छात्र राजनीति में बढ़ती गुंडागर्दी पर गत 7 सितम्बर को सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी कीमत पर विश्वविद्यालय, महाविद्यालय परिसरों में अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं होगी। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव पर दो छात्रों ने याचिका दायर कर कहा था कि चुनाव से पहले ही विश्वविद्यालय परिसर का माहौल बिगाड़ दिया गया है लिहाजा इस पर रोक लगाई जानी चाहिये। न्यायाधीश अरिजित पसायत और न्यायाधीश पी. सदाशिवम ने कहा कि छात्रों की अनुशासनहीनता पूरी दिल्ली में दिखाई दे रही है। यह सब अब नहीं चलेगा। आज छात्र पूरी तरह नेता बन गये हैं और पार्टटाइम ही छात्र रह गये हैं। इस स्थिति को नहीं बदला गया तो हमें विश्वविद्यालयों में गुंडागर्दी और दादागिरी का नया पाठ्यक्रम चलाना होगा।
सर्वोच्च न्यायालय की यह तीखी टिप्पणी भले ही दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव के संघ में आई हो, लेकिन छात्र राजनीति का यही विद्रूप चेहरा डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून के छात्र संघ चुनाव में तब सामने आया, जब 24 अगस्त को डी.ए.वी. छात्रसंघ का चुनाव परिणाम आने के बाद छात्रों की गुंडागर्दी का नंगा नाच पूरे शहर ने देखा और भोगा। छात्रों ने पेट्रोल पम्पों को लूटा और इसी गुंडागर्दी का विरोध करने पर मेहूवाला में छात्रों और ग्रामीणों के बीच जमकर मारपीट भी हो गयी। बात यहीं तक रहती तो गनीमत थी। उसी दिन देर रात को नवनिर्वाचित छात्र संघ के अध्यक्ष जितेन्द्र रावत उर्फ मोनी को पुलिस ने चार छात्रों के साथ एक होटल में मारपीट करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।
डी.ए.वी. के नवनिर्वाचित अध्यक्ष के गिरफ्तारी की खबर जैसे ही फैली कोतवाली में भाजपा नेताओं का जमावड़ा लगने लगा और छात्र नेताओं को बिना शर्त रिहा करवाने के प्रयास होने लगे। छात्र संघ अध्यक्ष का सम्बन्ध विद्यार्थी परिषद से होने के कारण सत्ता का दबाव पड़ा, लेकिन कोतवाल महेन्द्र सिंह नेगी ने झुकने से इंकार कर दिया। दूसरे दिन 25 अगस्त को फिर सवेरे से ही भाजपा नेताओं ने सत्ता का दबाव बनाना शुरू किया तो छात्र संघ अध्यक्ष को साथियों सहित जमानत पर रिहा कर दिया गया। इसके बाद छात्रसंघ कोतवाल के निलम्बन की माँग पर अड़ गया। पूरे शहर में स्थान-स्थान पर प्रदर्शन और चक्का जाम किया जाने लगा। इसके बाद तो इस प्रकरण ने पूरी तरह से राजनैतिक रंग ले लिया। पूरा शहर राजनैतिक रूप से दो हिस्सों में बँट गया। जहाँ भाजपा नेता कोतवाल नेगी पर यह आरोप लगाते हुए कि उन्होंने छात्र नेताओं के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया है, उनके निलम्बन की माँग करने लगे, वहीं कांग्रेस और विपक्षी दलों ने कोतवाल का निलम्बन किये जाने पर आंदोलन की धमकी दे डाली।
विपक्ष के तेवरों को देखते हुए जब कोतवाल का निलम्बन नहीं हो पाया तो 27 अगस्त को अ.भा.वि.प. ने पूरे गढ़वाल मंडल में शैक्षणिक बन्द करवाया। छात्रों की गुंडागर्दी के खिलाफ 29 अगस्त को व्यापारियों और पेट्रोल पम्प मालिकों ने बंद रखा। लगभग एक हफ्ते तक निलम्बन के पक्ष और विपक्ष की राजनीति होती रही। इस प्रकरण में सबसे अफसोसजनक पहलू यह है कि सत्ता पक्ष से जुड़े किसी भी नेता ने छात्रों की गुंडागर्दी का विरोध नहीं किया। वे यही जतलाने की कोशिश कर रहे थे कि यह उम्र ही ऐसी है। स्वच्छ प्रशासन देने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री खंडूरी तक छात्र नेताओं के साथ पुलिस की सख्ती पर नाराज हुए। उन्होंने छात्रों की लूटपाट और पुलिसकर्मियों से की गई हाथापाई को एक तरह से जायज ठहराते हुए कहा कि छात्रों ने ऐसा कोई संगीन अपराध नहीं किया था कि पुलिस उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार करती। पुलिस छात्रों को केवल चेतावनी देकर छोड़ सकती थी। अब छात्रों को गुंडागर्दी करने की पूरी छूट सत्ता प्रतिष्ठान से ही मिल जाये तो फिर और क्या चाहिये ?
छात्रों की इस गुंडागर्दी के लिये एक तरह से डी.ए.वी. कॉलेज प्रशासन भी कम जिम्मेदार नहीं है। कॉलेज प्रशासन ने लिंगदोह समिति की रिपोर्ट के अनुसार कॉलेज में चुनाव करवाने में कोई रुचि नहीं दिखाई, जबकि देहरादून ओर प्रदेश के दूसरे कॉलेजों में प्रशासन ने लिंगदोह समिति की रिपोर्ट को सख्ती के साथ छात्र संघ चुनाव में लागू किया। डी.ए.वी. में अराजकता नामांकन के दिन से दिखाई दे रही थी और कॉलेज प्रशासन ने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। उससे यह आशंका पहले से ही लगाई जा रही थी कि इस बार चुनाव में कोई न कोई अनहोनी जरूर होगी। चुनाव परिणाम आने के दिन कॉलेज गेट के बाहर पुलिस के सामने ही छात्रनेता दिनदहाड़े शराब पीते रहे। प्रशासन ने यदि छात्रों पर वहीं लगाम लगाई होती तो वे बाद में शायद इतना हुड़दंग नहीं मचाते।