प्रस्तुति : मोहन सिंह शाही
स्वतंत्रता सेनानी चन्द्रसिंह शाही का देहान्त 12 मार्च 1988 को हुआ था। लेकिन उनका अभाव आज भी कपकोट क्षेत्र की जनता को खलता है। उनका जन्म 12 अगस्त 1909 को बागेश्वर जिले के ग्राम असौं, कपकोट में हुआ था। वे सन् 1938 से ही कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता रहे थे। तब वह मंडल कांग्रेस कमेटी कपकोट के मंत्री थे। उन्होंने 17 फरवरी 1941 को प्रथम बार कपकोट में व्यक्तिगत सत्याग्रह किया। सरकारी आदेश से पटवारी दलीप सिंह ने उन्हें कपकोट में गिरफ्तार कर 19 फरवरी 1941 को अल्मोड़ा जिला मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।
जिला मजिस्ट्रेट ने श्री शाही को एक दिन की सजा तथा एक सौ रुपए का जुर्माना किया। जुर्माना न देने पर दो माह के कैद की सजा दी। जेल से छूटने के बाद पुनः नुमाइशखेत बागेश्वर में सत्याग्रह आरम्भ कर दिया। तल्ला कत्यूर के पटवारी केशव दत्त, दुग के पटवारी खीम सिंह और तत्कालीन कानूनगो ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 3 मार्च 1941 को जिला मजिस्ट्रेट ने उन्हें 15 माह की कैद और 200 रुपए का दण्ड दिया। अर्थ दण्ड न देने पर छः माह की कैद और बढ़ा दी गई। चन्द्रसिंह शाही के साथ उनके गाँव के ग्यारह व्यक्ति बहादुर सिंह शाही, कुंजर सिंह शाही, चन्द्र सिंह द्वितीय, घुन सिंह शाही आदि भी आंदोलन में शामिल रहे। 15 मार्च 1941 को चन्द्र सिंह शाही को अल्मोड़ा जेल से बरेली जेल भेज दिया गया। बरेली से 22 जुलाई 1941 को उन्हें कैम्प जेल लखनऊ भेज दिया गया। दिसम्बर 1941 को वह लखनऊ से रिहा हुए।
14 अगस्त 1942 को ह.द. 129 डी.आई.आर. के अधीन चन्द्र सिंह को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया गया। 17 अगस्त 1942 को उन्हें सिक्यूरिटी प्रिजनर का कठोर कारावास अल्मोड़ा जेल में दिया गया। उन्हें जेल में यातनाएँ भी दी गयीं। 30 अगस्त 1942 को उन्हें अल्मोड़ा जेल से बरेली जेल में स्थान्तरित कर दिया गया। 27 दिसम्बर 1944 को चन्द्र सिंह शाही को जेल से रिहा कर देने के बाद उन्होंने कपकोट में मंडल कांग्रेस की स्थापना की और वे मंत्री बने। सन् 1950 में वे तहसील कांग्रेस कमेटी बागेश्वर के मंत्री बने। 1948 से 1958 तक वह जिला बोर्ड अल्मोड़ा के निर्वाचित सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने कपकोट के विकास के लिए कई कार्य किए। उन्होंने जूनियर हाई स्कूल सनेती और जूनियर हाई स्कूल कर्मी की स्थापना में सहयोग किया। साल्वे मिडिल स्कूल कपकोट को हाई स्कूल का दर्जा दिलवाया। बाद में साल्वे स्कूल को इण्टर की मान्यता दिलाई। 1950 में उनहोंने असौं में जूनियर हाई स्कूल खोला, फिर इसे हाई स्कूल व बाद में इंटरमीडिएट बनवाया। 1945-48 के बीच दानपुर में अकाल पड़ा। श्री शाही जी ने अकाल पीड़ितों की बहुत सहायता की।
चन्द्र सिंह शाही ने बागेश्वर से कपकोट तक श्रमदान से सड़क बनवाई। सड़क निर्माण में दानपुर के प्रत्येक गाँव के नागरिकों ने सहयोग दिया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त जी ने चन्द्रसिंह की बागेश्वर नुमाइश खेत में बहुत प्रशंसा की और उन्हें भरोसा दिलाया कि वर्तमान में राजकोष में धन का अभाव है। जब राज्य के पास संसाधन हो जायेंगे तो सरकार बागेश्वर-भराड़ी सड़क के लिए धन उपलब्ध करा देगी। चन्द्रसिंह शाही तथा खीमसिंह कोरंगा शामा, त्रिलोक सिंह कर्मियाल, बहादुरसिंह शाही आदि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नेतृत्व में बागेश्वर से भराड़ी सड़क श्रमदान से निर्मित हुई। स्वतंत्रता सेनानियों की यह सड़क बागेश्वर से भराड़ी तक आज सबसे बदतर हालत में है। इस सड़क में कहीं अतिक्रमण है तो कहीं गड्ढे और खन्दक बने हैं। इस सड़क की दशा सुधारने में पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद भगत सिंह कोश्यारी व राज्यमंत्री बलवन्त सिंह भौंर्याल भी कुछ नहीं कर पाये। विकास का दम्भ भरने वाले भाजपा के नेताओं को इस सड़क की याद नहीं आती!
चन्द्र सिंह शाही ने अपना सारा जीवन समाज के उत्थान में लगाया। शराब और मन्दिरों में पशुबलि के वे कट्टर विरोधी थे। उन्होंने कई बार असौं के गोलू मन्दिर में देवी भागवत करवाये। वे महात्मा गांधी के भक्त थे। वे हिन्दू समाज में जातीय भेदभाव को मिटाने का प्रयास करते थे। वे हरिजन, ठाकुर, पण्डित सबको समान देखते हुए हरिजन और गरीब तबके के उत्थान में तत्पर रहते थे। वे अन्धविश्वास और बलिपूजा का विरोध करते थे। क्षेत्र के बहुत सारे प्रभुत्वजनों का सुझाव है कि चन्द्रसिंह शाही की याद को चिरस्थाई रखने के लिए राजकीय महाविद्यालय कपकोट का नाम उनके नाम से हो और एक महाविद्यालय की तरह ही तमाम जरूरी संसाधनों से परिपूर्ण वह संस्थान हो।

























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