तुम नज़रें उठाने लगती हो तो…..
तुम नज़रें उठाने लगती हो तो धड़कने लगता है इस दुनिया का रुपहला दिल, हे भारतमाता ! नारंगी खुशबू उड़ती है और मैं बंद कर देता हूँ अमरकोश तुम्हारा अर्थ करने का व्यर्थ प्रयास आसपास रूपहला दिल यहाँ आसपास नारंगी खुशबू यहाँ और जिसे ग़रीबी की नहीं कोई पहचान वह दस गुना अमीरी भी यहाँ [...]
नदियों पर संकट है सारे गाँव इकट्ठा हों
नदियों पर संकट है सारे गाँव इकट्ठा हों नदियों पर संकट है,सारे गाँव इकट्ठा हों, अब सदियों पर संकट है,सारे गाँव इकट्ठा हों। पानी डूबा फाइल में, गाड़ी में मोबाइल में, सारे वादे डूब गये, खून सने मिसाइल में। एक गाँव पर संकट है, सारे गाँव इकट्ठा हों। एक गाँव पर संकट है, सारे गाँव [...]
अक्षरों के पुल के नीचे बहती-थमती कवितायें
दिवा भट्ट के कविता संकलन ‘अक्षरों के पुल’ की कवितायें महज एक स्त्री के गुनगुने भाव लोक भर की कवितायें नहीं हैं, जैसा कि आम तौर पर स्त्री लेखन में देखा जाता है। ये कवितायें दरअसल उस विचार के विरोध की कवितायें हैं, जो लेखकों को स्त्री और पुरुष के खेमों में बाँटकर देखता आया [...]
है किसका अधिकार नदी पर
(धुन-नदी जमुना के तीर कदम चढ़ी) चलो नदी तट वार चलो रे चलो नदी तट पार चलो रे,करें यात्रा नदियों की नदी वार तट पार चलो रे,करें यात्रा नदियों की इन नदियों के अगल-बगल ही जीवन का विस्तार,चलो रे करें यात्रा नदियों की आज इन्हीं नदियों के ऊपर पड़ी है मारामार, चलो रे करें यात्रा [...]
नया साल : कुछ कवितायें
नया साल / नयी संस्कृति वह आग नहीं है वह एक सर्वथा नयी राष्ट्रभाषा है सड़क पर अभी भी चिपचिपाता वह खून नहीं वह है एक नयी किस्म की रोशनाई जली हुई उन उजाड़ बस्तियों में आकार ले रहा है हमारा नूतन स्थापत्य पटककर मार दिया गया वह बच्चा वह हमारा भविष्य है। वे हमारे [...]
त्रिलोचन के बिना
बीते 9 दिसम्बर को प्रगतिशील हिन्दी कविता का चौथा कोना भी सूना हो गया। शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल के बाद अब त्रिलोचन शास्त्री भी नहीं रहे। 91 वर्ष की वयोवृद्धता के अलावा वे काफी समय से बीमार भी थे। उत्तराखंड से त्रिलोचन का निकट संपर्क रहा और उनकी छोटी पुत्रवधू सुश्री उषा सिंह [...]
इस व्योपारी को प्यास बहुत है
एक तरफ बर्बाद बस्तियाँ – एक तरफ हो तुम। एक तरफ डूबती कश्तियाँ – एक तरफ हो तुम। एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम। एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम। अजी वाह ! क्या बात तुम्हारी, तुम तो पानी के व्योपारी, खेल तुम्हारा, तुम्हीं खिलाड़ी, बिछी हुई [...]
ग्राम गणराज्य अंक: कुछ कविता, कुछ विचार
गाँधी की आँधी आई थी बीते लगभग बरस पचास अपने साथ सपन लाई थी सब कुछ होगा सब के पास वादों की लादी भर जनता आज रही है कांधें झेल अब्बर देवी, जब्बर बकरा नागड़ ध्न्निा नागर बेल – हरिवंश राय बच्चन कितने साधें हों पूरी, तुम रोज बढ़ाते जाते कौन तुम्हारी बात बने, तुम [...]
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