संपादकीय: कैसे बने समाज ज्यादा सहनशील?
एक बार फिर होलियाँ सामने हैं। सामाजिक सद्भाव का यह एक विलक्षण पर्व है, जिसमें हास्य होता है, लेकिन कटुता नहीं होती। व्यंग्य होता है, मगर उससे कोई रंजिश नहीं जनमती। अश्लीलता होती है, लेकिन वह सहज भाव से स्वीकार कर ली जाती है। काश, होली से इतर भी हमारे समाज में ऐसी सहिष्णुता, इतनी [...]
काहे से खेलूँ सजनी होली ?
विभिन्न संस्कृतियों के अनेको रंगों से रंगे देश में रंगो का त्योहार है होली, जिसके ये रंग अब देशवासियों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का एक हिस्सा हैं। यहाँ तो साल भर होली है। कभी सीमा पार से आतंकी आकर निर्दोषों के खून से होली खेलते हैं तो कभी अपने ही अपनों का लाल रंग बेरंग [...]
इस तरह मनाई जाती है नंधौर घाटी में होली
होली गाने व मनाने के तरीकों में जो अंतर कुमाऊँ में अलग-अलग जिलों में व इलाकों में है वही अंतर नंधौर घाटी में भी है। यहाँ पुरुष ही होली गाते हैं। वसंत ऋतु अपने साथ अनेक रंगों को भी लाती है। किसानों को खेती के काम से भी इसी समय अधिकतर राहत रहती है, इसलिये [...]
बगरो बसंत है : घायल वसन्त और होली
(‘बगरो बसंत है’ में इस बार सुधी पाठकों के लिये प्रस्तुत है प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाईं की व्यंग्य रचना ‘घायल वसन्त’ तथा उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की कविता ‘होली ) घायल वसन्त कल वसन्तोत्सव था। कवि वसन्त के आगमन की सूचना पा रहा था- ‘प्रिय, फिर आया मादक वसन्त।’ मैंने सोचा, जिसे वसन्त के आने [...]
सौल कठौल: सतरंगी छलड़ी कैका घर
बीसवीं सदी का आखिरी दशक लोकल कमान से लेकर हाई कमान तक हुक्काराम के संघर्ष की कहानी अब हमारे लिये कम रोचक नहीं रही। एक बार अनजाने में हमने उन्हें अनसुना कर दिया तो उन्होंने हमें विरोधी गुट वालों की सूची में शामिल कर हमारी छलड़ी कर दी। तब से हमारी मेजबानी का तरीका ही [...]
यो वसन्त हो कैका घर जाये ?
मेरे गाँव में वसन्त हर्षोल्लास और त्यौहार समारोह लेकर आता था। सरसों का फूलना, पादपों में नये कोंपल आना, फूलों का खिलना, पक्षियों का कूजन कुमाऊँ में ऊँचाई और निचाई के अनुसार आगे-पीछे होता रहता है, किन्तु प्रकृति के सँवरने-सजने में देर सबेर भले ही हो जाये, हमारे गाँव के दो कदीमी ऋतु रैंण गाने [...]
भज भक्तन के हितकारी, सिरी कृष्ण मुरारी
हमारे यहाँ कौन होली किस दिन गानी है, इस तरह का चुनाव परम्परा-परिपाटी से ही देखने में आता है। देशाचार के अनुसार दशमी बेध एकादशी को देवी-देवताओं की होलियाँ होती हैं। आँवला एकादशी और द्वादशी को भगवान की बाल-लीलाओं, विनय और स्तुतियों की होलियाँ सुनने को मिलती हैं। त्रयोदशी से रस की होलियों के साथ-साथ [...]
पकौड़ी की कौन सोचे ?
पहाड़ में ऐसा कोई त्यौहार नहीं होता, जिसमें उड़द दाल की पकौड़ियाँ न बनती हों। अब होली आ रही है और उसके लिए सभी पहाड़ी परिवार पकौड़ियाँ बनाना चाहेंगे। लेकिन यह कमरतोड़ महंगाई का साल है और गरीब किसानों के लिये पकौड़ियाँ बनाना संभव हो भी पायेगा कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। दाल का [...]
वाह फागुन की हवायें…… होली है !
कैसे-कैसे रंग लेकर आती हैं फागुन की हवायें ? जितने चेतन पदार्थ, उतने रंग। जितने प्राणी, उतने रंग। जितने मनुष्य, उतने रंग। कोई लम्बी नींद से जागता है, कोई लम्बी नींद सो जाता है। कोई चहकता है, कोई महकता है, कोई फुदकता है, कोई लहराता है। कोई साथियों की खोज में चल पड़ता है, तो [...]

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