अपने अपने कैलास –1
जिस दिन नैनीताल से दिल्ली को प्रस्थान करना था, 9 जून को, गिर्दा का फोन आया, अध्ययन यात्रा होगी यह, ऐसा सोचते हैं हम। शब्द बहुत अच्छा लगा, अध्ययन यात्रा। नैनसिंह की यात्राओं को अन्वेषण यात्राएं कहा गया था। गिर्दा एक और मजाक कर रहे थे फोन पर, जाँठी लेकर माता की तरह चल दोगी [...]
जिसका ईगो बढ़ गया है, उसे पैदल यात्रा करनी चाहिये
सोरघाटी से गर्ब्यांग.अन्तिम किस्त सोरघाटी से गर्ब्यांग-08 [ पिछ्ले अंक से आगे] सुबह वापसी। यात्रा व तलाश दोनों समानार्थी हैं। अर्थ देने की कोशिश में कितना अनर्थ हो जाता है कभी और कभी अर्थ ही खो जाता है। और अपनी यात्रा में अर्थ खोता हूँ, अपने को भी। दूसरों की तलाश में ही मिलता है [...]
ट्राइबल सोसाइटी में कम्प्लीकेशंस नहीं होते, उसकी फुर्सत ही कहाँ
सोरघाटी से गर्ब्यांग-07 [ पिछ्ले अंक से आगे] धड़कते दिल से हम साढे़ बारह बजे पहुँचे कैम्प। इंस्पैक्टर को धन्यवाद देने पर एक सरदारजी, जो कुर्सी पर विराजित थे बोले, ‘‘वह नहीं हैं, चले गये हैं आर्मी में। आज दुर्गा पूजा है। अब तुम जाओ…।’’ उन्होंने ऐसे आदेश दिये, जैसे हम उन्हें सैल्यूट करने आये [...]
खेद तो इस देश के बारे में है जो सड़क, बिजली भी न दे सका
सोरघाटी से गर्ब्यांग-06 [ पिछ्ले अंक से आगे] छियालेक की चढ़ाई। धूप अभी नहीं है। ठंड कुनकुनी है। हमने गर्म कपड़े पहिन लिये हैं। हम धीरे-धीरे चढ़ते हैं। अभी लोगों ने चलना शुरू नहीं किया है। रास्ते में बिल्कुल खट्टा फल शंखदाना मिलता है। पूरी डाल है उसकी। पतली डाल में मोतियों सा पिरोया हुआ। [...]
नेताओं और अफसरशाहों में विकास की इच्छा ही नहीं
सोरघाटी से गर्ब्यांग-05 [ पिछ्ले अंक से आगे] जीप अपनी प्रकृति के अनुसार भरने की प्रक्रिया में आठ बजे ही चली। नौ बजे पहुँचे घटाबगड़। अब पैदल था। खच्चर, घोड़े, लोगों का आना-जाना, लीद बकरी की मैंण की सूँघ में वापस आया चमोली का माइग्रेटिंग कॉलेज गमसाली। चमोली तिब्बत सीमाँत का प्रदेश, जहाँ हमारे सारे [...]
खुशी लाने का हर रास्ता काँटों भरा होता है
सोरघाटी से गर्ब्यांग-04 [ पिछ्ले अंक से आगे] विचार था आसपास भ्रमण करते धौली प्रोजेक्ट भी देख लिया जाय। तभी बहुत से बड़े लोग आ जाते हैं राजी जनजाति के। गगन सिंह रजवार इस क्षेत्र के विधायक हैं। वे कहते हैं- आप हमारे इलाके में आये हैं। बताइये किस चीज की आवश्यकता है। कढ़े हुए [...]
वह व्यवहार ही क्या, जिसमें कहीं प्रेम न हो
सोरघाटी से गर्ब्यांग-03 [ पिछ्ले अंक से आगे] आगे डुगरा गाँव वालों की भी पानी की शिकायत- सूखे नल हैं। छियासठ मवासे के डोकना गाँव वाले कहते हैं -‘‘नौले धारे पूरे सूख गये हैं। एमएलए जी आते नहीं हैं। अब सुना आने वाले हैं, चुनाव जो आ गये हैं….।’’ हम रास्ता पूछते हुए चलते रहे। [...]
डाबर की नजर से अभी ओझल है आँवले का यह जंगल
सोरघाटी से गर्ब्यांग-02 रास्ते में फिसलन थी। मैं दो तीन बार गिरा। पहली बार तो लगा कि हाथ टूट गया है। पर उसे इधर-उधर हिला कर देखा तो साबूत था। मैं अपनी ही चाल चलता हूँ। या तो आगे या पीछे। बीच में चलना अच्छा नहीं लगता। यात्रा आदमी का चरित्र सबसे ज्यादा बतलाती है। [...]
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