पिछले कई वर्षों से सूखा झेल रहे उत्तराखण्ड के लिये 2010 का साल खूब वर्षा लेकर आया। मगर एक बार जब वर्षा शुरू हुई तो उसने रुकने का नाम नहीं लिया। वर्षा के सारे कीर्तिमानों को ध्वस्त करते हुए इतना पानी बरसा कि उसे बाँधने की क्षमता जमीन, गाड़-गधेरों या नदियों में नहीं रही। मानव द्वारा जहाँ-जहाँ प्रकृति के नियमों का उल्लघंन कर मकान, सड़क, रास्ते, तटबन्ध आदि बना लिये थे, उन सब को तहस-नहस कर प्रकृति ने पानी का साम्राज्य पुनः स्थापित कर मनुष्य को फिर याद दिलाया कि प्रकृति के आगे आज भी वह बौना ही है। तबाही एवं बर्बादी यह अब लम्बे समय तक लोगों के मन-मस्तिष्क में अमिट रहेगी। हर व्यक्ति, हर परिवार, हर गाँव, हर पट्टी, हर ब्लॉक, हर तहसील, हर जिले के पास इस अतिवृष्टि तथा उससे हुए नुकसान की कोई न कोई कहानी मौजूद है। सैकड़ों मनुष्यों तथा जानवरों की जिन्दगी लीलने के अलावा यह अतिवृष्टि सड़कों, भवनों, रास्तों खेतों, पेयजल तथा विद्युत योजनाओं के नुकसान के रूप में हजारों करोड़ रुपये की बर्बादी कर गयी और अपने पीछे कुछ सवाल भी छोड़ गयी। उदाहरणार्थ, क्या यह तबाही प्रकृति का कोप थी या फिर इसमें मनुष्य का भी हाथ था ?
प्रकृति के इस असामान्य रूप को मानवीय क्रिया-कलापों, प्रकृति से की जा रही छेड़छाड़ तथा पेट्रोलियम उत्पादों के अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ा जा सकता है। वैज्ञानिक बार-बार कह रहे हैं कि यदि ग्लोबल वॉर्मिंग को न रोका गया तो इस तरह की प्राकृतिक आपदायें सामान्य हो जायेंगी। ये बातें अब सच साबित हो रही हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। अंटार्कटिका में करोड़ों वर्षों से जमी बर्फ की विशालकाय चट्टानें टूट कर समुद्र में मिल रही हैं। अमेरिका के तटवर्ती क्षेत्रों में चक्रवाती तूफानों की संख्या तथा तीव्रता साल दर साल बढ़ती जा रही है। कुछ वर्ष पूर्व बांग्लादेश में तूफान ‘नरगिस’ ने दो लाख से अधिक मनुष्यों की जिन्दगी लील ली। इस वर्ष चीन तथा पाकिस्तान में भी अब तक के इतिहास की भीषणतम बाढ़ आयी। लेह में बर्बादी हुई तो उत्तराखंड में हुई अतिवृष्टि से दिल्ली, आगरा तक को बाढ़ का खतरा पैदा हो गया। टिहरी बाँध में पानी का स्तर हरिद्वार, ऋषिकेश तक नदी के रास्ते में पड़ने वाली बस्तियों के लाखों लोगों को डराता रहा। ये उदाहरण बता रहे हैं कि असामान्य प्राकृतिक स्थितियाँ दैवीय न होकर, मानव की करतूतों का प्रतिफल है। और यह भी कि जो अब तक हो रहा है वह सब आने वाली फिल्म का ट्रेलर मात्र है। अब आगे की स्थितियों की भयावहता की कल्पना ही की जा सकती है।
वायुमंडल में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाई ऑक्साइड, हीलियम, मीथेन आदि गैसों की एक निश्चित मात्रा है। इन गैसों का सन्तुलन से मौसमी दशायें सामान्य होती हैं। परन्तु अब तेज औद्योगिक विकास, वनों के अंधाधुंध कटान तथा जनसंख्या वृद्धि के कारण यह संतुलन बिगड़ गया है। ग्रीन हाउस गैसों, जिसमें कार्बन डाइ ऑक्साइड मुख्य है, के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं। ऋतु चक्र बदल रहा है। सूखा या अतिवृष्टि जैसी घातक स्थितियाँ पैदा हो रही हैं। परन्तु इस खतरे को नजरअंदाज करते हुए मनुष्य उपभोगवाद की अंधी दौड़ में फँसा है, जिसने हमें सिर्फ यह सिखाया है कि इस संसार का सबसे बड़ा सुख पैसा कमाना है। चाहे यह पैसा धरती खोद कर आये या फिर जंगल काट कर।
ग्लोबल वॉर्मिंग के दुष्प्रभाव आगे भी देखने को मिलते रहेंगे। खाद्यान्न उत्पादन पर विपरीत असर पड़ेगा, जो महंगाई, भुखमरी, कुपोषण आदि बढ़ायेगा। जरूरत है कि अनावश्यक उपभोग पर आधारित मौजूदा पूंजीवादी विकास के मॉडल को तिलांजलि देकर एक ऐसा मॉडल ढूँढा जाये, जिसमें शेयर बाजार के सेंसेक्स या जी.डी.पी. से विकास को न आँका जाये वरन् खुशी, स्वास्थ्य तथा बेहतर पर्यावरण जैसे मानकों पर विकास को तोला जाये। तभी प्राणि-जगत को दीर्घ एवं स्थायी जीवन मिल सकता है।