जंगलों के बगैर विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती
ग्रामीण जनता, गाँव एवं गाँवों के बारे में चारों ओर की जमीन, जंगल व जल तथा जानवर ये सब एक दूसरे के पूरक हैं। इनमें एक तरह की पारिवारिक व्यवस्था है, जहाँ दोहन व शोषण के लिये कोई स्थान नहीं है। पिछली एक सदी में जंगलों ने अपना महत्व विशेष रूप से साबित किया है। [...]
संगठित होना होगा जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिये
प्रस्तुति : रैमाशी रावत जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिये हमें संगठित होना पड़ेगा। यदि हम सत्ता से उम्मीद लगाकर आगे चलना चाहेंगे तो सिर्फ निराशा ही हाथ लगेगी। यह कहना था स्वामी अग्निवेश का। वे उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट द्वारा आयोजित वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली व्याख्यानमाला में ‘वैश्वीकरण के दौर में ‘जल, जंगल, [...]
सात सालों बाद भी दिशाहीन है यह राज्य
उत्तराखंड राज्य बनने पर उसकी जो मुख्य आवश्यकताएँ थीं, उनमें से कुछ की पूर्ति नहीं हुई। राज्य की क्या उपलब्धियाँ रहीं उस पर नेताओं-प्रशासकों ने इसकी सातवीं वर्षगाँठ को अवसर पर बहुत कुछ बोला है, लेकिन राज्य को जीवन में कुछ बदलाव आया भी कि नहीं, इस पर न बहस हुई और न ही राज्य [...]
आखिर क्यों आक्रामक हो उठे हैं जानवर
बहुत तेजी से बढ़ती जंगली सुअरों की संख्या उत्तराखंड के पहाड़ों में खेती को कुछ सालों से भयंकर नुकसान पहुँचा रही है। उनका आतंक इतना हो गया है कि राज्य के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक ने अभी हाल में उनको, खास तौर पर मादाओं को, मारने की आज्ञा दे दी है। उस आज्ञा के खुलासे की [...]
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