स्थित मूल निवास व उनकी ग्रामोद्योग संस्था पर्वतीय ग्राम स्वराज्य मंडल के प्रांगण में हुआ, इसी दृष्टि से उनके व्यक्तित्व के विविध आयामों को उदघाटित करता है।
उनके पुत्र दिनेश ने अपने पिता को याद करते हुए लिखा है:- ‘‘…….इस सब के अलावा मेरे पिता एक कवि थे, उनकी जीवन यात्रा के हर पड़ाव, हर मोड़ पर दृश्य बदलते रहे। स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्र निर्माण, बुनियादी तालीम, भूदान, ग्राम दान, वनवासी सेवा, दलितोत्थान, ग्राम सफाई, शहरों में स्वच्छक कष्ट मुक्ति योजना, सामाजिक बराबरी, मद्य निषेध, पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन, वर्षा जल संचय, निर्धूम चूल्हा, गोबर गैस, जड़ी-बूटी, खादी ग्रामोद्योग, पारंपरिक तकनीकी में सुधार, आध्यात्मिक उत्थान संस्कार केन्द्रों का गठन और न जाने क्या क्या…..।’’
हालाँकि एक पुत्र से अधिक एक पिता को गहराई से और कौन जान सकता है। लेकिन यह सूची किसी को अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकती है। मगर इस पुस्तक में 80 से अधिक लोगों के संस्मरणों को पढ़ने पर यह ‘अतिशयोक्तिपूर्ण’ सूची भी केदार सिंह कुंजवाल के व्यक्तित्व को उभारने के लिए छोटी लगती है।
राधा बहन उन्हें याद करते हुए लिखती हैं- ‘‘गाँव में बसे भारत को सही स्वराज्य, सही स्वतंत्रता देने के लिए दाज्यू ने गांधी विचारों के अनुरूप अपनी उस नयी उम्र में गाँव ही नहीं, आदिवासी क्षेत्रों की ओर अपने कदम बढ़ाये थे। जिस युवा उम्र में युवा मन नगरी चमक-दमक से खिंच कर शहरों में चले जाते हैं, उस उम्र में वे मिर्जापुर के आदिवासी गाँव में अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ सेवा करने चले गये, जहाँ कोई सुविधा नहीं थी। शमशेर सिंह बिष्ट लिखते हैं- ‘‘….गांधी व गांधीवाद के प्रति हमारा पूर्वाग्रही होना स्वाभाविक था। लेकिन गांधीवाद व गांधीवादियों के प्रति नकारात्मक मिथक तोड़ने वालों में जो लेाग थे, उनमें से एक केदार सिंह कुंजवाल भी थे।
1977 में जयप्रकाश नारायण के गिरते स्वास्थ्य के कारण जेपी से जुड़ी उनकी यादें ताजा हो गयीं और वे काफी व्यथित हो गये। उन्होंने काँग्रेस छोड़ने का मन बना लिया और इस आशय का प्रेस नोट हरीश जोशी ने तैयार किया जो लिखते हैं- ‘‘….. अल्मोड़ा प्रेस नोट लेकर जनता पार्टी कार्यालय गये, जहाँ जिला स्तर के तमाम नेता- सोशलिस्ट, संघी, पुराने कांग्रेसी बैठे थे। यह खबर सुनते ही सबके चेहरे उतर गये। (मैं सोचता था कि सब खुश होंगे कि इससे पार्टी मजबूत होगी)। उन सबको अपना एक प्रबल प्रतिद्वंदी नजर आने लगा। इस किताब से उनके कई पहलू सामने आते हैं। जैसे कि वे एक समाज सुधारक के साथ-साथ एक तकनीशियन थे। इलाहाबाद एग्रीकल्चरल इंस्टीट्यूट से शिक्षा ली थी। और तो और रुड़की विश्वविद्यालय के डीन विनोद गौड़ ने उन्हें अपने यहाँ शोध सुविधा प्रदान करने का प्रस्ताव किया था। या कि वह एक समाज सुधारक थे, जिन्हे अपने ही गाँव में सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा (कि उनके गाँव के एक दलित जीतराम आर्य ने लिखा कि गाँव में सवर्णों व शिल्पकारों की अलग-अलग होली नहीं होनी चाहिये। उनके मार्गदर्शन में कुछ वर्षों तक संयुक्त होली मनायी गयी, जो एक इतिहास रहा। बाद में यथास्थितिवादियों को पसंद नहीं आया और कुंजवाल जी को सपरिवार ग्राम समाज से बहिस्कृत कर दिया)। यह तथ्य भी सामने आता है कि उन्होने एप्रोप्रिएट टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में कई अनुसंधान किये। (हरीश जोशी बताते हैं कि उनके द्वारा विकसित बागेश्वरी चरखे को एक अंग्रेज पीटर टील ने अपनी ईजाद दर्शा कर पेटेंट करवाने की कोशिश की।)
बी.आर. चौहान, जो खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के राज्य निदेशक हैं, ने अपने संस्मरण में कहा था कि एन.डी. तिवारी केदार सिंह कुंजवाल को व्यक्तिगत तौर पर जानते थे और उन्हें कोई बड़ा पद देना चाहते थे। तिवारी जी कहते थे कि कुंजवाल ही खादी के जानकार हैं। सालम क्षेत्र के एक ग्राम प्रधान कृष्ण राम आर्य सालम क्षेत्र में सबसे पहली बैल चक्की, पहली डीजल इंजन चक्की, पहली दियासलाई फैक्टरी लगाने का श्रेय कुंजवाल को देते हैं।
पुस्तक से हमें यह भी पता चलता है कि उन्होने ‘काँ छै निर्मोहिया’ नाम से कुमाउनी गीतों का कैसेट बनाया, जिसमें उनकी पुत्रियों सुमन व किरन ने अपनी आवाज दी थी। उनका कविता संग्रह ‘बादलों की गोद’ को काफी सराहा गया था। कवि जुगल किशारे पेटशाली अपने सस्मरण में लिखते हैं कि डाले आश्रम में कई योगी, संत, बाबा लोग रहते हैं, क्षमा चाहते हुए यह कहना चाहता हूँ कि उनमें भी कहीं न कहीं अहं का टकराव था। लेकिन कुंजवाल जी के सामने सभी अपने अहं को भूल जाते, उनका लिया हुआ निर्णय ही सर्वमान्य होता।
संभवतः उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के जिक्र के बाद कुछ सुधी पाठक यह जानना चाह रहे होंगे कि शायद अब उनको मिले पुरस्कारों की फेहरिस्त का जिक्र किया जायेगा। मगर उन्हें मैगसेसे, पद्मश्री या जमना लाल बजाज जैसे कोई पुरस्कार नहीं मिले। जहाँ एक तरफ यह तथ्य यह जाहिर करता है कि समाज में अपना योगदान देने के लिए व्यक्ति में जज्बा होना चाहिये न कि उसकी झोली में पुरस्कार, तो दूसरी तरफ यह इस तरह के सम्मानों, पुरस्कारों की दोषपूर्ण चयन प्रक्रिया को रेखांकित करता है।
अंत में इस कर्मयोगी, जो आत्मानुशासन के साथ ग्राम्य समाज की सेवा में साधनारत रहा, बाह्य आडंबर व मान सम्मान की तृष्णा से विरत रहा, के व्यक्तित्व के विविध आयामो को समझने में यह पुस्तक महत्वपूर्ण साबित होगी।
























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