होली शब्द सुनते ही मन में शरारत और हरारत एक साथ शुरू हो जाती है। रंगों का यह त्यौहार कुछ ऐसा ही है। लेकिन मेरे गाँव की होली तो अजीब थी। हर घर में होली का त्यौहार मिट्टी, गोबर तथा कीचड़ के पानी को एक-दूसरे पर डालकर मनाया जाता था। मुझे लगता है तब गाँव में रंगों की कमी होगी। जो भी हो उस होली और अब की होली में धरती-आसमान का अंतर दिखने लगा है। वह होती थी होली, गाँव के लोग एकजुट होकर होली के गीत गाते थे। देव मंदिरों में होली का अलग ही आनंद था। अब तो शराब ने होली का मजा खत्म कर दिया है। अब होली सिर्फ दिखावे की रह गई है।
मेरा छोटा गाँव लेकिन लोग बड़े-बड़े। होली आते ही नौकरी-पेशा लोग घर में जुटने लगते। मेरे घर में बैठकें चलतीं, जो मेरे दादा स्व. भानदेव जी के नेतृत्व में होती थी। तब मेरी उम्र चार साल की होगी। वह होली आज भी मेरे दिल-दिमाग में पूरी तरह रची-बसी है। मेरा पैतृक गाँव था-छनापानी, जिसे दस्तावेजों में अंग्रेज, ‘सनकोट’ दर्ज कर गए हैं। बागेश्वर जिले की खरेही पट्टी है और ग्राम सभा चौगाँवछीना। हाँ, बात हो रही है होली की, मैं अपना परिचय देने लगा। बैठकें पूरी होने पर होली कैसे गाई जाएगी, किन लोगों के घर में होली होगी, क्या-क्या इंतजाम होंगे, सभी निर्णय लेने के बाद होली की चीर सैम मंदिर में बाँधी जाती थी। इस दिन गणेश की स्तुति होती थी और सैम देव के मंदिर में ढोलक, झांझर, समेत विभिन्न प्रकार के वाद्ययंत्रों के साथ- ‘सिद्धि को दाता….’ बोलों से होली का गायन शुरू होता। शाम ढलते ही लोग अपने घरों में भोजन आदि की तैयारी में लग जाते। आठ बजे रात से होली का जो खुमार चढ़ता वो रात 12 बजे बाद ही बंद होता। कभी-कभार ‘दम’ के सुटके अधिक हो जाते तो होलियार दो-दो बजे रात तक होली में मस्त हो जाते। बीच-बीच में कुमाउनी गीतों का भी संगम रहता। अश्लील गीत भी गाए जाते, यह गीत तब गाए जाते, जब महिलाएं अपने घरों में सो गई होतीं। इन्हें गाने में परहेज/पर्दा रखा जाता था। हालांकि मुझे ये होलियाँ 15 साल के बाद ही समझ में आईं। दिन में भाभीयों का पीछा कर रहे बड़े-बड़े देवर गोबर, मिट्टी तथा अन्य सामग्री उन पर उड़ेलते हुए, मदमस्त होकर ‘होली है…..’ करते घर-घर जाते, हम छोटे बच्चे भी उनके साथ हो लेते। यदि मेरे घर की बारी आती तो मुझे यह सब अटपटा लगता। दिन में 12 बजे से होली गायन शुरू होता। होली में जमकर फुहड़ता परोसी जाती, लेकिन इसका विरोध कोई नहीं करता। पूरे छह दिन-रात चलने वाली होली में महिला-पुरुष इतने मदहोश हो जाते, उन्हें अन्य कामों की भी परवाह नहीं रहती। महिलाएं दिन में होली का आयोजन करतीं थी। पुरुषों के कपड़े पहनकर वे स्वांग रचती थीं, जिसे थेटर कहते थे। महिलाएं देव मंदिरों में एकत्र होकर वहाँ, ‘खोल दे माता खोल भवानी धार में खिवाड़ा….’ गीत से भगवान की स्तुति करतीं। मैं तो तब महिलाओं तथा पुरुषों की होली में बराबर रहता था। चार साल का फायदा जो मिलने वाला हुआ। रात की होली में मुझे मेरे दादा जी नहीं ले जाते। कहते कि यह सो जाएगा। दिन की होली में आएगा लेकिन मैं महिलाओं की होली में अधिक जाना पसंद करता था। वहाँ मुझे स्वांग देखने में आनंद आता था।
‘हिलमा चाँदी का बटना, दिल में तेरी रटना’ गीत तब काफी प्रचलित था। होली गीत के बीच-बीच में यह गीत बार-बार दोहराया जाता। कुछ भजन भी गाए जाते। आलू के गुटके, खीर तथा हलुवा, चाय पीने के बाद होलियार और भी मस्त हो जाते। बड़े लोग कभी-कभार बीच-बीच में ‘दम’ के सुटके लगाने को होली के त्यौहार के रूप में ले लेते। छलड़ी के दिन होलियार घर-घर जाकर लोगों से अगले साल की होली में आने का वचन देते। घरों से होलियारों पर गंदा पानी उड़ेला जाता। नहाने-धोने के बाद देव मंदिरों में हलुवा बनाने की तैयारी शुरू हो जाती। सभी लोग अपने-अपने घरों से घी तथा गेहूँ का मोटा आटा लेकर मंदिर में पहुँचने लगते। लकड़ी का ईंधन के लिए इंतजाम होने लगता। मंदिर में पाले बड़े पेड़ों की सूखी टहनी तोड़ी जाती। ताँबे के तौल मंगाए जाते। पहले अनुमान लगाया जाता कि किसके पास बड़ा तौला है ? तब घटनगाड़ चनर सिंह के यहाँ तौला होने की बात होती। एक व्यक्ति धार में जाकर जोर से धात लगाता, ‘ओ हो चनर दा तौला भी ले आना।’ करीब तीस किलो के चार तौलों में हलुवा बनाया जाता। पंडित पूजा-पाठ में रमे रहते। हलुवा बन जाने पर धार में जाकर फिर गाँव वालों को आवाज लगाई जाती, ‘नाना-नातिना, सैंणी, सब आओ रे…।’ देवताओं को हलुवा चढ़ाने के बाद सभी लोग प्रसाद के रूप में छककर हलुवा का आनंद लेते। बड़े बुजुर्ग देव मंदिर में बने हलवे को मित्रों के वहाँ पहुँचाने की बात भी करते। बचे हुए हलवे का बाद में हिस्सा होता। जिस घर में जितने लोग होते, उसका उतना हिस्सा। रिश्तेदारों के लिए अलग हिस्सा। बस होली का हो जाता समापन। लेकिन होली की बात एक माह तक गाँव के दुकान चौकवगड़ा में होती रहती थी कि फलां भाभी के साथ तो होली में ठुमके लगाने में मजा ही आ गया ठहरा हो..। क्या कमर ठसकाने वाली ठहरी…!
अपने 15वें साल की होली का जो रूप मैंने देखा-जाना वो अद्भुत था। उम्र के उस पड़ाव की मीठी सी कसक भुलाये नहीं भूलती। मुझे होली के मायने तथा होली में होने वाली हरकत भी समझ में आने लगी, लेकिन तब बहुत देर हो गई थी। 15 साल बाद वह होली नहीं रही, पढ़ी-लिखी नारियाँ गाँव में आ गई। उन्हें गोबर, मिट्टी आदि से एलर्जी थी। यह उनके पति देव का कहना था। धीरे-धीरे होली भी बंद होने लगी। गाँव के लोग टूटने लगे। छोटे से गाँव के लोग तीन हिस्सों में बँट गए। मेरा परिवार भी गाँव के एक हिस्से के साथ था। धीरे-धीरे लोगों की दूरियाँ बढ़ने लगी। होली का त्यौहार हर साल आता है, लेकिन अब पहले जैसी होली नहीं होती। अब में 39 बसंत पार कर चुका हूँ, इस बीच भी मुझे होली की समझ बढ़ी ही है, लेकिन गाँव के बाद मैंने होली किसी के साथ नहीं खेली। हालांकि वर्तमान में भी कई गाँवों में होलियाँ हो रही हैं। लोग संगठित होने की पुरजोर कोशिश तथा दिखावा कर रहे हैं, लेकिन अंदर से लोग टूट गए हैं। इसके पीछे शराब और पैसा आड़े आ रहा है। इस युग में हर कोई व्यक्ति अपने को किसी से कम नहीं समझता। तथाकथित कुछ धन्नासेठों की बात कुछ और है। वह तो गाँव के लोगों से सीधे मुँह बात करना भी नहीं चाहता। उन्होंने गाँव छोड़ शहरों में अपने आसियाने बना लिए हैं। ऐसे में गाँव की होली अब होली नहीं रही। सिर्फ मान्यताओं और धरोहरों को मनाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि कुछ स्थानों पर आज भी होली की परम्परा को पूर्ववत मनाए जाने की कोशिश युवाओं द्वारा की जा रही है।