नीरज कुमार जोशी
सरकारी योजनाएँ किस तरह मंथर गति से और सामान्य व्यक्ति को तरसाते-परेशान करती बनती हैं, इसका एक उदाहरण है बल्दियाखान-खुर्पाताल बाई-पास परियोजना। वर्ष 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने नैनीताल की माल रोड में वाहनों का दबाव कम करने का निर्देश दिया था, 1995 में उ.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के शासन के दौरान गठित बजेन्द्र सहाय कमेटी ने भी इसी तरह की अनुशंसा की थी तभी यह विचार बना कि हल्द्वानी की ओर से आकर मल्लीताल जाने वाली गाड़ियों से मालरोड को बचाने के लिए क्यों न एक बाई-पास बनाया जाये। पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इस परियोजना का सर्वे किया गया था और वर्ष 2009 के अक्टूबर माह में इस योजना पर काम आरंभ हुआ। चूँकि यह सड़क राजभवन की बेहद नाजुक और संवेदनशील पहाड़ी से गुजर रही है, अतः वाडिया इंस्टीट्यूट से इस परियोजना की भूगर्भीय जाँच भी करवा ली गई।
बाई-पास की लंबाई 6.75 किमी व निर्माण लागत 9 करोड़ रु. है। इसमें किमी. दो पर 60 मीटर लम्बे तथा निहाल नदी पर 80 मीटर लम्बे दो बड़े पुलों का निर्माण भी शामिल है। सड़क बनाने के लिये लोक निर्माण विभाग द्वारा कटान का काम जे.वी.सी. मशीनों से कराया गया था। वर्ष 2010 की भीषण वर्षा के बाद सड़क जगह-जगह पर भूस्खलन के कारण बन्द हो गयी। विभाग द्वारा मलबे को सड़क से हटाकर कार्य की इतिश्री मान ली गयी। भारी-भरकम मशीनों से कटान के कारण मानकों में निर्धारित चौड़ाई, जो 12 मीटर है, से अधिक कटान हुआ है। लगातार हो रहे भूस्खलन से यह चौडा़ई और अधिक बढ़ गयी है और क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा बना हुआ है। बाई-पास के अंर्तगत आने वाले ताकुला, रूसी ग्रामों में सुरक्षा दीवारों का निर्माण कराया जाना था, जो इस वर्ष मानसून आ जाने तक भी नहीं कराया गया है। ग्रामीणों ने नैनीताल समाचार को बताया कि वे विभाग को कई पत्र दे चुके हैं, विभाग बजट की परेशानी बताकर सुरक्षा दीवारों का निर्माण नहीं करवा रहा है। बाईपास में किमी-1 पर निर्माणाधीन सड़क के ऊपर एक मकान अवस्थित है। विभाग ने आधी-अधूरी दीवार लगा कर छोड़ दिया है। भारी बारिश में कभी भी यह दीवाल खिसक सकती है। मकान मालिक, पान सिंह सिजवाली जो राज्य आंदोलनेकारी रहे हैं, बताते हैं कि वे विभाग से कई बार शिकायत कर चुके हैं। वन विभाग ने कुल 1310 वृक्षों के कटान की अनुमति दी थी। सुरक्षा दीवार समय से न बनाये जाने से सैकड़ो वृक्ष धराशायी हो चुके हैं। कईं पेड़ गाँवो के मुख्य मार्ग पर गिरे हुए हैं, जिनसे ग्रामवासी परेशान हैं।
वर्ष 2010 में भारी बारिश के बाद खतरे को देख कर प्रशासन ने पानसिंह सिजवाली, जीतसिंह सिजवाली, पुष्कर सिंह व गोविन्द सिंह को मकान खाली कर परिवार सहित सुरक्षित क्षेत्र में जाने के निर्देश जारी किये थे। गोविन्द सिंह कहते हैं कि अन्यत्र जाने का नोटिस तो आया, मगर जिला मुख्यालय इतना नजदीक होने के बावजूद कोई जिम्मेदार अधिकारी उनकी परेशानी देखने नहीं आया।
इस वर्ष भी लगातार हो रही वर्षा से ताकुला, रूसी, जमीरा, सोलिया आदि गाँवों में आपदा की संभावना बनी हुई है। कार्य की धीमी गति को देखते हुये क्षेत्र में दहशत है। वर्ष 2010 में निर्मित कलमट की दीवारें क्षतिग्रस्त हो गयी हैं। अतिवृष्टि से सड़क जगह-जगह से धँस रही है व जल स्रोतों का बहाव सड़क में आने व जल-भराव से दलदल बन गये हैं। सड़क पर जहाँ-जहाँ पर दीवारें बनी थीं, टूट रही हैं। मार्ग के किमी चार व पाँच के बीच निहाल नदी द्वारा किये जा रहे कटान से राजभवन की ऐतिहासिक इमारत को भी खतरा उत्पन्न हो गया है। बी.डी.सी. सदस्य चम्पा खनी विभाग द्वारा शिकायतों की अनसुनी की जाने से नाराज हैं। स्थानीय निवासी राजेन्द्र सिंह मेहरा कहते हैं कि मलबा आने से कृषि भूमि बेकार हो रही है, अतः कटान को रोकने के लिये वृक्षारोपण किया जाना चाहिये। लो.नि.वि. के प्रान्तीय खंड के अधिशासी अभियन्ता जितेन्द्र त्रिपाठी किसी भी तरह की शिकायत मिलने से इन्कार करते हैं और आश्वस्त करते हैं कि बारिश के कारण कार्य अल्प समय के लिये रुका है, जल्दी ही शुरू कर दिया जायेगा।
जो सड़क नैनीताल के अस्तित्व को बचाने के महत्वपूर्ण उद्देश्य को ध्यान में रख कर बनाई जानी शुरू की गई थी, वह अब ग्रामीणों की परेशानी का सबब बन गई है।