रुपेश कुमार सिंह
‘शहनाई की गूँज में दहेजलोभियों ने छेड़ा मातमी साज‘, ‘शादी के दिन बारात लेकर नहीं आया दहेजलोभी दूल्हा‘, ‘पति बना हैवान: पत्नी को अधमरा कर सड़क पर फेंका‘ और ‘मानवता हुई शर्मसार- पुरुषों ने महिलाओं को बंधक बनाकर पीटा‘ यह तीन खबरें पिछले दिनों तराई के अखबारों की सुर्खियाँ रहीं। ये खबरें स्पष्ट करती हैं कि उत्तराखण्ड की देवभूमि ‘देवियों‘ के लिए अब सुरक्षित नहीं रह गयी है। खास तौर पर देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर तो महिलाओं के लिए बिल्कुल भी महफूज नहीं है। एक के बाद एक महिलाओं पर घट रहीं आपराधिक वारदातें स्पष्ट करती हैं कि आज भी पुरुष समाज महिलाओं को सम्मान और समान अधिकार देने को सहज नहीं हैं। साल दर साल बलात्कार, दहेज हत्या, महिलाओं पर घरेलू हिंसा के मामलों में तेजी से इजाफा हो रहा है। ऐसे में महिला सशक्तीकरण और उन्नयन पर पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत है। आँकड़े दर्शाते हैं कि यदि महिलाओं पर आपराधिक घटनायें इसी दर से बदस्तूर जारी रहीं तो आने वाला समय राज्य के लिए निश्चय ही भयावह होगा।
तीन खबरों में पहले दूसरी घटना पर बात करें। ‘अभी उसके हाथों की मेहंदी पूरी तरह से छूट भी नहीं पाई थी और जिस पति परमेश्वर के सहारे अपनी जिन्दगी जीने का सपना देखा था, वही उसके लिए हैवान बन गया।‘ पति ने दो सम्बन्धियों के साथ मिलकर अपनी ही पत्नी के साथ बलात्कार किया और उसे अमानवीय यातनाएँ दीं। खून से लथपथ और अधमरी हालत में उसे सड़क पर फेंक दिया। यह सब हुआ दिनेशपुर की 14 वर्षीय शिवानी के साथ। शिवानी पर अत्याचार की पटकथा आज से लगभग दो माह पूर्व उसके पिता चण्डीचरण हीरा ने लिख दी थी। नाबालिग पुत्री को उससे लगभग 10 वर्ष बड़े सुभाष के हाथ सौंप दिया। शराबी सुभाष उससे जानवरों की तरह बरताव करता था। मारपीट करना तो दिनचर्या बन चुकी थी। पति के अत्याचार से आजिज आकर शिवानी अपने मायके आ गयी। एक दिन देर रात्रि सुभाष अपने दो मित्र लाखन व राकेश के संग ससुराल पहुँचा। जबर्दस्ती मुँह में कपड़ा बाँध कर उसे मोटरसाइकिल से निकट के किसी रिश्तेदार के घर ले गया। यहाँ शराब पीकर तीनों ने शिवानी से बलात्कार करने की कोशिश की। विरोध करने पर शिवानी को घोर यातनाएँ दी गयीं। उसे पूरी तरह निर्वस्त्र करके पीटना शुरू कर दिया। गुप्तांगों पर प्रहार कर लहु-लुहान कर दिया। इतना ही नहीं, शिवानी के हाथ-पाँव के नाखूनों को प्लास से दबा कर उसे अधमरा कर दिया। शिवानी के शरीर में ऐसी कोई जगह नहीं थी, जहाँ इन दरिन्दों ने चोट न पहुँचाई हो। वह बेहोश हो गयी। इसी हालत में शिवानी को सड़क किनारे फेंक कर तीनों फरार हो गये। सुबह लोग एकत्र हुए, परिजन पहुँचे और शिवानी को होश में लाया गया। लेकिन अब वह मानसिक तौर पर विक्षिप्त हो चुकी थी।
चूँकि इस मामले में एक लड़का असरदार नेता के परिवार से था। इसलिए मामले को दबाने का प्रयास किया गया। पुलिस ने रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया। इस बीच महिला कल्याण संस्था की अध्यक्ष हीरा जंगपांगी अपने दल-बल के साथ पीडि़त महिला को लेकर थाने पहुँची। काफी विरोध करने व उच्चाधिकारियों से शिकायत करने पर एक दिन बाद पुलिस ने धारा 323 में ही तीनों लड़कों पर मुकदमा दर्ज किया, लेकिन पीडि़त का मेडिकल नहीं कराया गया। मासूम बच्ची पर पिता ने अत्याचार की शुरूआत की। इस कड़ी में पति, राजनेता, पुलिस सब जुड़ गये। किसी भी स्थिति में ये लोग मामले का पटाक्षेप करना चाह रहे थे। इसलिए पुलिस ने तीन दिन तक लड़की का चिकित्सा परीक्षण नहीं कराया। महिला संस्था के प्रयास के चलते जिला जज के सामने शिवानी को पेश किया गया। जज साहब ने कड़ी फटकार लगाते हुए पुलिस को तुरन्त मेडिकल कराने का आदेश दिया। शिवानी आज पूरी तरह मानसिक रूप से विक्षिप्त है।
यह तो एक शिवानी है जिसका दर्द सबके सामने आ गया। बलात्कार व छेड़छाड़ के ज्यादातर मामले तो लोकलाज के चलते या सामाजिक दबाव के चलते पुलिस के अभिलेखों में दर्ज ही नहीं हो पाते हैं। राज्य व जनपद उधम सिंह नगर में बलात्कार की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। प्रदेश में वर्ष 2008 में 75 महिलाएँ बलात्कार का शिकार हुई। 2009 में 95 महिलाएँ इसका शिकार हुई। साल 2010 में 105 महिलाएँ हैवानों की हवस का निवाला बनीं। दो वर्ष में पीडि़त महिलाओं की संख्या 30 ज्यादा हो गयी। इसी तरह जनपद उधमसिंह नगर में 2008 में 21, 2009 में 20, 2010 में 21 महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। जनपद में अप्रैल 2011 तक 4 महिलाएँ हवस का शिकार बन चुकी हैं। आँकड़े बयाँ करते हैं कि जनपद महिलाओं के लिए बिल्कुल भी महफूज नहीं है। सूबे में 2008 में 75 महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं, जिसमें से सिर्फ 21 वारदातें जनपद उधम सिंह नगर की हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि तराई में महिलाओं पर किस कदर अत्याचार हो रहा है। जनपद को शर्मसार करने वाला यह आँकड़ा पुलिस की कार्यप्रणाली और समाज की मानसिकता पर प्रश्न चिन्ह खड़े करता है।
पिया के घर जाने की उम्मीद में मेहंदी सजाए बैठी दुल्हन की आँखों में आँसू तो थे पर विदाई के नहीं, बल्कि उसे गम था अपने सपनों के चकनाचूर होने का। दहेज लोभी दूल्हा शादी के दिन दुल्हन के घर बारात लेकर ही नहीं पहुँचा। मनचाहा दहेज और डिमांड पूरी न करने की सपना को इतनी बड़ी सजा मिली कि वह आज तक सदमे से नहीं उबर पाई है। हाथों में मेहंदी सजी, शहनाई बजी, मेहमान जुटे और मंडप भी सजा, लेकिन जब सपना को पता चला कि उसके होने वाले जीवन साथी ने दहेज पूरा न देने पर बारात लाने से इंकार कर दिया है तो पूरा माहौल गमगीन हो गया। सपना के बोल नहीं फूटे। वह स्तब्ध थी कि क्यों उसकी खुशियों को ग्रहण लग गया ? दरअसल रुद्रपुर के मोहल्ला आदर्श कालोनी निवासी केदार सिंह की पुत्री सपना (बदला हुआ नाम) का विवाह क्षेत्र के ही कीरतपुर निवासी कन्हैया सिंह के साथ तय हुआ था। लड़की के भाई सर्वेश के अनुसार शादी से ठीक पहले चार लाख रुपये और आल्टो कार की माँग की गयी। माँग पूरी न होने पर दूल्हे ने बारात ले जाने से इंकार कर दिया। रात में ही लड़की के परिजनों ने इसकी शिकायत पुलिस से की थी। चूँकि दूल्हा स्वयं पुलिस में है, इसलिए कोई कार्यवाही नहीं हुई। दहेज के इस नंगे नाच ने सपना को कभी न भूल पाने का अमानवीय दर्द दिया। सही तो यह रहा कि सपना दहेजलोभियों के आगे के अत्याचार से बच गयी। लेकिन हर एक महिला की किस्मत सपना जैसी नहीं होती। दहेज के लिए हत्या में इजाफा यह बता रहा है कि आज भी लड़की बिना दहेज टेड़ी खीर है। दहेज हत्या में भी जनपद उधम सिह नगर अव्वल है। प्रदेश में वर्ष 2008 में दहेज की खातिर 63 महिलाओं को अपनी जान गँवानी पड़ी तो साल 2009 में यह संख्या बढ़ कर 73 हो गयी। 2010 में 66 महिलाओं की हत्या दहेज की डिमांड पूरी न करने के चलते हुई। जिले में दहेज के लिए महिलाएँ ज्यादा ही उत्पीडि़त हैं। वर्ष 2008 में 10 महिलाएँ दहेज के दानव के चलते अकाल मौत को प्राप्त हुईं। साल 2009 में जनपद में 18 व 2010 में 20 महिलाओं को ससुरालियों ने मौत के घाट उतार दिया। मौजूदा वर्ष 2011 में अप्रैल तक सात महिलाएँ अपनी जान गँवा चुकी हैं। यह भयावह तस्वीर बताती है कि 21वीं सदी के कम्प्यूटर युग में भी दहेज लोभियों की कमी नहीं है। उत्तराखण्ड में साल 2010 में दहेज हत्या के 66 मामले दर्ज हुए जिसमें से अकेले उधम सिंह नगर के 20 केस थे।
तीसरा मामला हल्द्वानी शहर का है। दो मजदूर महिलाओं को पुरुषों ने बंधक बनाकर सरेआम पीटा और तब तक पीटा, जब तक वह बेहोश न हो गयीं। गनीमत थी कि जल्द ही पुलिस पहुँच गयी, नहीं तो पुरुषों की भीड़ उनके साथ क्या-क्या ज्यादती करती ? दरअसल हल्द्वानी की एक कम्पनी में निर्माण कार्य चल रहा था। दो महिला मजदूर भी राज-मिस्त्री के साथ मजदूरी कर रहीं थीं। इन दोनों पर आरोप लगा सरिया इत्यादि चोरी करने का। फिर क्या था मानवीय और कानूनी सीमाओं को लांघ कर मौजूद पुरुषों ने दोनों को पकड़ कर खंभे से बाँध दिया। इसके बाद शुरू हुआ उन्हें पीटने का सिलसिला। यदि महिला मजदूर चोर थीं तो उन्हें पुलिस के हवाले करना चाहिए था। सार्वजनिक तौर पर खंभे से बाँधकर मारने-पीटने का अधिकार आखिर पुरुषों को किसने दिया ? हम कौन से समाज में रह रहे हैं ? ऐसे अमानवीय अत्याचार महिलाओं पर आज भी ? आखिर कैसे कह दें कि हम स्वतन्त्र भारत में जी रहे हैं और सब कुछ ठीक-ठाक है ?
राज्य में महिला उत्पीड़न के आँकड़े
| 2008 | 2009 | 2010 | |
| हत्या | 48 | 31 | 43 |
| बलात्कार | 75 | 95 | 105 |
| शीलभंग | 109 | 123 | 121 |
| अपहरण | 179 | 203 | 229 |
| छेड़खानी | 358 | 313 | 213 |
| चैन-स्नैचिंग | 40 | 22 | 46 |
| दहेज-हत्या | 63 | 73 | 66 |
| अनैतिक-देह-व्यापार | 322 | 337 | 327 |
| नि0अधि | 04 | 07 | 06 |
| अन्य | 120 | 123 | 163 |