पनघट पर छयल चलो बरछी
होली को कामकाका के अगियाये हुए जीवन का ‘इजर’ समझना चाहिये। पाँच दिनों में फाँणा, काटा, सुखाया और जलाया। इस ऊखड़ मल्याट में रतिकाकी को भी साथ रहना पड़ता है। जिस समय आग धमकी होती है उस समय वह हाथ में हाथ धरे तमाशा नहीं देखती। पानी-पन्यार, नदी-पनघट की सोचती है। आग और पानी के [...]
बगरो बसंत है
(बगरो बसन्त है में इस बार हम कथा सम्राट प्रेमचन्द की एक अल्पज्ञात कहानी ‘कमला के नाम विरजन के पत्र’ का एक अंश दे रहे हैं। पत्र शैली में लिखी इस कहानी में पूर्वी उत्तर प्रदेश की होली का जीवन्त चित्रण है तो विभिन्न सामाजिक स्तरों का विभेद भी। -सम्पादक) मझगाँव प्यारे, ऐसा क्रोध आ [...]
…. उड़त गुलाल लाल भये बादल…….
मोसे चरखा मगा दे मानो सैया हमार मोसे चरखा मगा दे।। आफी कातूँलो आफी बणूलो यही चलौलो व्यौहार।। मोसे चरखा मगा दे।। घागरो स्वदेशी आङड़ो स्वदेशी। पिछोड़ो स्वदेशी हमार।। मोसे चरखा मगा दे।। ओढ़नो स्वदेशी बिछोंड़ो स्वदेशी। स्वदेशी पलङा निवार।। मोसे चरखा मगा दे। विदेशी माल को नाम ना लियो है। स्वदेशी माल को करियो [...]
पद संचालन की दृष्टि से खास है काली कुमाऊँ की होली
जगदीश महर गायन और पद संचालन की दृष्टि से काली कुमाऊँ की होली का अन्दाज अलग हो जाता है। इस इलाके में होली का मतलब है-मौजा ही मौजा। क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग, क्या महिलायें….. सब होली के खुमार में रहते हैं। चम्पावत जिले के अपने छोटे से गाँव डुँगरी, पट्टी खिलबिती की होली की ढेर [...]
एक विशिष्ठ परम्परा का जन सामान्य में रुपान्तरण
विकृत होते सांस्कृतिक परिवेश के बीच जब कुमाऊँ की होली परम्परा पर नजर दौड़ाते हैं, तो सुखद आश्चर्य होता है। सुखद इसलिए कि एक विशुद्ध परम्परा की गायकी ने यहाँ के लोक जीवन में स्वाभाविक रूप से प्रवेश कर लिया और आश्चर्य इसलिए कि शास्त्रीयता की जटिल परम्पराओं की निपट अनभिज्ञता के बीच जिन शास्त्रीय [...]
अनोखी है जौनसार की दीवाली
खुशी राम शर्मा सम्पूर्ण भारत से अलग जोनसार-बाबर व सिरमौर में दीपावली का त्यौहार मनाने का विशिष्ट तरीका है। यहाँ बाकी देश से एक माह बाद दीवाली मनाई जाती है। किंवदन्ती है कि अयोध्या यहाँ से बहुत दूर होने के कारण भगवान रामचन्द्र के राज्याभिषेक का समाचार यहाँ एक माह बाद पहुँचा। लेकिन यह तर्क [...]
कुमाऊँ का खतड़ु़वा दरअसल गाय का त्यौहार है
लेखक: उत्तराखंडवासी, प्रस्तुति: ताराचन्द्र त्रिपाठी, सौजन्य: ब्रिटिश लाइब्रेरी, लन्दन (यह लेख सन् 1920 में डाँग श्रीनगर निवासी श्री गोविन्दप्रसाद घिल्डियाल, बी.ए. डिप्टी कलेक्टर, उन्नाव द्वारा लिखित और विश्वंभरदत्त चन्दोला द्वारा गढ़वाली प्रेस, देहरादून से प्रकाशित पुस्तक ’गढ़वाली राजपूतों की सैनिक सेवा’ के परिशिष्ट 2 के रूप में प्रकाशित है। लेख के अन्त में लेखक ने [...]
मकर संक्रान्ति (घुघुती)
माघ मास 1 पैट अकसर 14 जनवरी को मकर संक्रान्ति मनायी जाती है। दान-पुण्य की महत्ता को मानने वाला आस्तिक पर्वतीय समाज पवित्र नदियों में स्नान कर ब्राह्मणों को दक्षिणा और नदी के किनारे बैठे भिक्षुकों को भीख देकर पुण्य अर्जित करता है। माघ मास में उर्द की खिचड़ी का विशेष महत्व है। संक्रान्ति की [...]
ऋतुपर्व है खतड़ुवा
आश्विन के पहले गते को कुमाऊँ में मनाया जाने वाला खतडुवा भी पशुओं का त्यौहार है। इस दिन गाँव के सभी घरों में भांग की डंडी पर काँस (घास) व फूल आदि लगाये जाते हैं। सायं सभी घरों के लोग चिराग जलाकर भाँग की फूल व काँस लगी इस डंडी को गाय के गोठ (गोशाला) [...]

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