एक सांस्कृतिक संस्था होने के नाते हम अपने नाटकों की निमर्म समीक्षा के लिये तैयार रहते हैं और एक सामाजिक सरोकारों वाले समाचार पत्र के नाते आप को किसी भी नाटक या किसी भी क्रिया कलाप की आलोचना करने का हक भी है। यह आपकी जिम्मेदारी भी है। मगर शहर में दोयम या सोयम दर्जे के नाटक आपके द्वारा अद्भुत, यादगार जैसे विशेषणों से नवाजे जाते हैं, लेकिन युगमंच को आप पूरा दिमाग लगा कर आलोचित करते हैं। अगर दोयम या सोयम दर्जे के नाटकों की टीम की प्रशंसा कर उसे उत्साहवर्द्धित करने के लिये की जाती है तो अच्छा है। लेकिन युगमंच की कटु आलोचना अगर युगमंच के प्रति किसी कुढ़न या घुटन या पूर्वाग्रह का नंतीजा है तो नैनीताल समाचार जैसे प्रतिष्ठित पत्र की प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं है।
आप युगमंच के भटकाव की बात करते हैं, क्योंकि वह होली महोत्सव, फिल्म महोत्सव, गज़ल संध्या, कवि सम्मेलन, नुक्कड़ नाटक, होली स्वांग, लोकगीत गायन प्रतियोगिता आदि आयोजित कराता है। हम हन्हें एक सांस्कृतिक संस्था के रूप में जरूरी आयाम मानते हैं। अच्छे नाटक कराने के साथ-साथ बहस इन्हें बेहतर बनाने पर हो सकती है इनका पटाक्षेप करने में नहीं। एक गतिमान संस्था समय के साथ बदलती है। न बदले तो जड़वत हो जायेगी। आप के कला समीक्षक नाटकों के दोहराव की बात करते हैं। उनसे कहियेगा कि जरा आँख खोलें….देश की कई नाट्य संस्थायें एक ही नाटक के बीसियों यहाँ तक कि सैंकड़ों शोज़ तक करती हैं।
प्रदीप पाण्डे, सचिव युगमंच, नैनीताल