गढ़वाल मण्डल के टिहरी जनपद के खरसाड़ा-पालकोट के रा.इ.का. में पिछले दिनों बाल लेखन कार्यशाला का आयोजन किया गया था। लेखन अभिरुचि और रचनाशीलता के आधार पर बीस छात्र-छात्राओं का चयन किया गया। किन्तु सौ से अधिक बच्चे कार्यशाला में प्रतिभाग करने को इच्छुक हो गए। अंततः चौवन छात्र-छात्राओं को कार्यशाला में प्रवेश दिया गया। कार्यशाला के ही दौरान जब आकलन प्रपत्र भरवाया गया तब नौ छात्रों ने हिन्दी और राजनीति विज्ञान को, आठ ने अंग्रेजी को और सात ने जीव विज्ञान को अपना प्रिय विषय बताया। जबकि विज्ञान को दो और गणित को तीन बच्चों ने ही अपना पसंदीदी विषय बताया। कक्षा नौ से बारह तक के इन विद्यार्थियों में लगभग पचास फीसदी ने भविष्य में अध्यापक बनने का सपना देखा है। छः लेखन के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं। एक इंजीनियर और चार डॉक्टर बनने का सपना देख रहे हैं।
तैंतीस फीसदी छात्रों को हास्य और लगभग बत्तीस फीसदी छात्रों को ग्रामीण परिवेश की कहानियाँ अच्छी लगती हैं। वहीं चौवन में से छः जासूसी और मात्र पाँच को विज्ञान की कहानियाँ पंसद आती हैं। वहीं बाल पत्रिकाओं में बाल हंस ग्यारह, चंपक इक्कीस और नंदन आठ छात्रों की प्रिय पत्रिका है। कुल चौवन प्रतिभागियों में 32 पहले से ही कहानियाँ लिखते हैं। बाइस पहली बार ऐसी लेखन कार्यशाला में प्रतिभाग कर रहे हैं। दिलचस्प बात है कि पाँच दिवसीय बाल लेखन कार्यशाला के अंतिम दिन लगभग एक सौ दो मौलिक कहानियों की पाण्डुलिपियाँ प्रकाशनार्थ आईं।
बाल साहित्यकार और कार्यशाला के मुख्य संदर्भ व्यक्ति मनोहर चमोली ‘मनु’ का कहना है कि संभवतः यह पहली बार हुआ है कि एक कॉलेज में सिर्फ कहानी लेखन पर कार्यशाला हुई हो, जिसमें बाल रचनाकारों ने अपनी समझ विकसित करते हुए इतनी बड़ी संख्या में कहानियों का सृजन किया हो। उन्होंने बताया कि आधे से अधिक कहानियां नये विषयों और बाल मन के चिन्तन-मनन की ओर घूमती है। कुछ कहानियों में अवश्य अब तक प्रकाशित कहानियों की छाप दिखाई पड़ती है। मगर कथ्य, भाषा-शैली और संवाद की प्रस्तुति मौलिक ही हैं।
























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