प्रस्तुति : गौरव नौड़ियाल
कहते हैं बचपन इंसान के जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा है। लेकिन देश के बहुत बड़े हिस्से में तो बचपन नजर ही नहीं आता। हालात सर्वत्र तकरीबन एक से हैं। कुछेक ढाबों, रेस्त्राँ, मजदूर और मोटर मैकेनिक की दुकान पर अल्प मानदेय पर काम कर रहे हैं तो कुछेक ने कटोरे को जीने का जरिया बना लिया है। बचे-खुचे कूड़ा बीनने से लेकर चन्द सिक्कों के लिए हर जगह झुक जाते हैं। सर्वशिक्षा अभियान ‘पैसा बनाओ अभियान’ बन कर रह गया है। सरकार, सरकारी नुमाइंदे और गैर सरकारी संगठन एक तरफ तो करोड़ों की तादाद में बालश्रमिक दूसरी तरफ। उत्तराखंड श्रम विभाग का विश्वास करें तो पूरे राज्य में केवल 911 बाल श्रमिक हैं। श्रमविभाग की वर्ष 2007-08 की रिपोर्ट के अनुसार पूरे पौड़ी जिले में कुल 11 ही बाल श्रमिक हैं। जबकि अकेले श्रीनगर शहर में 160 नौनिहाल कन्धे पर स्कूल के बस्ते के बजाय कचरे से भरा हुआ बोरा लेकर दिन-रात चलते दिखाई दे रहे हैं। पूरे जिले की क्या हालत है, इसका अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल है।
ये बच्चे दिन भर कूड़ा करकट बीनने के साथ ही, भीड़भाड़ वाली जगहों पर भीख माँगने को भी मजबूर हैं। इन बालश्रमिकों में देहरादून ही नहीं बल्कि राज्य के कई अन्य हिस्सों सहित बाहरी राज्यों के बच्चे भी शामिल हैं। इनमें तकरीबन 23-24 बच्चे सँपेरा जाति के हैं, जिनका कि पहले ही रोजगार सरकार ने छीन लिया है। बाकी बचे हुए बच्चों में कुछेक बहुरूपिये का काम करते हैं और आधे से अधिक या तो गली-मोहल्लों और नदी के किनारों पर कूड़ा बीन रहे हैं या फिर ढाबों और होटलों में न्यूनतम आजीविका पर नारकीय जीवन जी रहे हैं। आधे से अधिक बच्चे 12 से 14 घंटे कमरतोड़ मेहनत करते हैं। न राज्य सरकार ही और न कोई गैर सरकारी संस्थाएँ ही इन बाल श्रमिकों को बेहतर भविष्य देने के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करने के लिए तैयार हैं।
सर्वशिक्षा अभियान के तहत करोड़ों रुपये पानी में बहने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। विभागीय आँकड़ों से परे आज भी सैकड़ों बच्चे नारकीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। राज्य में सर्वशिक्षा अभियान लचर कार्यप्रणाली के चलते अभी तक कुछ खास असर छोड़ने में नाकाम रहा है। इन बच्चों में 40 फीसदी कुपोषण का शिकार हैं। न इनके पास खाने के लिए सही आहार है और न तन ढकने के लिए कपड़े। स्वच्छ पेयजल के लिये अलकनन्दा का पानी है तो शौचालय के नाम पर नदी का लम्बा-चौड़ा, पथरीला किनारा। आवास फटी हुई टाटों पर, जो कि बाँस की कमजोर बल्लियों के सहारे बस टिका भर है। रेत भरी आँधी और गर्म हवाओं के थपेड़ों के बीच किताबें और सपने दोनों ही नदारद हो गए हैं। जबकि श्रम विभाग राज्य बनने से लेकर अब तक 1133 बालश्रमिकों को विद्यालय पहुँचाने का दावा करता है, लेकिन यह भी स्वीकार करता है कि ये बालश्रमिक मौका मिलते ही स्कूलों से भाग जाते हैं। साफ है, महज स्कूलों तक छोड़ आने भर से ही बालश्रमिकों को बाँधा नहीं जा सकता।
पौड़ी जिले की अगर बात करें तो वैकल्पिक नवाचारी शिक्षा केन्द्र के रूप में एकमात्र शिक्षा केन्द्र कोटद्वार में चलाया जा रहा है। इस तरह के केन्द्रों में बालश्रमिकों को शिक्षा से जोड़ने के उदे्श्य से शाम को कुछ कक्षाएँ संचालित की जाती हैं। पर बालश्रमिक जिले में क्या सिर्फ कोटद्वार में ही हैं ? इस पर डीओ, पौड़ी का तर्क था कि जब जिले के अन्य हिस्सों में बच्चे मिल जाएँगे तो वहाँ भी केन्द्र खुलवा दिए जाएंगे। अब साहब को कौन बताए कि बच्चों की तो भरमार है, जरूरत है तो बेहतर प्रयास करने के। सवाल सिर्फ सरकारी कर्मचारियों का ही नहीं है। अक्सर देखा जाता है कि सभ्य समाज के बाशिंदे भी इन बालश्रमिकों को उपेक्षा से ही देखते हैं। इन बालश्रमिकों की उदास आँखों से देखें तो इस राज्य का भविष्य धुँधला ही दिखाई देता है।
| जिला | बालश्रमिकों की संख्या |
| देहरादून | 29 |
| हरिद्वार | 145 |
| चमोली | 08 |
| उत्तरकाशी | 09 |
| टिहरी | 07 |
| पौड़ी | 11 |
| रुद्रप्रयाग | 02 |
| उधमसिंहनगर | 283 |
| नैनीताल | 171 |
| अल्मोड़ा | 110 |
| पिथौरागढ़ | 82 |
| बागेश्वर | 10 |
| चम्पावत | 44 |