गनीमत है मैं आठवीं जमात से आगे नहीं गया….
भूखे से रोटी के बारे में लिखने को कहना तर्कसंगत लगता है, लेकिन अशिक्षित व्यक्ति को शिक्षा के बारे में लिखने को कहना बड़ा अटपटा सा लगता है और अशिक्षित भी ऐसा कि शहर में रहने और तमाम सुख-सुविधाओं के बाद भी सिर्फ अपने निखद्दपने के कारण अपनी शिक्षा पूरी न कर पाये। और उस [...]
लो साहब गुजर गये शादियों के भी दिन !
लीजिए साहब, बारातों का यह सीजन भी निपट गया हर बार की तरह. ….हर बार शादियों के सीजन में शहर से कुछ परिचित चेहरे वाली अपरिचित लड़कियाँ अचानक गायब हो जाती हैं। कई दिनों तक आँखें उन्हें भीड़ में तलाशती रहती हैं। कई बार खयाल आता है कि गई होंगी कहीं रिश्तेदारी वगैरा में, आ [...]
संविधान के नये प्रारूप की उद्देशिका
हम भारत के लोग जिनकी भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, चापलूसी, पाखंड, दोमुँहा चरित्र, व्यक्तिपूजा, कायरता और वंशवाद के सामने घुटने टेकने की शानदार परम्परा है, भारत को आतंकवाद का आसान निशाना और विश्व बैंक तथा डब्ल्यू,टी.ओ. की नीतियों का गुलाम बनाने के लिये तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अन्याय, विचार, अभिव्यिक्त, अनास्था और [...]
समाचार पत्रों का विराट रूप : महावीर प्रसाद द्विवेदी
महावीर प्रसाद द्विवेदी का यह लेख नवंबर 1904 में ‘कमलकिशोर त्रिपाठी’ के नाम से प्रकाशित हुआ था 1. हे विराट् स्वरूपिन समाचार-पत्र ! आप सर्वान्तर्यामी साक्षात् नारायण हैं। वृत्त पत्र, वर्तमान पत्र, समाचार-पत्र, गैजट, अखबार आपके अनेक नाम और रूप हैं। अतः ‘अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे’ – आपको प्रणाम। 2. पत्र-व्यवहार अथवा चिट्ठी-पत्री आपके पादस्थान में [...]
चाय की चुस्कियाँ : यशपाल
(‘बगरो बसंत है’ में इस बार प्रस्तुत है क्रांतिकारी रहे कथाकार यशपाल की व्यंग्य रचना ‘चाय की चुस्कियाँ’, जो श्री दुर्मुख के नाम से मार्च 1947 के ‘विप्लव’ में छपी थी तथा सम्पादकाचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का लेख ‘समाचार पत्रों का विराट रूप’ जो नवंबर 1904 में ‘कमलकिशोर त्रिपाठी’ के नाम से प्रकाशित हुई थी।) [...]
राष्ट्रीय शोक: राजनीति ने गड़बड़ाया देश का मोराल
टीवी में तोंदधारी महाराष्ट्र पुलिस जो थ्री नॉट थ्री लिये हैं देख कर एक दर्शक कह रहे हैं – ‘‘आतंकवादी इन्हें देख रहे होंगे तो हँस रहे होंगे – इस जमाने में थ्री नॉट थ्री और ये फिटनेस…..।’’ एक दूसरे श्रोता बोले, ‘‘टी.वी. वालों को चार दिन की टी.आर.पी. मिल गई…..।’’ ठांय गोली चलती है….संवाददाता [...]
माफ करना हे पिता ! – 3
(शम्भू राणा के इस आत्मकथ्य को लेकर हमें बहुत सारे पाठकों की मौखिक व टेलीफोन पर प्रतिक्रियायें मिली हैं। हमारा उन सभी पाठकों से निवेदन है कि अपनी प्रतिक्रियायें लिखित रूप में दें। कम से कम एक पोस्टकार्ड लिखने की जहमत अवश्य उठायें।-सम्पादक) एक रोज सीढ़ियों से लुढ़क कर मैं अपना माथा फुड़वा बैठा। लोगों [...]
माफ करना हे पिता! – 2
देहरादून की यह यादें सन 1971 के आस-पास और उसके कुछ बाद की हैं। समय का अंदाज एक धुँधली सी याद के सहारे लगा पाता हूँ। शाम को रोशनदानों में बोरे ठूँस दिये जाते थे और कमरे के अंदर जलती हुई ढिबरी को गुनाह की तरह छिपाया जाता। बाहर घटाटोप अंधेरा। यकीनन उस समय सन [...]
माफ करना हे पिता!
सभी के होते हैं, मेरे भी एक (ही) पिता थे। शिक्षक दिवस सन् 2001 तक मौजूद रहे। उन्होंने 70-72 वर्ष की उम्र तक पिता का रोल किसी घटिया अभिनेता की तरह निभाया मगर पूरे आत्म विश्वास के साथ। लेकिन मैं उन्हें एकदम ही ‘पीता’ नहीं कहने जा रहा। इसलिये नहीं कि मेरे बाप लगते थे [...]
सफरनामा पूना से मारुति-800 कार बागेश्वर पहुँचाने का – 3
उस दिन का सफर घंटों तक धूल और गड्ढों भरी सड़क में किया। धूल की वजह से शीशे चढ़े ही रहे, गाड़ियों की रफ्तार बैलगाड़ी जितनी हो कर रह गयी। मुश्किल से कई घंटों बाद पक्की सड़क के दर्शन हुए। गाड़ी ने ज्यादा तंग नहीं किया, ठीक-ठाक चलती रही। दिन के एक-डेढ़ बजे किसी जगह [...]
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