लोकगीत क्या होता है ? हमारे नौनिहाल पहाड़ में ही रह कर भी यह नहीं जानते। वाकया है एक टेलीविजन चैनल द्वारा आयोजित लोकगीत ऑडिशन का। रुद्रप्रयाग में आयोजित इस कार्यक्रम में दो बच्चों के गायन में बराबर नंबर आये हैं। इनके बीच अंतिम फैसला होना है। निर्णायक गैरसैंण के सरस्वती विद्यामंदिर में पढ़ रहे बालक से पूछते हैं एक लोकगीत गाओ। जवाब बगलें झाँकने में खो जाता है। निर्णायक सवाल दागते हैं, किसे कहते हैं लोकगीत? बालक फिर बगलें झाँकने लगता है। निर्णायक फिर ठेठ गाँव की दूसरी बालिका प्रतिभागी से कहते हैं, कोई लोकगीत गाओ। वह तड़ से शुरू हो जाती है ‘चौखुट्यों कि पावर्ती तिलै धारु बोला’ और यह पूछने पर कि क्या लोक गीत गाया, जवाब भी सटीक कि ये चाँचड़ी लोकगीत है।
मेरे लिए ये घटना दुःखद भी थी और चौंकाने वाली भी। गाँव के बीच के प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे बच्चे अपनी माटी से कितनी दूर हैं और ये कि गाँवों के माहौल से ही बच्चे अपनी जड़ों को पोसते हैं, मगर हमारे संस्कारवान बनाने वाले विद्यालयों में उन्हें अपनी पहचान खोकर दुनिया के मुकाबले के लिए तैयार किया जा रहा है। एक ऐसा ही वाकया है मेरे दिल्ली के प्रवासी मित्र का, जो एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान में कम्युनिकेशन मैनेजर हैं। भारत के लिए और स्वयं भी स्थानीय संस्कारों को वरीयता देने वाले तमिल समाज से आते हैं।
आटा तो दुकान से आता है ! आपको भी ताज्जुब होगा इस अधूरे सच से। मेरे मित्र को भी हुआ। फोन संवाद पर दुःखी होते कहने लगे-यार, परेशान हूँ। मैने पूछा किससे परेशान हो ? तो उनका जवाब था बेटे से। मैने कहा, क्यों पढ़ता नही है ? शैतानी करता है या कोई नशा करता है ? सभी का जवाब ना….ना में देते। आखिर में बोले सब ठीक है पर उसे यह पता ही नहीं है कि आटा कहाँ से पैदा होता है। बोलता है कि दुकान से। इकलौती संतान के बाप की पीड़ा को एक किनारे करते हुए दोस्त के नाई बोल गया- यार फर्ज करो बेटा बड़ा हो कर कृषि मंत्री बना तो वो आटे की उपज बढ़ाने के लिए दुकानदार को सब्सिडी दे देगा या ….!
ऐसे ही विकास के लिए समर्पित एक वयस्क साथी हमारे गैरसैण के गाँवों के अधिकारिक दौरे पर थे। खेतों में उगी छोटी राई की पौध देखकर पूछने लगे, ये क्या है ? मै चौंका, पूछा सच बोल रहे हो ? फिर चेहरे के भाव भाँप कर बता दिया कि भाई जिस राई की आपने कल रात सब्जी खाई थी उसी की पौध है। पर जनाब अपनी ही मनवाने लगे कि नहीं उसके पत्ते तो बड़े थे। मैं हँसा भी और दिल ही दिल रोया भी कि दिल्ली के अग्रेजीदाँ स्कूलों में पढ़ कर अंग्रेजी ज्ञान के कारण ये वहीं बैठकर सुंदर योजना तो बना ले रहे हैं पर राई की नाई ही व्यावहारिक समझ नहीं है।
इन तीनों उदाहरणों को उद्धृत करने के पीछे मंतव्य ये कि हमने छः दशकों में किस तरह की शिक्षा व्यवस्था विकसित की है ? वह जिसमें लोग अपनी जड़ों से दूर हों। जब पूरी दुनिया के शिक्षाविद् गहन मंथन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हों कि ‘थिंक लोकली एक्ट ग्लोबली’ और कह गये हों कि ‘‘आज जरूरत बच्चों को अपने परिवेश को समझाने की है न कि ओबामा के बारे में बताने की। ये तो वह स्वयं जान लेगा।’’ लेकिन हमारे अंध अग्रेजीदाँ हों या कथित राष्ट्रवादी, दोनो को यथार्थ को समझने और समझाने की होश नहीं है।
हम कैसे गणतंत्र को विकसित कर रहे हैं, ऐसे हालात में रुककर सोचने की जरूरत है। बाल अधिकार समझौते पर 1992 में बाकी दुनिया के देशों के साथ समझौता कर हमने सब बच्चों को समान अवसर देने की संकलपबद्धता को तो दोहरा दिया। मगर कैसे समान अवसर, यह सोचने का दायरा नहीं बढ़ाया। कपिल सिब्बल पूरे देश में एक जैसा सिलेबस की बात करते हैं। पर कैसी समरूपता, इस पर स्पष्टता नहीं दिखती। उत्तराखंड का संदर्भ देखें। यहाँ सरकार ने कृषि विषय को हटाकर पर्यावरण को शामिल कर दिया। अच्छा है कि पर्यावरण को जोड़ें। पर्यावरण खराब होने से पहले दुनिया और फिर हमारे अस्तित्व को भी खतरा होगा। पर कृषि को हटाने से यह पहल इकतरफा दिखती है। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले पूँजीपतियों के लिए हमारे बलिदान भर की पहल! हम अपनी जड़ों से ऐसे कटें कि उनके लिए एक साधन के रूप में ही इस्तेमाल हों तो ये कैसी समरूपता है ?
अलग-अलग क्षेत्रों में ज्ञान की मूलभूत आवश्यकताएँ अलग-अलग हैं। समरूपता तो सिर्फ गुणवत्ता पूर्ण ज्ञान की होनी चाहिए और राष्ट्रहित के, राष्ट्र के प्रति कर्तब्यबोध के संदर्भ में होनी चाहिए और अवसरों की समानता के संदर्भ में होनी चाहिए। दूरदराज में बच्चे अपने पहले बाल-अधिकार अपने जन्म प्रमाण पत्र से ही वंचित हैं, उनके जीवित रहने का अधिकार कन्या भू्रण हत्या के रूप में सामाजिक असंतुलन बना रहा है। अवसरों के मामले में भी यही स्थिति है। लोकाचार और कार्यसंस्कृति में बच्चों तक में भ्रष्ट मानसिकता और शॉर्टकट की आदतें डाली जा रही हैं । ऐसे में भविष्य के गण और तंत्र दोनों की भयावह तस्वीर उभरती हैं। गैरसैंण में बच्चों के साथ एक बैठक में मैने सवाल किया कि ऐसे हालात में कैसा भविष्य उन्हें दिखता है, वे क्या करेंगे। तो जवाब डरावना था कि ऐसे में आतंकवादी बनेंगे, तभी कुछ दिन सही खा कमा सकेंगे। उत्तर देने वाले बच्चों के साथ बाकी की सहमति न मालूम किस कारण थी, पर मुझे लगता है, ये हमारे गण और तंत्र दोनों के भविष्य के विद्रूप चेहरों का न सिर्फ रेखांकन था, बल्कि भयावह यथार्थ की तस्वीर भी, जो समझ और बोलने दोनों में प्रतिबिंबित हो गई है। समाधान आज से ही तलाशने का भी इशारा है। ज्यादा देर हर हद तक विद्रूपता को विकसित कर देगी।