[पिछ्ले अंक में आपने 17 से 22 जनवरी तक चली पदयात्रा की पहली रपट पढ़ी...आज पढ़िये उससे आगे]
लोध में सम्पन्न हुई बैठक में पता चला कि इन गाँवों की जमीन बिल्कुल बिकी नहीं है, क्योंकि यहाँ सड़क भी अब जाकर आ रही है तथा हिमालय का दृश्य भी यहाँ से उतना सुन्दर नहीं दिखता। परन्तु इस ग्रामसभा के पास अपना जंगल नहीं है। लोध ग्रामसभा नथुवाखान से अलग कर बनाई गई तो यह निश्चित किया गया कि तीन दिन जंगल जाने का अधिकार नथुवाखान में मिलेगा। परन्तु यहाँ के लोगों ने नथुवाखान के जंगल को इतना नुकसान पहुँचाया कि वहाँ वालों ने इनका वहाँ के जंगल जाना बंद करवा दिया। अब यहाँ की महिलाएँ लकड़ी, घास, चारा-पत्ती लाने लाट जंगल में जाती हैं, जिसका रास्ता ‘क्लाउड नाइन’ ने बन्द करवा दिया है।
महिलाएँ रास्ता खोलने की माँग को लेकर जब बैठकों में या अधिकारियों के पास गईं तो लोगों ने आरोप लगाया कि ग्राम प्रधान की रिपोर्ट करने गईं हैं। इस तरह गाँव में वाद-विवाद जन्म ले रहा है और घर के पुरुष महिलाओं के बैठकों में जाने के प्रति नापसंदी दिखाते हैं। सयानी महिलाएँ कहती हैं कि हम तो लकड़ी, घास सही ढंग से ले आये पर अब इन बहुओं के लिए बहुत कठिनाई हो गई है। अनेक प्रकार के बाहरी लोग जमीन खरीदकर यहाँ तरह-तरह के अवैध काम करने लगे हैं, जिससे पुश्तों से यहाँ रह रहे लोगों का जीवन कठिन हो गया है। कुछ कम उम्र की बहुओं ने कहा, हम तो चार बजे उठ कर दिन की रोटी साथ लेकर जंगल को जाते हैं पर राणा के आदमी हमें डरा-धमका कर वापस कर देते हैं। बिना लकड़ी के इनका काम नहीं चलता। 310 रुपया गैस भराई का नहीं दे सकते।
सतबुंगा तथा खपराड़ के जंगलों से आसपास के 10-15 गाँवों की महिलाएँ पुराने समय से लकड़ी, घास, चारा-पत्ती ला रही हैं। दुत्कानेधार में भी पहले जंगल था। अब समस्या यह है कि पहले जंगल कट कर बगीचे बने, अब बगीचे कट कर रिसोर्ट या फ्लैट बन रहे हैं,जिससे गाँवों के लिए लकड़ी, चारा-पत्ती के साथ-साथ पानी की समस्या भी विकराल हो रही है। यह किसी को नहीं पता कि ये बिल्डर अपना नक्शा पास करवाते समय पानी की उपलब्धता कैसे दिखाते हैं? जे.बी.सी. मशीनें लगवाकर वे जमीन काट रहे हैं, जबकि जे.बी.सी. मशीन का प्रयोग करने की अनुमति केवल सड़क निर्माण के लिए है। पुश्तैनी रास्तों को बन्द करने की अनुमति वे कहाँ से ले रहे हैं ? यदि कोई अनुमति नहीं ली गई है तो सरकार क्या कर रही है और जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं ? राणा का आतंक इतना है कि कुछ युवकों ने कहा दुत्कानेधार से सतबुंगा तक हम नहीं आ सकते। फिर आपके साथ आयेंगे। यह भी तथ्य है कि बिल्डरों के यहाँ दो-दो हजार रुपए की नौकरी कर रहे लोग उनके खिलाफ संघर्ष में एकजुट नहीं हो सकते। पुरुष वर्ग शुरूआत में आन्दोलन में था पर धीरे-धीरे वे समझौते की बात करने लगे। समझौता भी इस नुक्ते पर कि राणा को स्रोत का पानी ऊपर ले जाने दिया जाये तो राणा जंगल का रास्ता खोल देगा। सूपी की बैठक में दान सिंह भण्डारी द्वारा कहा गया कि जल, जंगल, जमीन हमारा मुख्य मुद्दा है। इसमें हमें मिलजुलकर संघर्ष करने की आवश्यकता है। मैं इसके लिए हर तरह का सहयोग देने के लिए हमेशा जनता के साथ हूँ। पदयात्रा समाप्त होने के बाद 24 जनवरी को धारी एवं रामगढ़ क्षेत्र में जल, जंगल, जमीन सम्बन्धी मुद्दों पर की गई पदयात्रा की समीक्षा बैठक में विभिन्न संगठनों से आये प्रतिनिधि उपस्थित थे। समीक्षा बैठक में उत्तराखण्ड लोक वाहिनी के शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि उत्तराखण्ड को छोड़ सभी पहाड़ी राज्यों में जमीन खरीदने सम्बन्धी नियम बने हैं। ‘नयना ज्योति’ के सचिव विनोद पाण्डे ने कहा कि जंगल के मुद्दे पर बात करने के लिए जंगल के इतिहास और वन कानूनों को जानना आवश्यक है। हमारे यहाँ पर्यटन व्यवसाय भी जंगल पर आधारित है। बिना ग्राम सभा की अनुमति के कोई रिसोर्ट नहीं बना सकता, लेकिन फिर रिजोर्ट बन रहे हैं। इसके लिए स्थानीय स्तर पर लोगों को अपनी तर्क-वितर्क करने की क्षमताएँ बढ़ानी होंगी, क्योंकि जल, जंगल, जमीन की धुरी व्यक्ति है और उसकी भागीदारी आवश्यक है। ‘गांधी पीस फाउंडेशन’ की अध्यक्ष एवं लक्ष्मी आश्रम कौसानी की संचालिका राधा बहन ने कहा कि इस मुद्दे पर पहल करना एक चुनौती है। हम जल, जंगल, जमीन पर मुख्य रूप से ग्रामीणों के अधिकार को लक्ष्य मानकर चलेंगे तो इस तरह की पदयात्रा से ग्रामीणों को लाभ होगा। जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ ने कहा कि कोई भी लड़ाई एक दिन में नहीं लड़ी जाती।
पदयात्रियों का कहना था कि इस लड़ाई को हम आगे ले जाएँगे। उत्तराखण्ड महिला मंच की कमल नेगी ने बताया कि उत्तराखण्ड में जमीन बेचने की प्रवृति दो तरह से बढ़ी है-पहला स्वास्थ्य, शिक्षा एवं अन्य मूलभूत सुविधाएँ न मिलने के कारण लोगों का गाँवों से पलायन करना। दूसरा गरीबी के कारण जमीन बेचना। उत्तराखण्ड में दो तरह के लोग पनपे हैं, जिसमें एक जमीन खरीदने वाले और दूसरा बिचौलिये (जमीन दिलवाने वाले)। सरकारी मानकों के आधार पर एक व्यक्ति कितनी जमीन खरीद सकता है, इसकी हमें जानकारी लेनी चाहिए। सरकारी मानकों के आधार पर एक व्यक्ति को पाँच कॉटेज बनाने की अनुमति है लेकिन एक ही व्यक्ति द्वारा पच्चीस कॉटेज बनाये गये हैं। वन पंचायतों में सरपंच की भूमिका भी संदिग्ध दिखाई देती है। देखा गया है कि केवल गरीब ही जमीन नहीं बेचते हैं, बल्कि जिनके पास अधिक भूमि है या जो प्रभावशाली हैं वे भी जमीन बेच रहे हैं। बिल्डरों के आने से ग्रामीण समुदाय असुरक्षित महसूस कर रहा है और उनके परम्परागत रास्ते भी बन्द हो गए हैं। इनके अतिरिक्त स्थानीय स्तर से आये हुए लोगों द्वारा भी विचार रखे गये।
25 जनवरी को जल, जंगल, जमीन के मुद्दे पर जागृति महासंघ द्वारा एक जलूस निकाला गया जो रामलीला मैदान मल्लीताल से मालरोड होता हुआ नैनीताल जिला मुख्यालय पहुँचा और मुख्यमंत्री को सम्बोधित एक ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा। ज्ञापन में कहा गया कि-
- उत्तराखण्ड के नैसर्गिक रूप से सुन्दर स्थानों पर पिछले बीस वर्षों से उच्चाधिकारियों, बाहर से आये धनाढ्य व्यक्तियों तथा भूमाफियाओं ने जो जमीनें खरीदी हैं, वन भूमि पर अतिक्रमण किया है, वन संरक्षण अधिनियम 1980 का उल्लंघन किया है तथा खनन कार्य किया है, उसके बारे में तत्काल एक श्वेत पत्र जारी किया जाये।
- धारी तथा रामगढ़ विकास खण्डों में वन भूमि का, नाप-बेनाप भूमि सहित, तत्काल सीमांकन कर दीवालबंदी की जाए। वन संरक्षण अधिनियम 1980 का उल्लंघन करते हुए इस क्षेत्र में वन भूमि पर जो अतिक्रमण किया गया है, उसके दोषियों को दण्डित किया जाए। वन भूमि के सीमा पिलरों की सुरक्षा न करने वाले तथा उनके ध्वस्त होने पर उचित विभागीय कार्यवाही न करने वाले वन विभाग के कर्मचारियों-अधिकारियों को भी दंड दिया जाय।
- इस क्षेत्र में भूस्वामी होने के अधिकार से पुरुष भय, विवशता अथवा प्रलोभन के कारण सरासर जमीनें बेच रहे हैं। किन्तु बाद में होने वाली बरबादी का कहर महिलाओं तथा बच्चों को झेलना पड़ता है। अतः जमीन की बिक्री-खरीद के समय परिवार की स्त्रियों की उपस्थिति तथा हस्ताक्षरों को अनिवार्य किया जाए।
- खपराड़ क्षेत्र में भू मफियाओं द्वारा बंद किये गये महिलाओं के जंगल जाने के सभी परम्परागत मार्गों को तत्काल खुलवाया जाये तथा उनके जंगल आने-जाने के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित किया जाए।
- ‘क्लाउड नाइन’ नामक बस्ती के लिए खपराड़ के गधेरे से क्षेत्रीय जनता के नैसर्गिक अधिकारों को छीनते हुए अवैध रूप से जो पानी ले जाया जा रहा है, उसे रोका जाये। इस बिल्डर द्वारा गधेरे में पानी का जो एक विशाल टैंक बनाया जा रहा है, उसे ध्वस्त किया जाये।
- श्रमायुक्त के माध्यम से इस क्षेत्र में कार्य कर रहे सैकड़ों मजदूरों की स्थितियों की जाँच करवाई जाये तथा रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि इन मजदूरों को कानूनी रूप से जरूरी सुविधाएँ मिल रही हैं तथा इनके आवास, भोजन और स्वच्छता की व्यवस्थाएँ पर्याप्त हैं। इनकी पहचान तथा पंजीकरण भी सुनिश्चित किया जाए, ताकि आतंकवाद के इस दौर में क्षेत्रीय जनता तथा प्रदेश के लिए कोई खतरा उत्पन्न न हो।


























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