क्यों बेपरवाह है सरकार साहित्य और संस्कृति के विकास को लेकर ?
विडम्बना ही कहा जाएगा कि जिस राज्य का मुख्यमंत्री खुद को कवि, साहित्यकार और पत्रकार कहलाने में गौरवान्वित होता हो, उसी राज्य में कला, साहित्य व संस्कृति को संरक्षण देने का काम हाशिए पर है। इसका जीता-जागता सबूत प्रदेश में साहित्य, कला और संस्कृति परिषद का अब तक गठन न हो पाना है। 6 साल [...]
पुरातत्व का खजाना है काली कुमाऊँ
प्रस्तुति : राजेन्द्र गहतोड़ी इतिहास की जड़ें काली कुमाऊँ में गहराई तक फैली हुई हैं। यत्र-तत्र मौजूद पुरातात्विक अवशेष अतीत की गौरव गाथा का वर्णन करते हैं। जिला मुख्यालय से लेकर प्रत्येक दिशा में जनपद के अन्तिम छोर तक बारहवीं सदी से लेकर ई.पू. तक का पुरातत्व बिखरा पड़ा है, जो ऐतिहासिक अध्ययन न हो [...]
कुमाऊँ का लोक नृत्य: छोलिया
विभिन्न अंचलों के अपने-अपने लोकनृत्य होते हैं। कुमाऊँ का लोकनृत्य छोलिया नृत्य कहा जाता है। इस नृत्य को करने वालों को छोल्यार कहा जाता है। यह नृत्य प्रायः पुरुषों द्वारा किया जाता है। यह नृत्य यहाँ श्रृंगार व वीर रस दो रूपों में देखने को मिलता है। कुमाऊँ के पाली पछाऊँ में प्रचलित छोलिया नृत्य [...]
पद्यात्मक होली
शंभु ने आज होली मचाई। इत दल साज्यो शिव शंकर ने, उत दल गिरिजा लाई। रंग गुलाल चलें दोउ दल में, शोभा ललित बनाई-सखी छवि वरणि न जाई। शंभु ने आज होरी मचाई गिरिजा झपट चली सखियन ते शंकर सन्मुख आई। भर पिचकारी दृगन में मारी मुख से लख मुसकाई।। देख शिव रूप लुभाई शंभु [...]
वह उत्तरायणी अब कहाँ… ?
उत्तरायणी और बागेश्वर ये दोनों ही नाम एक दूसरे के पर्याय रहे हैं। उत्तरायणी, उतरैणी अथवा उतरैण सूर्य के उत्तरी अयन में प्रवेश का दिन है। इस भौगोलिक घटना का बागेश्वर के लिए विशिष्ट ऐतिहासिक, धार्मिक व ब्यापारिक महत्व रहा है। बागेश्वर में उत्तरायणी पर मेला आयोजन की शुरुआत कब हुई इसका कोई ठीक प्रमाण [...]
सिर्फ जुआरियों का जमघट नहीं है लधौनधूरा का मेला
प्रस्तुति : राजेन्द्र गहतोड़ी काली कुमाऊँ का अतीत स्वर्णिम रहा है। मगर अतीत की विरासत को भविष्य के लिए सहेजने का का पक्ष कमजोर रहा है। संचार के नाम पर बनियों ने नोट छापने की मशीनें तो लगा दीं, लेकिन स्थानीय बेरोजगारों को पत्रकार बनाने के बावजूद स्थानीय संस्कृति को उजागर करने के लिए उनमें [...]
‘सरकारी उपेक्षा के बावजूद पनप रही है लोक संस्कृति’
गढ़वाली लोक संस्कृति का लोहा मनवाने वाले चन्द्र सिंह राही आज भी आज भी अपने काम में जुटे हैं। प्रस्तुत हैं देहरादून में गढ़वाल सभा में इस संस्कृतिकर्मी से लक्ष्मण सिंह नेगी की छवीं बथ के अंश – प्रश्न:- अपने निजी जीवन के बारे में कुछ बतायें। उत्तर:- मेरा जन्म 1947 को गिवाली गाँव पौड़ी [...]
कुमौड़ की हिलजात्रा
ग्रामीण परिवेश में रह रहे लोगों की अपने देवी देवताओं को मानने की परम्परा लम्बे समय से चली आ रही है। पिथौरागढ़ के कुमौड़ गाँव में आयोजित हिलजात्रा पर्व पर लखिया भूत को पूजने के साथ ही उसे प्रसन्न भी किया जाता है। हिलजात्रा आयोजन समिति के अध्यक्ष गोबिन्द सिंह महर (गोपू) के अनुसार हिलजात्रा [...]
होली बागेश्वर की
बागेश्वर में खड़ी होली का अपना एक अलग ही अंदाज रहा है। बताया जाता है कि यहां बागनाथ मंदिर में पहले शिवरात्रि को रात में खड़ी होली का आयोजन होता था, जिसमें सतराली (सातगांव), ताकुला के होल्यारों का भी आगमन होता था। स्थानीय होल्यारों के साथ रात भर होलियाँ गाई जाती थीं। खड़ी होली गाने [...]

आपकी टिप्पणीयाँ