‘‘स्वराज्य के बाद, पिछले 30-32 वर्षों में केन्द्र और राज्य सरकारें पर्वतीय विकास पर अरबों रुपया खर्च कर चुकी है। खर्च होने वाली राशि प्रत्येक पंचवर्षीय योजना के साथ निरन्तर बढ़ती जाती है। परन्तु कहावत के अनुसार ‘जैसे जैसे दवा हो रही है, मर्ज बढ़ता जा रहा है।’ इसका मूल कारण है, विकास की गलत दिशा। पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाली हलचलों का प्रभाव केवल यहाँ के जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सारे देश को जल के द्वारा जीवन देने वाली गंगा, ब्रह्मपुत्र के मैदान पर भी पड़ता है, क्योंकि अधिकांश नदियों का उद्गम इन्हीं पर्वतीय क्षेत्रों में है। सन् 1978 में आई बाढ़ ने इस तथ्य को स्पष्टता से उजागर कर दिया है कि किस प्रकार हिमालय में विविध कारणों से होने वाले मृदा-क्षरण के कारण बाढ़ की विभीषिका तीव्र होती जाती है। मुख्य प्राथमिकता के रूप में स्थानीय जनों की दैनिक चारा, ईंधन, खुराक इत्यादि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पर्वतीय वनों का संरक्षण होना चाहिए। मोटर मार्गों के निरन्तर बढ़ते जा रहे जाल और विकास की गति के दूसरे उपकरणों को कम करना चाहिए। हर दिशा में स्थानीय स्वावलम्बन का प्रयास तथा छोटी लाभ निरपेक्ष स्थानीय उत्पादक सहकारी संस्थाओं का निर्माण होना चाहिए, जो स्थानीय मजदूरों के द्वारा स्थानीय आवश्यकता की पूर्ति करेगी। योजना बनाने से लेकर उसके कार्यान्वयन तक के कदम में स्थानीय जनता को भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए।’’
यह बात आज से लगभग 32 वर्ष पहले गांधी जी की अंग्रेज शिष्या सरला बहन ने कही थी। इस वक्तव्य के पीछे उनका सुदीर्घ अनुभव और गहन चिन्तन था। याद रहे सन् 1962 के भारत-चीन सीमा विवाद के बाद सुरक्षा के नाम पर उत्तराखण्ड में एकाएक नब्बे गुना सड़कें बढ़ीं। बाँज के पेड़ों को नीचे से डायनामाइट लगाकर उड़ाया गया। इसीलिये आज भी ऊँचाई वाले स्थानों पर बनी सड़कें थोड़ी सी वर्षा में धँस जाती है। एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। धारचूला से तवाघाट के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा की मुख्य सड़क अक्सर टूट जाती है। सन् 1978 में इसी क्षेत्र में भयंकर भूस्खलन हुआ था, जिसमें पलपला, स्याँकुरी, जुम्मा आदि गाँवों में जर्बदस्त हानि हुई और 44 लोग मारे गये। बाद में एक लम्बे आन्दोलन के बाद यहाँ के अधिकांश लोगों को सितारगंज में बसाया गया था। अभी भी यहाँ लगभग 90 डिग्री की ढलान पर चट्टानों में मिट्टी डालकर लोग आलू की खेती करते हैं, जो न व्यावहारिक है न लाभप्रद। मगर आज यहीं पेलागाड़ में धौलीगंगा विद्युत परियोजना बना दी गई है। फिर आपदा क्यों नहीं आयेगी ?
अल्मोड़ा के जिलाधिकारी मुकुल सनवाल द्वारा सत्तर के दशक में अल्मोड़ा में एक पंचायत सम्मेलन करवाया गया। उस सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कुमाऊँ विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति तथा प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. डी.डी. पंत ने पहाड़ में सड़कों के बजाय नहरों को महत्व देने की बात कही थी, ताकि जंगलों को अधिक से अधिक बचाया जा सके। लेकिन विभिन्न राजनैतिक दलों से जुड़े, जंगल काटने तथा सड़क बनाने की ठेकेदारी करने वाले सभी पंचायत प्रतिनिधियों ने तब डॉ. पंत के इस कथन का जबर्दस्त विरोध करते हुए उन्हें विकास विरोधी कह दिया था। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् चण्डी प्रसाद भट्ट का एक पत्र तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा द्वारा 5 अगस्त 1982 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भेजा गया था, जिसमें उत्तराखण्ड में प्रस्तावित बड़े जलाशयों एवं विद्युत परियोजनाओं को लेकर आगाह किया गया था। यह ध्यान दिलाया गया था कि अलकनंदा, भागीरथी एवं यमुना, टौंस, रामगंगा, काली, सरयू आदि के प्रवाह क्षेत्र में भूक्षरण, भूस्खलन एवं बाढ़ की स्थिति दिनों-दिन बिगड़ने और इनके प्रवाह क्षेत्र की अस्थिरता के कारण उत्तराखण्ड ही नहीं, सारा देश प्रभावित हो रहा है। प्रस्तावित परियोजाओं के द्वारा लाई गयी मिट्टी में जलाशयों के समय से पूर्व भर जाने की स्थिति में बाढ़ की आशंका व्यक्त की गई थी। बताया गया था कि सड़कों तथा विकास परियोजनाओं के लिये हो रहे वनों के बेतहाशा सफाये से जन-धन की व्यापक हानि हो रही है। विकास के लिए परियोजनाओं की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए भी विनाशरहित परियोजनाओं पर जोर दिया गया था। चण्डी प्रसाद भट्ट का यह पत्र 28 वर्ष के बाद भी प्रासंगिक है।
चूँकि आपदा के वास्तविक कारणों को छिपाने की कोशिश होती है, इसलिये न तो दुर्घटनाओं का सहीं आंकलन हो पाता है और न आपदा प्रबंधन। पिछले वर्ष सुमगढ़ में सरस्वती शिशु मंदिर में 18 बच्चे दब कर मरे थे। देश की संसद ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी, यह कहते हुए कि यह दुर्घटना बादल फटने से हुई। जबकि कारण था स्कूल के भवन की दीवार का कच्चा होना तथा पास में बहने वाली सरयू नदी में विद्युत परियोजना के लिये सुरंग का बनना। सही कारण छुपाना ही था, क्योंकि स्कूल सत्तारूढ़ दल का था व इलाका पूर्व मुख्यमंत्री का। इस क्षेत्र में अधिकांश राजनीतिक नेता या तो खडि़या खनन करते हैं या परियोजना में ठेकेदारी। चुनाव के समय ये कंपनिया चन्दे के रूप में बड़ी रकम देती हैं।
उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद आपदायें बढ़ गई हैं, क्योंकि अब नेता बढ़ गये हैं तो परियोजनायें भी बढ़ी हैं और ठेकेदार भी। आपदायें बढ़ी हैं तो राहत में कमीशन भी बढ़ा है। यहाँ प्रकृति का बहुत बड़ा भण्डार है, जिसे लूटने की आजादी है। आजादी से पूर्व या उसके तत्काल बाद वनों को लूटने का धंधा एकमात्र था। आज तो जल, जंगल, जमीन, खनिज को लूटने के बहुत सारे तरीके हैं। पिछले वर्ष हल्द्वानी में गौला से रेता निकालने में पर्यावरण मंत्रालय ने रोक क्या लगाई, सारे राजनैतिक दल विरोध में एकजुट हो गये। कुछ वर्ष पूर्व गौला का पुल धराशायी हो गया था, क्योंकि इस माफिया ने उसकी जड़ तक खोद डाली थी। गौला में खुदाई बड़ी-बड़ी मशीनों से होती है। कोई रोकने वाला नहीं। इस बरसात में लालकुआँ से आगे रेल का आना ही बंद हो गया, क्योंकि गौला रेल की लाइन को काटने लगी।
इस रफ्तार से रेता, बजरी निकालने पर कभी गौला हल्द्वानी बाजार को लीलने आ जायेगी। फिर कहा जायेगा कि प्राकृतिक विपदा आ गई। इस रेता-बजरी ने हल्द्वानी को अपराधों का गढ़ बना दिया है। अपराधी विभिन्न राजनैतिक दलों में घुस कर हल्द्वानी के भाग्यनियंता बन गये हैं। सारे संस्थानों पर उनका कब्जा हो गया है। जहाँ गेहूँ लहलहाते थे, वहाँ आज बजरी के पहाड़ खड़े हैं। अल्मोड़ा में पहले गर्मियों में पानी का संकट होता था। अब बरसात में यह संकट होता है, क्योंकि कोसी में रेता निकालने की खुली छूट है। वर्षा होने पर खोदी गई रेत पानी के पम्पों में भर कर उसे चोक कर देती है। बादल फटने की बात आजकल अक्सर कही जाती है। अब यहाँ पानी की रफ्तार को रोकने वाले पेड़ नहीं बचे। अधिकांश सड़कें आजकल हल्की बरसात में ही बंद हो जाती है। राज्य बनने के बाद जेसीबी मशीनों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। ठेकेदार मजदूरों से नहीं, जेसीबी से कार्य करा रहे हैं। जेसीबी चलाने के लिए बने नियम कानूनों का पालन नहीं होता, क्योंकि अधिकांश ठेकेदार राजनैतिक दलों से जुड़े हैं। अभी कुछ माह पहले नैनीताल जनपद में जेसीबी मशीन चलाकर एक दलित के मकान को ढहाकर पाँच लोगों को जिन्दा दफ्न कर देने वाले प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्रवाही नहीं हुई है। दलितों के नाम पर राजनीति व धंधेबाजी करने वाले भी चुप हैं और मीडिया भी। फिर पुलिस-प्रशासन क्यों हाथ-पाँव हिलाये ? उत्तराखण्ड में बन रही 558 जल विद्युत परियोजनाओं में करोड़ो की मशीनें लाकर सुरंगें बनायी जा रही हैं और पहाड़ों को बर्बाद किया जा रहा है। प्रसिद्ध भू वैज्ञानिक खड्ग सिंह वल्दिया कहते हैं, ‘‘विकास के नाम पर जो कार्य हुए उनके क्रियान्वयन में प्रकृति के तंत्रों से छेड़छाड़ होती रही, पर्यावरण पर प्रहार पर प्रहार हुए……नैसर्गिक संतुलन बिगड़ने के कारण आपदाओं का होना नितांत स्वाभाविक है…..अब ऐसी स्थिति आ गई है कि जरा सी छेड़छाड़ करें तो प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला शुरू हो सकता है।‘‘
पिछले वर्ष की आपदा राहत के लिये आया 500 करोड़ रुपया राजनैतिक दलों के लिए वरदान बन गया। सबसे अधिक प्रभावित जनपदों में से एक अल्मोड़ा में आपदा राहत के 18 लाख रुपये से जिलाधिकारी कार्यालय का सौदर्यीकरण किया गया, 5 लाख रुपये खर्चकर 1.5 किमी. दूर से पानी की पाइप लाइन कचहरी तक लाई गयी, ताकि जिलाधिकारी आवास में 24 घंटे पानी चलता रहे। उधर कुमाऊँ की लाइफ लाईन माना जाने वाला हल्द्वानी-अल्मोड़ा सड़क मार्ग करोड़ो रुपया खर्च होने के बाद भी नहीं बन पाया है। ऐसे हाल पूरे उत्तराखण्ड की सड़कों के है। देहरादून में रहने वाले नेता व नौकरशाहों को इस बात की चिंता ही नहीं रहती कि दूरस्थ क्षेत्रों में लोग कैसे जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
सत्तर के दशक में चले वन आन्दोलन (चिपको) के दौर में उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी द्वारा वितरित पत्रक में कहा गया था, ‘‘पेड़ो का पहला फायदा गाँव में रहने वाले यानी वनवासियों को होना चाहिए। अब तक वनों को दूध देने वाली गाय समझा गया। वनों का फायदा दूर से आने वाले कसाइयों, यानी बड़े-बड़े ठेकेदारों को मिलता रहा। इन लोगों ने जंगल की पीड़ा नहीं समझी और बेरहमी से पेड़ काटते रहे। जहाँ पचास पेड़ काटने थे, वहाँ सौ काटे। जहाँ हजार काटने थे, वहाँ दो हजार काटे। हम टकटकी लगाकर देखते रहे। कभी इसका विरोध नहीं किया।‘‘ आज तो उत्तराखण्ड के पेड़ ही नही जल, जंगल, जमीन भी लूटे जा रहे हैं। इस पत्रक को छपे 30 वर्ष से अधिक हो गये है। हम आज भी टकटकी लगाये देख रहे हैं और लूट से हुई आपदा को दैवी आपदा कह रहे है। इसी पत्रक में यह भी लिखा है, ‘‘लेकिन कुछ बनवासी फिर भी नहीं जागे। पेड़ काटते रहे। कहीं जमीन धँसती रही, कहीं गाँव उजड़ते रहे। अचानक फिर पिछले साल बरसात में तवाघाट बहने से आँखें खुलीं। वनवासियों ने कहा कि अब हमारी हड्डियाँ मत बेचो। हमारी खाल मत उधेड़ो। ऐसा कहने पर वनवासियों को नैनीताल में गोलियाँ खानी पड़ीं।‘‘ उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद तो आँखे पूरी बंद हो गई हैं। अब तो प्राकृतिक लूट की तरफ देखने का सवाल ही नहीं है, क्योंकि अब अपने लोग ही लुटेरे बन गये है, जो संसद-विधानसभाओं से लेकर पंचायतों तक में जमे है। नौकरशाही इन लुटेरों की मदद कर रही है। इस लूट के कारण ही उत्तराखण्ड प्राकृतिक विपदाओं से घिरा है। इस राजनीति को पूरी तरह बदले बगैर ये विपदायें भी नहीं रुकेंगी।