प्रस्तुति : बी. के. जोशी
वर्ष 2011 की जनगणना के ताजे आँकड़ों ने कुछ ज्वलन्तशील मुद्दे उत्तराखंड के सामने खड़े कर दिये हैं। लिंगानुपात की भयावह तस्वीर ने यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि ‘आखिर हम किस ओर जा रहे हैं’ और ‘हम कैसे सही रास्ते पर जा सकते हैं।’ हम आये दिन मातृशक्ति की बात करते हैं, लेकिन इन आँकड़ों ने साबित कर दिया है कि वास्तविक धरातल पर इसका कोई अर्थ नहीं है। जनगणना के प्रारम्भिक आँकड़़ों से निकलकर आये तीन मुद्दों पर टिप्पणी करना यथोचित होगा जनसंख्या वृद्धि का प्रतिरूप, कुल लिंगानुपात व बच्चों (0-6 वर्ष) का लिंगानुपात।
जनसंख्या वृद्धि
यहाँ दी गई तालिका के पहले स्तम्भ के अन्तर्गत उत्तराखण्ड की 2001 से 2011 के मध्य दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर 19.17 दर्शायी गयी है, जो राष्ट्रीय वृद्धि दर 17.64 से अधिक है। उत्तराखण्ड के देहरादून, हरिद्वार, और उधमसिंहनगर जनपदों में यह वृद्धि दर 30 प्रतिशत से अधिक व नैनीताल में 25 प्रतिशत से अधिक रही है। चम्पावत व उत्तरकाशी में यह दर अन्य पर्वतीय जनपदों से अधिक (क्रमशः 15.5 एवं 12 प्रतिशत) रही है। बाकी अन्य सात पर्वतीय जनपदों में जनसंख्या की वृद्धि दर अपेक्षाकृत न्यून अर्थात् 5 प्रतिशत और उससे कम है। इसमें से दो जनपदों, अल्मोड़ा व पौड़ी में वृद्धि दर ऋणात्मक रही है। नैनीताल और उत्तरकाशी को छोड़कर बाकी उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले जनपद पूरी तरह मैदानी भाग में स्थित हैं। देहरादून जनपद की पूरी दून घाटी में जनसंख्या की बहुलता है। नैनीताल के सन्दर्भ में भी यही बात लागू होती है, जहाँ इसके पाद प्रदेश में बसे हल्द्वानी-काठगोदाम, रामनगर व लालकुआँ जैसे नगरीय केन्द्रों के अलावा भाबर इलाके में भी जनसंख्या का बसाव सघन रूप में मिलता है। पर्वतीय जनपदों में जनसंख्या वृद्धि कम होने व मैदानी जनपदों में जनसंख्या वृद्धि अधिक होने से इस बात का संकेत मिलता है कि पर्वतीय इलाकों से प्रदेश के मैदानी इलाकों अथवा अन्य प्रदेशों को तेजी से पलायन हो रहा है। साथ ही मैदानी इलाकों में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों तथा औद्योगिकीकरण की वजह से यहाँ प्रदेश के बाहर से आने वाले लोगों के कारण भी जनसंख्या बढ़ी हो सकती है। पन्तनगर, हरिद्वार व देहरादून में औद्योगिक आस्थानों की स्थापना से यहाँ रोजगार के अवसर कुछ बढ़े हैं, जिस कारण प्रदेश के बाहर के लोग भी आकर्षित हो रहे होंगे।
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लिंगानुपात
जनगणना के आँकड़ों को देखने पर हम पाते हैं कि उत्तराखण्ड में 2001-2011 के मध्य कुल लिंगानुपात की स्थिति लगभग यथावत है। 2001 में जहाँ प्रति हजार पुरुषों पर 962 महिलाएँ थीं, वहीं 2011 में यह आँकडा़ आंशिक रूप से बढ़कर 963 हो गया। वर्ष 2011 में सम्पूर्ण भारत में प्रति हजार पुरुषों पर 940, हिमाचल में 974 व उत्तरप्रदेश में 908 महिलाएँ हैं। उत्तराखण्ड के जनपद स्तर पर लिंगानुपात का मिला जुला प्रतिरूप दिखायी देता है। उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, देहरादून, नैनीताल, उधमसिंहनगर व हरिद्वार जनपदों के लिंगानुपात में वर्ष 2001 की तुलना में सुधार आया है। जबकि शेष जनपदों पौड़ी, पिथौरागढ,, बागेश्वर, अल्मोड़ा और चम्पावत में लिंगानुपात बदतर हुआ है। जनपद टिहरी व नैनीताल में लिंगानुपात में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिलता है, जबकि उत्तरकाशी, उधमसिंहनगर व हरिद्वार में सामान्य व चमोली व रुद्रप्रयाग में आंशिक सुधार दिखायी देता है। दूसरी ओर जनपद चम्पावत के सन्दर्भ में यह विशेषता देखने को मिलती है कि यहाँ 2001 में प्रति हजार पुरुषों पर 1021 महिलाएँ थीं, जो 2011 में घटकर 981 पर सिमट गयीं। जनपद बागेश्वर, पिथैारागढ़, गढ़वाल व अल्मोड़ा में भी पुरुष-स्त्री अनुपात वर्ष 2001 की तुलना में आंशिक रूप से घट गया है। पर्वतीय क्षेत्रों में न्यून और ऋणात्मक जनसंख्या वृद्धि के साथ ही कुछ जनपदों में लिंगानुपात के बढ़े आँकडे़ तो कुछ में घटे आँकडे़ साफ तौर पर यह प्रदर्शित करते हैं कि अब पुरुष का मुखिया ही पलायन नहीं करता, पूरा परिवार पलायन कर रहा है। यह भी देखने में आ रहा है कि महिलाएँ शादी के बाद प्रदेश अथवा उससे बाहर के मैदानी इलाकों में पलायन करने लगीं हैं। यह प्रवृत्ति अल्मोड़ा, पौड़ी, पिथौरागढ़, बागेश्वर व चम्पावत में अन्य पर्वतीय जनपदों के मुकाबले अधिक दिखायी देती है। हालाँकि इन प्रारंभिक आँकड़ों से आगे इस विषय पर विस्तृत और ठोस अध्ययन की जरूरत होगी।
बच्चों का लिंगानुपात
सबसे चिन्ताजनक आँकडे़ 0-6 आयु वर्ग वाले बच्चों के लिंगानुपात के हैं, जिसमें भारी गिरावट देखने में आ रही है। उत्तराखण्ड स्तर पर 2001 की जनगणना में जहाँ यह लिंगानुपात 908 था, वह 2011 में घटकर 886 पर पहुँच गया। सम्पूर्ण भारत स्तर पर भी इस अनुपात में कमी आयी है, पर उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में यह विशेष सोचनीय है। राष्ट्रीय स्तर पर यह लिंगानुपात 2001 की जनगणना में 928 प्रति हजार था। 2011 में यह 914 प्रति हजार पर आ गया। हमारा पड़ोसी हिमांचल इस मामले में बेहतर है। वहाँ यह अनुपात 896 से बढ़कर 906 पर पहुँच गया है। पिछले दशक में 7 वर्ष से ऊपर के लोगों का लिंगानुपात थो़ड़ा सुधर कर 973 से 975 हो गया है। मगर 0-6 वर्ष की लड़कियों की संख्या में कमी आई है। जनपद स्तर पर ये आँकड़े और भयभीत करते हैं। सभी पहाड़ी जनपदों ने इस मामले में शर्मनाक प्रदर्शन किया है। पिथौरागढ़, चम्पावत, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, उत्तरकाशी व बागेश्वर में बच्चों के लिंगानुपात में अत्यधिक कमी आयी है और नैनीताल, उधमसिंहनगर व अल्मोड़ा जनपदों में यह अनुपात कम हुआ है, जबकि देहरादून जनपद में अपेक्षाकृत सामान्य कमी आयी है। एकमात्र हरिद्वार जनपद में लिंगानुपात बढ़ा है। यहाँ वर्ष 2001 में लिंगानुपात 862 था जो वर्ष 2011 में बढ़कर 869 हो गया। हालाँकि यह बढ़ोतरी मामूली है, लेकिन फिर भी आशाजनक है।
बच्चों के लिंगानुपात की दृष्टि से मैदानी जनपदों की तुलना में पहाड़ो में जो खराब स्थिति उभर कर आ रही है, उसके पीछे एक कारण सम्भवतः कन्या भ्रूण हत्या हो सकता है। हालाँकि बगैर ठोस प्रमाण के इसकी पुष्टि कर पाना सम्भव नहीं है। जनपद स्तर पर बालक व बालिकाओं की जन्म सम्बन्धी सूचना व लिंगवार शिशु मृत्यु दर सूचनाओं की उपलब्धता से इन तथ्यों की पुष्टि की जा सकती है। उत्तराखण्ड में 0-6 आयु वर्ग वाले बच्चों के लिंगानुपात को देखने से प्रतीत होता है कि प्रसव पूर्व भ्रूण लिंग जाँच सम्बन्धी कानून यहाँ निष्प्रभावी है। इस सन्दर्भ में नीति-निर्धारण और क्रियान्वयन को लेकर हम कतई गम्भीर नहीं हैं।