प्रस्तुति : दिनेश भट्ट
‘अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा का अधिकार अधिनियिम’ 1 अप्रेल 2010 से लागू हो गया है। शिक्षाविदों, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों ने इस अधिनियम पर अनेक आपत्तियाँ दर्ज की हैं। सरसरी तौर पर अधिनियम ठीक ही लगता है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में अवश्य ही दिक्कतें आयेंगी। इस बीच सरकार ने विदेशी संस्थानों, विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर स्थापित करने, डिग्रियाँ देने और अपने कोर्स चलाने की अनुमति हेतु भी बिल प्रस्तुत किया है। ‘निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2008’ में राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा का अधिकार मंच नाम से देश के जाने माने शिक्षाविद डॉ अनिल सद्गोपाल के नेतृत्व में एक अभियान चला हुआ है। आजादी के संघर्ष के दौरान ही भारत की शिक्षा कैसी हो, शिक्षा द्वारा किन उद्देश्यों को प्राप्त किया जाये एवं कैसे नागरिक बनाये जाये ? इन सब बातों पर गांधी जी सहित अनेकों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, शिक्षाविदों, समाजसेवियों ने अपने विचार दिये थे।
आजादी के समय देश में शिक्षकों, स्कूलों व अन्य संसाधनों की बहुत कमी थी। अतः अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा लागू नहीं हो पायी। लेकिन संविधान निर्माताओं ने सरकार को समयबद्ध रूप से इसे लागू करवाने हेतु स्पष्ट निर्देश भारत के संविधान में दिये हैं। ‘अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ में दो प्रावधान मुख्य रूप से ऐसे हैं जिनको लेकर शंका प्रकट की जा रही है। पहला है पी.पी. पी. मोड में विद्यालयों को चलाना। शिक्षा देना सड़क, पुल, कारखाना, होटल आदि की तरह नहीं है। शिक्षा से जागरूक, सोचने-समझने वाला इंसान बनाया जाता है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्री महोदय संसाधनों की कमी तथा आधारभूत ढाँचे की कमी की बात कर रहे हैं। आखिर सरकार अपने संसाधनों से सरकारी धन से संसाधनों व विद्यालय की कमी को पूरा क्यों नहीं करती ? पी.पी.पी. मोड में विद्यालयों को देने से शिक्षा में जवाबदेही की कमी होगी तथा शिक्षकों के नियमित कैडर खत्म होंगे। शिक्षकों की नियमित भर्ती नहीं होगी, कामचलाऊपन तथा अप्रशिक्षित, गैर पेशेवर के हाथ में शिक्षा जैसा महत्वपूर्ण दायित्व चला जायेगा। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में पढ़-लिख कर शिक्षक-क्लर्क आदि बनना युवाओं का एक सपना होता है। सरकारी नौकरी में आने पर आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा रहती है। स्थानीय युवा ही उस परिवेश में कुशलता से शिक्षा देने का कार्य तथा अन्य सेवायें देते हैं।
दूसरी आशंका इस अधिनियम में वाउचर प्रणाली को लेकर है। अधिनियम में यह व्यवस्था है कि 25 प्रतिशत गरीब बच्चे पब्लिक स्कूल में पढ़ेंगे जिनका खर्च सरकार उठायेगी। सरकार उन स्कूलों को वाउचर देगी। वाउचर प्रणाली जिन देशों में भी लागू हुई असफल सिद्ध हुई है। वाउचर प्रणाली से हमारे देश में भ्रष्टाचार का एक और अंतहीन सिलसिला शुरू होगा। फर्जी एन.जी.ओ. की तरह वाउचर से पैसा प्राप्त करने के लिये हजारों फर्जी स्कूल भी खुलेंगे। शिक्षा के निजीकरण से धंधेबाजों को बिना टैक्स दिये बढ़िया कमाई का जरिया मिला हुआ है। वाउचर प्रणाली ऐसे धंधेबाजों को ही पनपायेगी। सरकार की मंशा शिक्षा में धन खर्च करने की है तो क्यों नहीं वह स्कूलों की हालत सुधारती है तथा शिक्षकों की नियमित भर्ती करती है।
आज हमारे देश में शिक्षा, खेल, राजनीति, विज्ञान प्रौद्योगिकी, साहित्य, कृषि, चिकित्सा सहित सभी क्षेत्रों में काबिल नेतृत्व की कमी है तो इसका प्रमुख कारण शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय को नकारना व महत्वहीन मानना है। सरकार शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में अपनी जवाबदेही व जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। माननीय मंत्री जी भारत सरकार कहते हैं कि युवाओं (18 से 24 वर्ष) को उच्च शिक्षा में 30 प्रतिशत तक दाखिला दिलवाने के लिये 35 हजार कॉलेज तथा करीब 800 विश्वविद्यालयों की आवश्यकता है, अतः विदेशी संस्थानों व विश्वविद्यालयों को भारत में शिक्षा का व्यापार करने की अनुमति दी जा रही है। आजादी के 60 वर्षों में किसी भी सरकार ने चरणबद्ध ढंग से समाज की शिक्षा की जरूरतों को पूरा करने की ओर ध्यान नहीं दिया है। बिना व्यापक बहस के शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों से रायशुमारी किये इतनी जल्दबाजी में फैसले क्यों हो रहे हैं ? विदेशी विश्वविद्यालय क्या हमारे 70 प्रतिशत से अधिक गरीब, ग्रामीण युवाओं को उनकी जरूरतों के मुताबिक शिक्षा दे पायेंगे ? असंभव ! नजरें शिक्षा के भारतवर्ष में कुल ढाई लाख करोड़ से अधिक के सालाना कारोबार पर हैं।
























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