उत्तराखण्ड की विधानसभा के बजट सत्र को प्रत्यक्ष देखने पर अत्यन्त निराशा और आक्रोश तो हुआ ही, संसदीय लोकतंत्र की निस्सारता भी महसूस हुई। आखिर हमारे विधायक वही कर रहे थे जो उन्होंने लोकसभा अथवा अन्य प्रदेशों की विधान सभाओं से सीखा था। राज्यपाल के अभिभाषण को फाड़कर चिन्दियाँ हवा में उड़ाना, बजट भाषण पर लगातार शोरगुल करते रहना, बार-बार स्पीकर के वेल पर धरना देकर बैठ जाना……..यह सब हमारी विधायिकाओं में आम हो गया है। सत्ता पक्ष भी इसे इतने हल्के ढंग से लेता है कि इस तमाम हो-हुल्लड़ के बावजूद यदि कभी प्रश्नोत्तर का वक्त निकल भी आया तो मंत्री सवालों के जवाब गोल-मोल ढंग से देते हैं। एक आम नागरिक सूचना का अधिकार कानून के तहत इससे बेहतर जानकारियाँ प्राप्त कर सकता है।
लेकिन इस ‘पार्लियामेंटरी डेमोक्रेसी‘ जिसे महात्मा गांधी ने 100 साल पहिले ही ‘बाँझ और बेसवा‘ घोषित कर दिया था, को बुनियादी रूप से बदलने की बात कभी नहीं कही जाती। क्या इसलिये कि हमारे सांसद और विधायक कॉरपोरेट हितों की रक्षा के लिये बेहद उपयोगी हैं ?