उत्तराखण्ड में बूढ़ाकेदार का एक ऐतिहासिक महत्व है। यहाँ पर बूढ़ा केदार बाबा का पौराणिक मंदिर है, जिसके दर्शन करने आज भी सैकड़ों पैदल तीर्थ यात्री हर साल आते हैं। जब तक उत्तराखण्ड में सड़कों का विकास नहीं हुआ था, तीर्थयात्रियों के लिये बूढ़ाकेदार का एक महत्वपूर्ण स्थान रहता था। सड़कों के विकास के साथ तीर्थयात्री भी सुविधाभोगी बने और उनका बूढ़ाकेदार आना कम हुआ। ऐसा एक स्थानीय बुजुर्ग बता रहे थे। पहले यमुनोत्री, गंगोत्री के बाद तीसरा धाम केदारनाथ माना जाता था। बूढ़ाकेदार के बारे में कहते हैं कि बाबा केदार यहाँ कुछ समय तक रुके थे। किसी बंगाली रचनाकार ने बूढ़ाकेदार को ‘सागरमाथा’ नाम देकर अलंकृत किया है।
बूढ़ाकेदार बालगंगा व धर्मगंगा की संगमस्थली है। आगे बढ़कर यही नदी भिलंगना का रूप धारण कर लेती है। यह क्षेत्र हमारे देश का सीमांत क्षेत्र है। बूढ़ाकेदार से 10-12 मील उत्तर में गेंवाली गाँव हमारे प्रदेश व देश का सीमांत गाँव है। चीड़, देवदार व मिश्रित वनों से आच्छादित चोटियाँ व घाटियाँ एक अजीब सी शांति प्रदान करती हैं। सड़क के विकास व यात्रियों की समय का मोलतोल करने की नई आदत से किसी जमाने में तीर्थयात्रियों के लिये सुगम माना जाने वाला यह स्थान आज सड़क के विकास के बाद तीर्थयात्रियों के लिये दुर्गम जगह बन कर रह गई है। सड़क मार्ग इस क्षेत्र में इतने विकसित नहीं बन पाये कि गंगोत्री से बूढ़ाकेदार तीर्थ यात्रियों के लिये आसान हो।
बूढ़ाकेदार तक पहुँचने के रास्ते एक से अधिक हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश निर्माणाधीन हैं और जो बचे हैं वे खतरों से भरे हैं। इन सड़कों पर स्थानीय जुगाड़बाज व जोखिमबाज ड्राइवर ही गाड़ी चला पाते हैं। घनसाली से बूढ़ाकेदार तक सड़क पर कई मोड़ तो ऐसे हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि ये गाड़ियों को टकराने के लिये ही बने हों। यात्रियों को ठहराने की व्यवस्था घनसाली में कुछ बेहतर है, परन्तु बूढ़ाकेदार में लोक जीवन विकास भारती आश्रम के अलावा कोई दूसरा उचित स्थान नहीं है। समझ में नहीं आता कि देवभूमि के रूप में उत्तराखण्ड की देश-दुनिया में जो पहचान है, उसे संजोने का न तो हमारे समाज के पास कोई जज्बा दिखता है और न ही सरकार का इस ओर ध्यान जाता है। एक ओर जहाँ सरकार के बनाये गये पर्यटन निगम ‘रिडिस्कवर गढ़वाल’ व ‘रिडिस्कवर कुमाऊँ’ की बात कर रहे हैं, वहीं करोड़ों लोगों की आस्था के ये केन्द्र धूल खा रहे हैं। राज्य बनने के बाद बूढ़ाकेदार के दर्शन करने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या क्यों नहीं बढ़ पा रही है, हिन्दू सभ्यता की पैरवी करने वाली उत्तराखण्ड की मौजूदा सरकार के लिये भी यह महत्वपूर्ण विषय नहीं बना। अन्यथा तो यह काम सभी प्रतिनिधियों व सरकार के लिये मुख्य होना चाहिये।
स्थानीय लोगों के लिये यह महत्वपूर्ण मुद्दा है कि बूढ़ाकेदार पहुँचना सुगम हो, अधिक से अधिक इसका प्रचार-प्रसार हो। कैसे स्थानीय समाज की आर्थिकी को इससे जोड़ा जाये। इन सवालों पर यहाँ के लोगों को गम्भीरता से सोचना होगा। गुनसोला हाइड्रोप्रोजेक्ट के बहाने गत माह माननीय मुख्यमंत्री जी ने जरूर बूढ़ाकेदार के दर्शन किये, परन्तु इस क्षेत्र के वास्तविक विकास की चिंता न तो प्रतिनिधियों में थी और न ही माननीय मुख्यमंत्री के लिये।
मैं 15 साल पहले बूढ़ाकेदार आया था। तब और अब में जो फर्क देखा उससे निराशा ही हाथ लगती है। तब सीमित घर थे। गंदगी कम थी। सड़कें भी कम थीं। अब बूढ़ाकेदार में लोगों ने कुछ टेढ़े-मेढ़े किसी तरह से टिके रहने वाले कई मकान जरूर बना डाले हैं। गंदगी में भी यहाँ इजाफा हुआ है। निश्चित तौर पर भारतीय पुरातत्त्व विभाग मंदिर का निर्माण कर रहा है, उसमें गुणवत्ता भी दिखती है। परन्तु निर्माण कार्य की गति बहुत ही धीमी है।
आज का तीर्थयात्री बदल गया है। वह ईश्वर दर्शन के साथ स्थानीय समाज, प्रकृति व सुविधाओं को भी बारीकी से देखता है। आस्था के साथ-साथ ये भी उसके जरूरत के मुद्दे हैं। यह बात भी कुछ हद तक सही है कि पहाड़ों को जोड़ने का हमारे पास अभी तक सबसे बेहतर माध्यम सड़के हैं। लेकिन जिस ढंग, समझ व तरीकों से ये सड़कें बनाई जा रही हैं वह चिंतनीय है। कब सड़क का पुस्ता गिर जाये तथा कब सिर पर किसी दूसरी सड़क का पत्थर गिर जाय, कुछ भी कहा नहीं जा सकता। पहाड़ के सौन्दर्य पर ये सड़कें दाग जैसी दिखती हैं। पिछले कुछ महीनों में गंगोत्री, यमनोत्री व बदरीनाथ रोड पर कई तीर्थ यात्रियों से मिलना हुआ। ज्यादातर से बातचीत के बाद लगा कि वे आये खुशी के साथ थे, परन्तु जाते समय कटु अनुभवों के साथ जा रहे हैं। गंदगी, अव्यवस्था, सड़कों के खतरे आदि मुद्दे पर लोग सुधार की बातें करते हैं।
खैर बात करें बूढ़ाकेदार की। बूढ़ाकेदार बाबा अपने भक्तों से मिलने को बेताब हैं। भिलंगना घाटी के सैकड़ों परिवारों के लिए यह रोजगार की सम्भावना से भरा है। ऐसा लगता है कि बूढ़े बाबा केदार अपने भक्तों को पुकार रहे हों। कैसे यह पुकार सार्थक हो ? इसके लिये बूढ़ाकेदार तक तीर्थयात्रियों के लिये बुनियादी व्यवस्थाओं (सड़क, आवास, प्राकृतिक सौन्दर्य संरक्षण आदि) काम करना होगा। यह बात स्थानीय प्रतिनिधियों को भी समझनी चाहिये और जोर-शोर से उठानी चाहिये। हमारे जनप्रतिनिधियों के मनों में इन ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति गौरव का भाव तथा इनके संरक्षण करने की इच्छाशक्ति हो तो बूढ़ाकेदार जैसे ऐतिहासक स्थान स्थानीय आजीविका को बढ़ाने व पलायन को रोकने का एक महत्वपूर्ण जरिया भी बन सकता है।























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