इधर पिछली बार की तरह हुक्काराम जी बजट की सम्भावित घोषणाओं की चर्चा में आते ही सक्रिय हो गये हैं। कुछ लाल बत्ती जनित चिन्तायें उनके गले में फाँस की तरह अटक जाती हैं-पूछने पर वह इस अटकन को कुछ यों बया करते हैं…इधर बड़ी सरकार एक दम पराई है। लोकल सरकार तो अपनी ठैरी। कितना ख्याल रखती है अपनों का। इसे निभाने के लिए उन्हें बहुत कुछ करना पड़ता है।
हुक्काराम जी ने हमसे आग्रह किया कि कुछ अखबार नवीसों को बुला कर एक दावत-पानी का इन्तजाम किया जाय। दावत-पानी के बजट में कन्जूसी लोकल सरकार को बरदास्त नहीं। इस बैठक में, बजट की पूर्व संध्या कहिए, हम आशा करेंगे कि राशन सस्ता हो, मंहगाई कम हो। इस अवसर पर हम बड़ी सरकार को ज्ञापन भी देंगे कि वह हमसे सौतेला व्यवहार न करें और समझौता करें, लोकल सरकार के नुमाइन्दों की वाहवाही करें।
हमने हुक्काराम जी पर पलटवार कर दिया कि यह तो दिल्ली का मामला है। आपको लोकल इकोलॉजी पर चिन्तन करना चाहिये। हमारी प्राकृतिक आपदायें, बाढ़, पहाड़ का खिसकना, दरकना, घरों का ध्वस्त होना, ये सब इकोलॉजी ही तो हैं। सब भूख, प्यास, शिक्षा और घोटालेबाज मित्रों से जुड़ी हैं।
हुक्कारामजी के सहज तेवर बदल जैसे गये। आप सब कुछ समझते हैं फिर भी हमसे बेवजह बतिया रहे हैं। हर बत्तीधारी लोकल जनता की लाज रखने में पीछे नहीं है। हमारी चिन्ता समझिये। लाख कोशिशों के बाद भी लोकल जनता हमारे नेताओं की जै-जैकार करने से मुकर रही है। लालबत्ती वालों की तो छलड़ी करने को है। चैनल वाले कह रहे हैं- ‘दायित्वधारी किस काम के, दुश्मन अनाज के…’ हमने इन अखबार वालों को जवाब देना है कि लालबत्तीवाले किस तरह अपने-अपने क्षेत्रों में धमाल कर रहे हैं। लेकिन ससुरी जनता को ये लालबत्ती नहीं भा रही है। देखो मैंने केवल टी.ए. के लिए पिछले दिनों में नाममात्र बारह लाख खर्च किये। देखिये इन अखबार नवीसों ने छाप दिया कि हमने 15 लाख खर्च कर दिए। सरासर तीन लाख की बड़ी झूठ हमें बदनाम करने की साजिश। फिलहाल हमारा दायित्व है कि ससुरी जनता का ध्यान गजबजायें, बजट पर अपनी प्रतिक्रिया दें।
…इस मौजूदा बजट से आपदा-धारियों की परेशानियाँ बढ़ेंगी। आयकर में हजारों की छूट देकर मल्टी नेशनल कम्पनियों के कम्यूकेबल उत्पादन की बिक्री को बढ़ाने की साजिश है। लोग 2-2 कम्प्यूटर खरीदने लगेंगे। पेट्रोल-डीजल का मूल्य कम न कर, गरीब जनता के राशन को महंगा कर दिया है। हमारे पास एक ही चारा है कि बड़ी सरकार को बदलें लोकल वाली सरकार लायें।
पराई सरकार ने ‘लोकलियर’ का जरा भी ध्यान नहीं रखा है। टैक्स बढ़ने से होटलियर परेशान है। महंगी विमान सेवा के कारण हमारे पर्यटक हमारे ग्लेशियरों में नहीं आ पायेंगे। समझो लोकल पर्यटन का चक्काजाम। हमारे सारे किये-धरे पर पानी फिर गया। एक जमाना था। हमारे गुरुजी बैकों के राष्ट्रीयकरण का मुद्दा उठाते थे-आज सारे बैंक बिकाऊ हैं। चीनी, पाकिस्तानी, अमेरिकी कोई उन्हें खरीद सकता है। यह बजट का खेल है।
इस तरह के बेमतलब बजट से हमारे आयातित पर्यटन का बण्टाधार होगा। पराये सांसद, विधायक कुछ भी काम के नहीं रहे हैं। वो तो हमारी संवेदनशील लोकल सरकार ने विज्ञापन जैसे कोषों के बहाने अखबार मालिकों को निर्देश दिया है कि हमारे लाल बत्तीधारी/दायित्वधारियों के कार्यक्रमों को जनता तक पहुँचायें। हमारी जनता विकास से खुश है। वह चाहती है कि जनजागृति फैलाने में पास होने वाले अखबार मालिकों की धनराशि बहुत अधिक को भी न्यून ही रहना उचित होगा।
अब हुक्काराम जी के तमाम वक्तव्य छप चुके हैं। उन्होंने इस छलड़ी पर अपने-अपनों को होलियार के रूप में आमंत्रित किया है ताकि पता चल सके लोकल आला कमान के गलियारों में उनकी सक्रियता की चर्चायें कैसी रही। जनता सुसूरी तो जाये….. यदि आपको पता हो कि लोकल राजधानी के गलियारों में इस बजट प्रतिक्रिया पर क्या चर्चा थी, आप छलड़ी के दिन इसे हुक्काराम जी को जरूर बतायें।