कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष के कथित दुरुपयोग के आरोपों के चलते भयभीत पार्टी सरकार के मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी ने अब अपने विवेक से मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से कोई राहत न देने का फैसला किया है। पिछली सरकार से कुछ अलग हटकर कार्य करने के निर्णयों से कई बार अहित भी हो जाता है। ऐसा ही कुछ विवेकाधीन कोष के बारे में हो रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने अपने पाँच साल के कार्यकाल में ‘जरूरतमंद’ लोगों को जमकर रुपये बाँटे। लेकिन अपनी छवि के प्रति बेहद सतर्क मुख्यमंत्री खंडूड़ी ने इस पर रोक लगाते हुए यह निर्णय दिया है कि जब तक इस तरह के मामलों की संस्तुति जिलाधिकारी नहीं करेंगे, किसी भी जरूरतमंद को आर्थिक सहायता नहीं दी जायेगी। इसप्रकार नौकरशाही पर लगाम लगाने की जो बात खंडूड़ी के मुख्यमंत्री बनने पर की जा रही थी, उसे उन्होंने और मजबूत बना दिया। साथ ही भ्रष्टाचार का एक नया रास्ता खोल दिया। जिलाधिकारी अपनी संस्तुति अपने मातहत व सक्षम कर्मचारियों की रिपोर्ट पर ही देंगे। जिस मशीनरी में कदम-कदम पर रिश्वतखोरी का घुन लगा हो, उसमें यह आशा करना कि ये कर्मचारी बिना लिये-दिये जरूरतमंद को आर्थिक सहायता दिये जाने की सिफारिश करेंगे, शेखचिल्ली के हसीन सपने के अलावा और कुछ नहीं है। जो गरीब बेसहारा हजार-दो हजार रुपयों के लिये मुख्यमंत्री के दरवाजे पर कई दिन खड़ा रहता हो, वह घूस के लिये पैसे कहाँ से लायेगा ?
इस मामले में सबसे अफसोसजनक पहलू यह है कि मुख्यमंत्री ने मंत्रियों, विधायकों, सांसदों, जिला पंचायत-ब्लॉक प्रमुखों या नगरपालिका अध्यक्षों की संस्तुतियों पर भी विवेकाधीन कोष न बाँटने का फैसला किया है। यानी अब कोई जरूरतमंद इनके पास पहुँचा भी तो उसे गिड़गिड़ाने के लिये जिलाधिकारी के आगे भेज दिया जायेगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है लोकतांत्रिक प्रणाली पर खंडूरी को रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। वे अपने विधायकों और मंत्रियों पर भी भरोसा नहीं जता पा रहे हैं। मुख्यमंत्री को यदि पिछली सरकार द्वारा विवेकाधीन कोष के दुरुपयोग को लेकर कोई संदेह था, तो वे छुटभैये नेताओं की संस्तुतियों पर रोक लगा सकते थे। लेकिन उन्हें निर्वाचित जन प्रतिनिधियों पर तो भरोसा करना ही था। इससे मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली पर तो सवाल उठ ही रहे हैं, उन सैकड़ों लोगों को भी निराशा हाथ लग रही है जो जरूरत के लिये मुख्यमंत्री से थोड़ी सी राहत राशि चाहते थे। मुख्यमंत्री को इस बारे में सीधे मिलने वाले सैकड़ों आवेदन अब तक वापस जा चुके हैं और लोग अब जिलाधिकारी के चक्कर लगाने को अभिशप्त हैं।