उत्तराखण्ड के पहाड़ी जिलों में चकबन्दी की माँग को लेकर विगत तीन दशकों से संघर्षरत पौड़ी गढ़वाल की असवालस्यूँ पट्टी के ग्राम सूला निवासी गणेश सिंह नेगी ‘गरीब’ गाँव-गाँव भ्रमण कर लोगों को लामबंद कर रहे हैं। पेश है उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश।
सवाल:- अधिकांश जनता चकबंदी से अनभिज्ञ है, ऐसा क्यों ?
जवाब:- हर अच्छे अभियान के शुरूआती दौर में ऐसा होता है। सत्तर के दशक में परिवार नियोजन कार्यक्रम को लेकर देश की अधिकांश जनता भ्रमित रही। शुरूआती दो दशकों में यह कार्यक्रम असफल ही रहा। लेकिन आज स्थिति उलट है और हर आदमी स्वयं परिवार नियोजित कर रहा है।
सवाल:- कई लोग कहते हैं कि सीढ़ीदार खेत व कृषि भूमि की असमान गुणवत्ता के चलते चकबन्दी सफल नहीं होगी।
जवाब:- शुरूआती दौर में ऐसे सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन चकबंदी खेती-बाड़ी की विशेष लाभदायी कार्य योजना है, जो लगभग दुनिया भर में प्रचलित है। यह उत्तराखण्ड के पुश्तैनी कृषि व पशुपालन व्यवसाय को फिर से लौटायेगा। पलायन रुकेगा और समाज खुशहाल होगा, बशर्ते पर्वतीय जिलों के लिये कृषि उन्मुख विकास योजनायें बनाकर ग्रामीण काश्तकारों को विशेष पैकेज व सिचांई सुविधायें मुहैया करायी जायें।
सवाल:- सरकार ने आपकी अब तक क्यों नहीं सुनी ?
जवाब:- ऐसी बात नहीं है। वर्ष 1989 में पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले में निर्णय भी ले लिया था। पौड़ी तथा हल्द्वानी में चकबंदी कार्यालय खुले, जो वर्ष 1996 तक अस्तित्व में रहे। चकबंदी प्रक्रिया शुरू हो जाती, लेकिन चुपचाप ये कार्यालय बन्द कर दिये गये। हाँ, मैं यह कहूँगा कि अभी तक उत्तराखण्ड की सरकारों ने इसमें कम दिलचस्पी दिखलाई। खण्डूरी सरकार में त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी, जिसका मैं भी एक सदस्य था। लेकिन उस कमेटी की एक भी बैठक नहीं हुई। पौड़ी जिले से कई प्रस्ताव शासन के पास लम्बित पड़े हैं। हमारे कल्जीखाल ब्लॉक से एन.डी. तिवारी के समय में 8 ग्राम सभाओं के प्रस्ताव गए, पर कोई सुनवाई नहीं हुई। मुख्यमंत्री निशंक चकबंदी की आवश्यकता महसूस करते हैं, लकिन धरातल पर हो कुछ नहीं रहा है। लेकिन इतिहास गवाह है कि किसान व गाँव की उपेक्षा व्यवस्था को बदल देती है। दुनिया में इसके कई उदाहरण हैं। भारत में ही तेलंगाना और नक्सलबाड़ी आन्दोलन जमीन को बचाने के ही आंदोलन थे। जायज बात को मान लिया जाना चाहिये।
सवाल:- पहाड़ में कृषि-व्यवस्था वर्षा आधारित है। ऐसे में सूखे चकों में क्या उपजेगा ?
जवाब:- हमें कृषि का पारम्परिक तरीका बदलना पड़ेगा। अधिक व ऊपरी सिंचाई वाली वार्षिक फसलों की खेती के पचड़े में नहीं पड़ना होगा। काश्तकार अपने चकों पर बागवानी जड़ी-बूटी की खेती को बढ़ावा दे तो यह दीर्घकालिक व लाभदायक है तथा सिंचाई की भी कम आवश्यकता पड़ेगी। फिर हौज व खाल में वर्षा के जल को संग्रहीत कर सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकती है। सिंचाई के बहाने चकबंदी के सवाल को खारिज नहीं किया जा सकता।
सवाल:- ब्रिटिशकालीन बंदोबस्त के तहत मालगुजार (पधान) के पास हजारों हेक्टेयर भूमि है, जबकि सीमान्त कृषकों के पास मामूली। अधिकांश दलित अभी भी भूमिहीन हैं। ऐसे में चकबन्दी से पूर्व आप भूमि सुधार कानूनों की आवश्यकता महसूस नहीं करते ?
जवाब:- चकबंदी की माँग के मूल में भी यह उद्देश्य है। वास्तव में सच यह है कि ब्रिटिशकाल में जिन लोगों को हजारों नाली भूमि मिली वे खेती के युग में संपन्न होकर पलायन कर गये। मामूली काश्तकार भूमिहीन व गरीब रह गये। बाद में 1965 के पैमाइश (बन्दोबस्त) में भी स्थिति को सुधारा नहीं गया। आज मालिकाना हक न होने से हजारों हेक्टेयर भूमि बंजर पड़ी है। जो लोग खेतीबाड़ी करना चाह रहे हैं वे भूमिहीन हैं। 47वें संविधान संशोधन की 9वीं अनुसूची में भूमि सुधार का प्राविधान है। पर बंगाल के अलावा अन्य राज्यों ने इस ओर ध्यान नही दिया। मेरी यह भी माँग है कि यदि सरकार भू-सुधार करने में सक्षम नहीं है तो वह भूमि से लदे लोगों से भूमि क्रय कर तथा सरकार की कृषि बंजर श्रेणी तीन की जमीन सीमान्त कृषकों जरूरतमंदों को इस समयबद्ध अनुबन्ध के साथ बाँटे कि यदि उन्होंने नियत समय पर आबंटित भूमि पर कृषि कार्य कर न दिखाया तो खेत वापस ले लिये जायेंगे। यह नियम जरूर प्रभावी होगा। वास्तविक किसान भी अस्तित्व में आयेंगे। वैसे भी सामान्य भूमि हदबंदी (सीलिंग एक्ट) में व्यवस्था है कि राज्य के आदि मूल निवासी के पास अधिकतम 12.5 एकड़ भूमि अवश्य होनी चाहिये। हमारे पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश राज्य के चकबन्दी अधिनियम में भी यही व्यवस्था है।
सवाल:- जब इस राज्य की वामपंथी प्रगतिशील ताकतें, गरीब कृषक भूमि सुधार व चकबन्दी की आवश्यकता महसूस करते हैं तो आप इसे बीते साढ़े तीन दशकों से बड़ा जनान्दोलन क्यों नहीं बना पाये ?
जवाब:- राज्य बनने पर आशा थी कि नया भू-कानून बनेगा और उसमें चकबंदी की अनिवार्य व्यवस्था होगी। लेकिन जो कानून बने उसने निराश ही किया। सरकार को चाहिये कि वह चकबन्दी को दृष्टिगत रखते हुए ही भूमि अधिनियम बनाए। रही बात राजनीति की तो अब अवाम की हर गतिविधि सत्ता व राजनीति से प्रभावित हैं। नैसर्गिक व सरल तो कुछ रह ही नहीं गया है। यदि ऐसे में कोई राजनैतिक दल चकबन्दी को गंभीरता से लेता है, चाहे वह राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय, अवाम को उसके साथ होना चाहिये। इस बाबत राजनीतिक संघर्ष से भी परहेज नहीं होगा। चूँकि चकबंदी समर्थक व इस राज्य में जल-जंगल -जमीन के हिमायती कहते भी रहे हैं कि यह राजनीतिक लड़ाई है। उक्रांद तो सरकार में शामिल है। उसे चकबन्दी के लिये ठोस कार्य करना चाहिये, तभी तो पर्वतीय राज्य की परिकल्पना भी साकार होगी। साफ कहूँ तो चकबन्दी के बिना इस नवोदित राज्य का भला होने वाला नहीं है। मैं तो जब तक जिन्दा हूँ तब तक इस माँग को लेकर संघर्षरत रहूँगा।


उद्यान प्रदेश और फ्लोरिकल्चर स्टेट बनाने का दावा करने वाली उत्तराखण्ड सरकार से एक बार जरुर पूछा जाना चाहिये कि बिना चकबन्दी किये इसे कैसे परवान चढ़ाओगे? छितरी जोतों और बिखरे खेतों में कौन सा उद्यान लग सकता है?