मेरा गाँव, मेरे लोग. समापन किस्त
जंगल, खड़ोद और सौल का शिकार उस बार हाईस्कूल की परीक्षा के बाद ही ददा को टीचर क्वार्टर छोड़ कर खालगड़ा जाकर रहने का आदेश मिल गया। खालगड़ा यानी कालेज से दो-तीन किलोमीटर ऊपर जंगल के सुनसान इलाके में बना फार्म। वहाँ जंगल के बीच से रास्ता जाता था। पहले तक वहाँ चौरस जगह में [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 29
रामलीला, दुकान और वे दुकानदार दिन भर पढ़ाई, शाम को खेलकूद और साँझबाती के बाद फिर पढ़ाई। यही नियमित दिनचर्या थी। नाटक या सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होते थे। बस, हाईस्कूल या इंटर के विद्यार्थियों की विदाई के दिन कुछ बच्चे गगलसा कर (भरे गले से) अपने वरिष्ठ सहपाठियों के बारे में अपनी भावनाएँ व्यक्त करते [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 28
बाढ़ और बरसात गर्मियों में तो अपने गाँव के पहाड़ से उछलते-कूदते, उतर कर नीचे आ जाता और गौला पार करके पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने लगता। लेकिन, चैमास में द्यो-पानी का डर रहता। न जाने कब बादल घिर आएँ और कब झमाझम बरसने लगे। इसलिए चैमास के महीनों में छुट्टी में घर आता तो लौटते [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 27
छुट्टियाँ हो गई थीं। मैं गाँव के लिए चल पड़ा। खुशी के मारे जैसे हवा में पैर पड़ रहे थे। कूदता-फाँदता, उतराई उतरता, चीड़ानि धार को पार करता नीचे गौला नदी के किनारे खनस्यूँ पहुंच गया। शिवालय के पास से गौला पार की। आगे जाने पर पता लगा, रामलीला का मंच बना हुआ है। रंगीन [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 26
फिर पहाड़ दिल्ली से हम आगरा और मथुरा गए। आगरा में हमने अपनी किताबों में छपा हुआ ताजमहल देखा। बहुत सुंदर लगा। कितना साफ-सुकीला था! वहाँ हमने अकबर का मकबरा सिकंदरा भी देखा। आगरा के किले में गए। ऊपर एक छत पर बिलकुल काले रंग के संगमरमर की बेंच देखी। वहाँ दीवान-ए-खास, एक बुर्ज और [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 25
चीड़ वनों के बीच बाज्यू आते, दो-चार दिन रहते और फिर चले जाते। उन्हें घर की याद आती रहती। रुके हुए काम याद आते। इसलिए ज्यादा दिन नहीं रुक पाते थे। जाते-जाते मेरे सिर पर हाथ फेरते, मुँह मुसारते (सहलाते) और भरे गले से कहते, ‘‘खूब पढ़ना च्यला। तुझे क्या कमी ? तेरे ददा-भौजी हैं [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 24
बनोलिया से गाँव लौटे तो बाज्यू गाँव में रुक गए। अकेले। और मैं पढ़ने के लिए वापस ओखलकांडा आ गया। लेकिन, शनिवार, इतवार और दूसरी छुट्टियों में गाँव चला आता। बाज्यू के पास रहता। हम दोनों के होते हुए भी घर भाँय-भाँय करता रहता। बाज्यू घर भीतर या गाड़्-भिड़ों के काम में लगे रहते। बीच [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 23
उन्हीं दिनों, एक रात सपना देखा। बीच के कमरे में नानी भौजी के पास खड़ा था। तभी रोशनदान से जैसे धूल के चमकते कणों से बनी, हल-हल हिलती देवी जैसी ईजा हवा में कुछ नीचे आई। उसने देख कर कहा, ‘‘कैसा है देबी ? च्यला, तुझे बहुत बुरा लग रहा है ? मेरे साथ चलेगा [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 22
दोपहर ढल चुकी थी। सूरज पश्चिम में दूर कैलाश पहाड़ की ओर उतर रहा था कि गाँव से एक आदमी आया। बोला, ‘‘आपकी ईजा बहुत बीमार है। ककोड़ से जवाब आया है, उसको देख जाओ। सभी आना कहा है।’’ ददा ने कहा, ‘‘शम हो रही है। सुबह-सुबह चल पड़ेंगे।’’ जवाब लाने वाले ने कहा, ”नहीं [...]
मेरा गाँव, मेरे लोग – 21
उस बार मेरा पाँचवी का इम्तहान था। सामने दाहिनी ओर तीनेक मील दूर गरगड़ी गाँव के इस्कूल में इम्तहान देना था। हमारे स्कूल से मुझे, शेरुवा और भवान को ले जाना था। जिस दिन इम्तहान देने जाना था, उस दिन ईजा ने मुझे धीरे-धीरे चल-फिर कर सुबह-सुबह तैयार कर दिया। पिठियाँ लगाया। गुड़ और घी [...]
आपकी टिप्पणीयाँ