सम्पादकीय : संजय दत्त क्षमादान या आत्मसमर्पण?
अच्छा हुआ कि फिल्म अभिनेता संजय दत्त ने तमाम बहस को विराम देते हुए खुद ही यह ऐलान कर दिया है कि वे क्षमादान की अपील नहीं करेंगे और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार सही समय पर आत्मसमर्पण कर देंगे। 1993 में मुम्बई में हुए धमाकों के सिलसिले में चले मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संजय [...]
सम्पादकीय : राजनीति का एक कुरूप चेहरा
रामसिंह कैड़ा क्षेत्रीय राजनीति का एक कुरूप चेहरा है। केन्द्रीय राजनीति में या कुछ बड़े प्रदेशों की राजनीति में कॉरपोरेट पैसे का बोलबाला है तो उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे प्रदेशों में बाहुबलियों का। मगर उत्तराखंड जैसे छोटे प्रदेशों, जहाँ कॉरपोरेशन उतने भीतर तक घुसपैठ नहीं कर सके हैं और अपराध भी अपेक्षाकृत कम हैं, [...]
सम्पादकीय : जुदा राहें गड़बड़ाता सच….
महज डेढ़ साल के भीतर अण्णा हजारे और अरविन्द केजरीवाल के रास्ते जुदा हो जाना भारतीय जनान्दोलनों के इतिहास की एक और दुःखद घटना है। अप्रेल 2011 में जब अण्णा साहब एक धूमकेतु की तरह भारतीय आकाश में प्रकट हुए थे और मीडिया की कृपा से देश के पढ़े-लिखे मध्यवर्ग ने उन्हें गांधी के नये [...]
सम्पादकीय : बरसात उत्तराखंड में उम्मीद से ज्यादा आतंक!
बरसात उत्तराखंड में उम्मीद से ज्यादा आतंक का पैगाम लेकर आती है। इसी बरसात में उत्तरकाशी के बाद अभी-अभी कपकोट और उखीमठ से भूस्खलन और जबर्दस्त जनहानि के समाचार मिले हैं। अभी घटना ताजी है और इसीलिये उसका दुःख और निराशा सर्वत्र महसूस किये जा सकते हैं। लेकिन कुछ ही महीनों में यह दुर्घटनायें भुला [...]
सम्पादकीय : अराजकता का एक नया दौर
उत्तराखंड में अराजकता का एक नया दौर शुरू हो गया है। एक ओर आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में खड़े सरकारी कर्मचारियों के आन्दोलन के कारण काम-काज ठप्प है तो दूसरी ओर अतिविृष्टिजनित आपदाओं से निपट पाने में सरकारी मशीनरी की असफलता से जनता सदमे में है। इतनी बुरी हालत है कि मंत्री विदेश यात्रायें कर रहे [...]
हमारा कॉलम : समाचार का 36वें वर्ष में प्रवेश…..
इस अंक के साथ ‘नैनीताल समाचार’ अपने 35 वर्ष पूरे कर 36वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। यात्रा के इस पड़ाव पर यह अविश्वसनीय लग रहा है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच इतने लम्बे समय तक हम न सिर्फ समाचार का प्रकाशन जारी रख सके, बल्कि उसके तीखे-तर्रार तेवर भी कायम रख सके। [...]
सम्पादकीय : मीडिया का मंडन और अन्ना की गलतफहमी
जंतर मंतर में चलाये जा रहे धरने एवं उपवास में इस बार पहले जितनी भीड़ न होने का ठीकरा टीम अण्णा के सदस्य मीडिया पर फोड़ रहे हैं। यह कमजोर समझ है। 16 महीने पहले तक अण्णा हजारे को कोई जानता भी नहीं था। वर्ष 2010 खत्म होते-होते अरबों रुपये के घोटाले उजागर होने के [...]
संपादकीय : विष-वमन में "मैं पीछे क्यों रहूँ" मानसिकता
भाजपा के टिकट पर जीते काशीपुर के अकाली विधायक हरभजन सिंह चीमा के इस बयान कि सरकार तराईवासियों की उपेक्षा कर रही है और पहाड़वासी तराई पर बोझ बन गये हैं, एक बबाल पैदा हो गया है। चीमा और तिलक राज बेहड़ जैसे लोग पहाड़ विरोधी उस जहरीले सोच के प्रतिनिधि हैं, जिसने मायावती से [...]
सम्पादकीय : उत्तराखंड में उन्माद का माहौल
उत्तराखंड में इस वक्त उन्माद का माहौल है। विवेक का गला भिंचा हुआ है। 1990-92 के दौरान जैसी स्थिति बाबरी मस्जिद को लेकर देश भर में थी, लगभग वैसी ही स्थिति बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं को लेकर उत्तराखंड में है। उस वक्त मीडिया साम्प्रदायिक भावनाओं में बह कर ‘सरयू का पानी खून से लाल’ किये [...]
सम्पादकीय : एक निंदनीय कदम
मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद व उनके पति विश्वविजय को उत्तर प्रदेश की एक अदालत द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाया जाना न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि चिन्ताजनक भी है। इस फैसले की जितनी भी निन्दा की जाये, कम है। सीमा आजाद 5 फरवरी 2010 को दिल्ली के पुस्तक मेले से झोला भर किताबें खरीद कर [...]
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