बारिश के भीतर बारिश है
(नैनीताल समाचार के लिए एक कवि की रिपोर्ट) पानीदार लगभग कुछ नहीं है न आंखें न चेहरे न हथियारों की धार न किरदार मेरे आसपास पानीदार लगभग कुछ नहीं है एक ऐसे समय में कह सकते हैं सूखा है अकाल है पपड़ाई मिट्टी के ढूहों से बिलखती निकलती हैं चींटियाँ दिमाग में रेंगती अचानक पानी [...]
गंगा से
जुग बीते दजला से इक भटकी हुई लहर जब तेरे पवित्र चश्मों को छूने आई तो तेरी ममता ने फैला दीं अपनी बाहें और तेरे हरे किनारों पर तब आम और कटहल के दरख्तों से घिरे हुए खपरैलों वाले घरों के आँगन में किलकारियाँ गूँजीं मेरे पुरुखों की खेती शादाब हुई और शगुन के तेल [...]
मुजफ्फरनगर – तुमने सब महसूस किया रतन सिंह
तुमने महसूस किया होगा कितने सौंधे महकते हैं गन्ने के नर्म खेत कितनी ठंडी कितनी मुलायम, कितनी नर्म होती है उनके नीचे की जमीन तुमने सब महसूस किया रतन सिंह चलकर गाँव की पगडंडियों से मिट्टी की कच्ची सड़क पर मोटर पर सवार होते वक्त तुम्हें याद थी पोती की फरमाइश उसकी आँखों के सामने, [...]
मुजफ्फरनगर- बहुत करीब सरक आये हो तुम
मुजफ्फरनगर ! हमारे करीब और बहुत करीब सरक आये हो तुम 2 अक्टूबर 1994 के बाद वैसे तो नहीं रहे कभी भी तुम हमसे दूर पर अब तो तुम्हारा जिक्र भी देता है अपनी ही अंगुलियों के चटखने का अहसास मुजफ्फरनगर ! रौंन में सुलगति हुई लकडि़यों को घेर कर अलाव तापते हम लोगों की [...]
चल बसन्त : कवि और बसन्त
कवि और बसन्त हरे बसन्त किलै भौछै तु तन्तुक चलबसन्त त्यर हुनेर छौ अन्त कि म्यर हुनेर छु अन्त हरे बसन्त… पैलि बै तऽ भौतै मैलोकि छिये रे तु आपुँ इकलै जै के ऊँछिये दगाड़ में हिसाउ, किलमोडि़, बुराँस, काफोउ, जाणि कतु डाव बोटनकें पौयै ल्यूँछिये साल में एक बखत तु धरति कै आपण पैण [...]
…. उड़त गुलाल लाल भये बादल…….
मोसे चरखा मगा दे मानो सैया हमार मोसे चरखा मगा दे।। आफी कातूँलो आफी बणूलो यही चलौलो व्यौहार।। मोसे चरखा मगा दे।। घागरो स्वदेशी आङड़ो स्वदेशी। पिछोड़ो स्वदेशी हमार।। मोसे चरखा मगा दे।। ओढ़नो स्वदेशी बिछोंड़ो स्वदेशी। स्वदेशी पलङा निवार।। मोसे चरखा मगा दे। विदेशी माल को नाम ना लियो है। स्वदेशी माल को करियो [...]
भारत– एक कविता
भारत – मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं इस शब्द के अर्थ खेतों के उन बेटों में हैं जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से वक्त मापते हैं उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं और वह भूख लगने पर अपने [...]
गङ् नाण
हिट हो आब गङ् नै ऊनूँ ! यो उतरैणि ऐ गे छ माघ में, पुण्य भै वीकें कमै ल्यूँ।। आब काँ रै गे गङ अहो ! आब पाणि न्हैति इन गंगन में। सब गाड़न में रूढ़ बरसि गै, ढुङ डाव रेत भरी सबन में।। जौलजीवि, बागसर, जागिसर, सबे अलीत-पलीत बणै। गङ बै सिरि सब उज्याडि़ [...]
नव वर्ष की शुभकामनायें 2012: कुछ कवितायें
पुराने पत्तों को सिर्फ इतना करना चाहिये पतझड़ में/गिर जाना चाहिये। बिछ जाना चाहिये खाद बन/देनी चाहिये नये वक्त की शुभकामनाऐँ नये पत्तों के लिये, पुराने पत्तों को सिर्फ इतना करना चाहिये। – दिनेश उपाध्याय करने के लिए करने को अभी बहुत कुछ बचा है होने के लिए भी पक्षी को घोंसले [...]
गढ़वाली लोकगीत : सतपुली की त्रासदी
[यह गढ़वाली लोकगीत सन् 1951 की सतपुली की भीषण त्रासदी का वर्णन प्रस्तुत करता है।] द्वी हजार आठ भादो मास,सतपुली मोटर बगीन खास। औडर आई गये कि जाँच होली,पुर्जा देखणक इंजन खोली। अपणी मोटर साथ मां लावा,भोल होली जाँच अब सेई जावा। सेई जोला भै बन्धो बरखा ऐगे,गिड़-गिड थर-थर सुणेंण लैगे। सुबेर उठीक जब आयाँ [...]
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