‘नैनीताल समाचार’ 1 जनवरी 2009 में विनोद अरविन्द ने ‘गुमशुदा हुए चिपको आंदोलन के असली मुद्दे’ में इस बात को रेखांकित करने का प्रयास किया है कि चिपको आंदोलन को पुनः परिभाषित करने का समय आ गया है। वैश्विक और राष्ट्रीय संदर्भ में वनों के संरक्षण और संवर्द्धन का अपना महत्व है। ग्लोबल वार्मिंग और बदलते मौसम के जमाने में उत्तराखंड इससे अछूता नहीं है। चिपको आंदोलन का पर्यावरण संरक्षण का पक्ष और उस दिशा में उसके कार्यक्रमों को जनपक्षीय या मानवतावादी न मानने का कोई कारण नहीं है। रैंणी और गौरा देवी को लेकर सम्पूर्ण चिपको आंदोलन की तस्वीर नहीं बनती है। ‘आंदोलन अपने प्रारंभकाल में जनवादी था और बाद का आंदोलन उसके कुचलने का षड़यंत्र था।’ ऐसा मानने का भी कोई कारण नहीं है। यदि ऐसा सचमुच में कोई षड़यंत्र था तो उसे सामने लाना भी जरूरी है।
चिपको आंदोलन के उस दौर को याद करना चाहिये जब ठेकेदारी प्रथा और उत्तर प्रदेश शासन की शोषणकारी वन-नीति को समाप्त करने और विकल्प में वन श्रमिक सहकारी समितियों का गठन करने का सिलसिला चल पड़ा। पीढ़ी-दर-पीढ़ी बंधुआ वन श्रमिकों को शोषण से मुक्त कर उन्हें सहकारिता के आधार पर संगठित करने का काम वन बचाओ व चिपको आंदोलन ने ही किया था। वन निगम के प्रबंधक बोर्ड की बैठकों में वन श्रमिक स्वयं उपस्थित रहकर मजदूरी की दरें, काम के घंटे, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं के नियम तय करते थे। उस दौर में वनों के कटान, वन श्रमिकों की मजदूरी और उनकी आमदनी तथा रोजगार की दशाओं में जो सुधार हुआ है उसे देखकर आंदोलन को पुनः परिभाषित किया जा सकता है। यह भी समझने लायक तथ्य है कि चिपको आंदोलन ने कभी भी वन निगम को ठेकेदारी प्रथा का विकल्प नहीं माना और निरंतर उसके विरुद्ध संघर्षरत रहा।
वन संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। रोजगार प्राप्त करने का वनवासियों, वनों पर निर्भर समुदायों का मौलिक अधिकार है। चिपको आंदोलन ने कभी भी इसका विरोध नहीं किया। चिपको आंदोलन ने रोजगार की तात्कालिक और दीर्घकालिक योजनाओं के सुझाव सरकार और समाज के समक्ष रखे हैं। वनों के संरक्षण के बिना किसी भी प्रकार के रोजगार की कल्पना नहीं की जा सकती है। साथ ही वनों के संरक्षण में पर्यावरण संरक्षण के तत्व निहित हैं। समझने वाली बात यह है कि पर्यावरण संरक्षण के अर्थ को हम किस रूप में देखते हैं। स्वस्थ व समृद्ध वन संपदा के बिना खेती और पशुपालन की कल्पना नहीं की जा सकती है। वर्तमान में ये दोनों पारंपरिक व्यवसाय खतरे में हैं। एक जमाने में जब वनों पर ग्राम समुदायों का अधिकार था, तो उत्तराखंड का किसान दुनिया के संपन्न और समृद्धशाली किसानों में एक था। आज हम जिस संस्कृति, कला-कौशल, शिल्प व मूर्ति कला की बात करते हैं, जिस जैव विविधता, रस्मोरिवाज की बात करते हैं, वह सब उसी युग की देन हैं। आज तो उस सबको संजोकर रखने की ही नहीं, बल्कि विकसित करने की जरूरत है।
कोई भी आंदोलन अपने आप में पूर्ण नहीं होता है और न अंतिम होता है। वह केवल अपने समय की प्रतिध्वनि होता है। समय की माँग ही है कि चिपको आंदोलन से अभी भी अपेक्षायें हैं और यह देश की सीमाओं को पार कर दूसरे कई देशों में प्रतिध्वनित हो रहा है। जरूरत है कि इसकी कमियों को दूर करने के लिये बहस को आगे बढ़ाया जाये और बहस को कार्यरूप में बदला जाय।
धूमसिंह नेगी
जाजल, टिहरी गढ़वाल
























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