प्रस्तुति : डी.एस.रावल
‘भारत की लोक जिम्मेदार पार्टी’ के संस्थापक व भूतपूर्व आई.ए.एस. डी. एस.रावत का 28 अप्रेल 2008 को निधन हो गया। वे हैदराबाद में रेलवे में कार्यरत अपनी बड़ी लड़की अधिकारी स्मिता रावत के पास उपचार हेतु रह रहे थे। ग्राम मंझाकोट, पट्टी रावतस्यों, जिला पौड़ी के मूल निवासी धर्म सिंह रावत का जन्म 28 सितम्बर 1930 को शिमला (हिमाचल प्रदेश) में हुआ। तब उनके पिताजी रेडक्रॉस सोसाइटी में सेवारत थे। प्रारम्भिक शिक्षा शिमला व दिल्ली में प्राप्त करने के बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1953 में अंग्रेजी से स्नातकोत्तर और 1955 में नई दिल्ली पंजाब विश्वविद्यालय से इतिहास में तथा 1973 में पालिटिक्स साइन्स (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) से स्नातकोत्तर किया। 1953 में प्रान्तीय सिविल सेवा में नियुक्ति के पश्चात एक नौकरशाह की भाँति जीवन जीने के साथ वे शासनतंत्र को समझने की कोशिश करने लगे। सीधे-सरल स्वभाव के डी.एस.रावत को एक बार एक पुलिस दारोगा द्वारा ट्रक ड्राइवर समझ झापड़ मारने के बाद तंत्र की जड़ों को गहराई से समझने में मदद मिली। 1954 में वे पी.सी.एस. संघ के अध्यक्ष चुने गए। 1962 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने के दौरान देश में आपातकाल की स्थिति बनी थी और देशभक्त लोगों का सैनिक सेवा में आने का आह्वान किया गया था तब रावत जी एस.डी.एम. (वेतनमान रु० 800 प्रति माह) पद से लेफ्टिनेंट (वेतनमान 400 प्रति माह ) पद पर ऑन डेपुटेशन चले गए। चार वर्ष तक पूर्वी सीमा (अब अरुणाचल प्रदेश) में काम कर वे पुनः एक प्रशासक के रूप में कार्य करने लगे। वे प्रशासनिक सेवा को प्रजातांत्रिक मूल्यों पर चलने की सलाह देते रहे। आपातकाल के दौरान खुले मंच से इस तरह की सलाह देने से तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी उनसे काफी दुःखी हुए थे। 1981 में यूनाइटेड नेशन्स डेवलपमेंट एण्ड प्लानिंग में उनको सलाहकार बनाया गया।
धर्म सिंह रावत प्रशासनिक कार्यप्रणाली में दायित्वहीनता एवं पारदर्शिता के अभाव से अत्यन्त दुःखी थे। 1986 में जब उनके पत्रों का जवाब मुख्यमंत्री ने नहीं दिया तो उन्होंने लखनऊ कार्यालय से ही भूख हड़ताल शुरू कर दी। स्वार्थी अधिकारी इन्हें पागल घोषित करने लगे। घर में चोरियाँ करा हतोत्साहित किया गया। लेकिन उन्होंने संघर्ष जारी रखा। प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान, मसूरी के आई.ए.एस. प्रशिक्षणार्थियों ने 1988 में इनके पक्ष में प्रस्ताव पारित किया। उस दौरान इनके दायित्वशील प्रशासन की अवधारणा को मीडिया ने काफी स्थान दिया। इस बीच इन्हें सेवा से भी निलम्बित किया गया।
पौड़ी लोक सभा सीट से 1991 में जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़कर धर्म सिंह रावत ने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की। 300 से 350 कि.मी. क्षेत्र में फैली इस सीट पर अपने स्कूटर से 17 दिन तक प्रचार किया और 45,000 मत प्राप्त किये। चुनाव में कुल खर्च 65 हजार हुआ तो बाकी 60 हजार रुपया पार्टी को लौटा दिया। उनकी सोच थी कि चुनाव कम से कम खर्च में लड़ा जाये, ताकि आम आदमी भी चुनाव लड़ सके। राजनीतिक मूल्यों में आ रही गिरावट को देख रावत जी ने जनता दल छोड़ दिया। 6 जून 1996 को ‘भारत की लोक जिम्मेदार पार्टी’ का गठन कर चुनाव आयोग से पंजीकृत कराया। सबसे पहले महिला उम्मीदवार कटोरी देवी को 1998 में लखनऊ लोक सभा सीट पर अटल बिहारी बाजपेयी के खिलाफ खड़ा किया। नामांकन के समय प्रशासन के व्यवहार से क्षुब्ध होकर विरोध किया तो भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनके साथ मारपीट की। तत्कालीन मुख्यमंत्री के दबाव में उन पर झूठा मुकदमा दायर किया गया और 72 दिन जेल में रखने के बाद अपनी गलती माने बिना, उन्हें ससम्मान रिहा किया।
धर्म सिंह रावत ने ‘दायित्व शील प्रशासन’ की अवधारणा को लेकर 1998 को कन्याकुमारी से हैदराबाद तक करीब 1400 किमी. की पदयात्रा की और 1999 में 6000 कि.मी. की यात्रा स्कूटर के द्वारा। वे विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के सदस्य व सलाहकार रहे। 1999 में आई.ए.एस. अधिकारियों के पंजीकृत ऐक्शन ग्रुप के सचिव बने। 1975 में जब वे प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान नैनीताल में रहे तो नौकरशाहों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए उन्होंने अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाये। उन्होंने चपरासी से लेकर उच्च अधिकारी व मंत्री तक के एक साथ मिलकर कार्य करने की प्रणाली प्रारम्भ की। यह उनका नया प्रशासनिक शोध विषय था।
उत्तराखण्ड के साथ भावनात्मक लगाव होने के कारण उन्होंने राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान पुलिस प्रशासन द्वारा किए गए अत्याचार के विरोध में श्रीनगर-गढ़वाल व लखनऊ में भूख हड़ताल की। उनका मानना था कि अधिकांश नौकरशाह जनसेवक की भावना से कार्य नहीं करते, बल्कि जनता के प्रति किए गये कार्य को अहसान समझते हैं। जबकि देश की असली मालिक जनता है। नौकरशाहों को कार्यों का ब्यौरा खुले रूप में जनता को देना चाहिए, तभी सच्चा लोक तंत्र स्थापित होगा। नौकरशाह एवं राजनेताओं की आपस में मिलीभगत से ही राजकोष का दुरुपयोग होता है।
Truly he waz one of the greatest so called “system manager” of our country..Inspite of so much havoc created on him he continued for a transparent and responsible goverment…..undoubtedly he iz my idol..my mentor…