राज्य की माँग के पीछे आम आदमी के समर्थन का मकसद यही था कि अपना राज्य होगा तो यहाँ की परिस्थितियों के मुताबिक ही नीतियाँ बनेंगी। चकबन्दी का भी एक मसला था, लेकिन अब तक की सारी सरकारें इसे राज्य में लागू करने में विफल सिद्ध हुई हैं। हिमाचल में चकबन्दी लागू होने से जमीन का सरसब्ज होना दिखाई देता है। पहाड़ से लोगों के पलायन का एक प्रमुख कारण यहाँ पैतृक जमीन के लगातार बँटवारे के बाद खेती का अलाभकारी होता चला जाना है। जोतें इस हद तक बिखर गई हैं कि उन पर योजना बना कर काम करना बेहद कठिन है। जिससे लोगों का खेती से जुड़ाव कम हो रहा है और खेत लगातार बंजर होते चले जा रहे हैं। रोजगार के अन्य साधन न होने से पलायन मजबूरी बन गया है।
पहाड़ में चकबन्दी को लेकर 18 अप्रेल को श्रीनगर (गढ़वाल) के कल्याणेश्वर धर्मशाला में एक बैठक सम्पन्न हुई। इस गोष्ठी में पहली बात यह सामने आई कि यदि समय रहते चकबन्दी लागू न हुई तो स्थितियाँ लगातार बदतर होती चली जायेंगी। पहाड़ में खेती को लाभप्रद बनाने का चकबन्दी ही एकमेव उपाय है। ग्रामीण विकास की सारी योजनायें तभी लाभ दे पायेंगी, जब लोगों की भूमि एक स्थान पर होगी। इस वक्त तो सरकारी धन की बरबादी हो रही है और विकास कागजों पर अधिक हो रहा है। गोष्ठी में दूसरी प्रमुख बात यह उठी कि चकबन्दी तभी लागू की जा सकती है, जब सरकार के पास इसके लिये कोई प्रारूप हो। पहाड़ी क्षेत्र में चकबन्दी कैसे लागू हो, इसके लिये सरकार की तरफ से किसी भी प्रकार का होमवर्क अब तक नहीं हुआ है। इसलिये यह आवश्यक है चकबन्दी की राह को सरल बनाने की दिशा में जनता की ओर से एक प्रारूप बनाया जाये। यह तय हुआ कि चकबन्दी सहित विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ तमाम पहलुओं पर विचार कर जनता के प्रारूप को बना सकें। ताकि उस पर बहस और संशोधन के बाद आगे की राह सुगम हो सके। श्रीनगर में जल्द ही एक बैठक के आयोेजन पर सहमति बनी। तीसरी बात यह सामने आई कि जनप्रतिनिधियों से चकबन्दी पर अमल करवाया जाये।
बैठक में चकबन्दी आन्दोलन के प्रणेता गणेश सिंह ‘गरीब’, शोध अधिकारी डॉ. अरविन्द दरमोड़ा, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल स्वामी, जवान किसान मोर्चा के मीडिया प्रभारी सत्यपाल सिंह नेगी, रेखा अग्रवाल, मदनमोहन नौटियाल, प्रेमदत्त नौटियाल, पी.पी. पैन्यूली, मदनलाल डंगवाल, रामजय असवाल, नवीन प्रकाश ने विचार रखे। चकबन्दी आन्दोलन के युवा कार्यकर्ता कपिल डोभाल द्वारा तैयार की गई, ’गरीब क्रान्ति (एक आन्दोलन) ’पहाड़ों पर चकबन्दी कैसे-क्यों’ पुस्तक का विमोचन किया गया।
चकबन्दी प्रक्रियायें आम काश्तकार को कितनी सहूलियत देती हैं और असुविधा इसका अंदाजा लगाने के लिये चकबंदी के संबंध में इस बहुप्रचारित उक्ति की याद दिलाना ही पर्याप्त होगा कि ‘‘जिस गांव में चकबन्दी हो रही होती है वहां चोरी और डकैती नहीं होती क्योंकि चकबन्दी करने वाले समूचे गांव को पहले ही इतना लूट चुके होते हैं कि उस गांव के आम आदमी के पास ऐसा कुछ बचता ही नहीं जिसे लूटा जा सके।’’
चकबन्दी के संबंध में इसी प्रकार की असुविधाजनक स्थितियों के चलते ही अनेक अवसरों पर देश के अनेक मा0 उच्च न्यायालय द्वारा भी प्रतिकूल टिप्पणियां तो की ही जाती हैं अब तो उत्तर प्रदेश सरीखे राज्यों में भी चकबन्दी विभाग को समाप्त करने की दिशा में निर्णयात्मक विचार किया जा रहा है।
वर्ष 1997-98 में राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश के मा0 सदस्य श्री सुरेन्द्र सिंह पांगती द्वारा तहसील नरेन्द्रनगर के निरीक्षण के समय पर्वतीय जनपदों में चकबन्दी प्रकियायें लागू किये जाने संबंधी पायलेट प्रोजेक्ट के अंतरगत चाका क्षेत्र के ग्रामों को चिन्हित किया गया था। इसके तहत की गयी कार्यवाही में उत्साहजनक परिणाम नहीं प्राप्त हुये थे।
वैसे भी बढती हुयी आबादी के साथ प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में आने वाली जोतों के आकार घटे हैं जिससे इन्हें एकीकृत करने की स्थिति में सडक मार्ग के नजदीक एवं इससे दूर चक निर्माण के लिये भ्रष्टाचार की जो दुकानें खुलेंगी उससे आम जन को कितना नुकसान होगा इसका अंदाजा लगाना सहज है।
मेरे विचार से पर्वतीय श्रेत्रों में चकबन्दी लागू किये जाने के स्थान पर सामुदायिक खेती को बढावा देने संबंधी प्राविधानों को लागू किया जाना अधिक सार्थक और औचित्यपूर्ण हो सकता है ।
मध्य प्रदेश राज्य में भी बहुत बडा हिस्सा पठारी और पर्वतीय क्षेत्रों जैसा है और इस राज्य में सामुदायिक खेती केा प्रोत्साहित करने संबंधी प्राविधान सफलतापूर्वक कार्य भी कर रहे है।
अशोक कुमार शुक्ला