अब तो राजनीति भी होली जैसी हो गयी है। होली में शायद उतने रंग न होते हों, जितने राजनीति में होने लगे हैं। लेकिन इन सारे रंगों का बुनियादी रंग एक ही है भ्रष्टाचार। मगर समझने की बात यह है कि यह भ्रष्टाचार होता क्यों है कई रंगों के झण्डे लेकर कई तरह के लोक-लुभावने नारों की होलियाँ गाते इतने सारे राजनीतिक दल जो होली खेल रहे होते हैं, उनका मकसद एक ही होता है कि सत्ता पर कब्जा करो। जो सत्ता न पा सका वह अगली होली की तैयारी करने लगता करता है तो जो सत्तासीन हो भी गया वह इसी भय से हलकान रहता है कि अगली बार कहीं जनता उसे उठाकर कूडेदान में न फेंक दे। अतः सत्ता में रहने या न रहने के बावजूद एक मुद्दे में समानता रहती है कि लूटो, और लूटो। अब इस लूट-खसोट में उदारीकरण के दौर में तेजी से विस्तार कर रही बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ शामिल हो गयीं हैं, तो उनके नीरा राडिया जैसे दलाल भी। ये सब देश की राजनीति को रंगीन किये हुए हैं।
मगर क्या आम जनता की जिन्दगी में खुशियों के ऐसे रंग हैं ?