अर्द्धसैनिक बल सरकार से खफा हैं। आईटीबीपी, बीएसएफ, असम राईफल्स, सीआरपीएफ जैसे सैन्य बलों का भारतीय रक्षा सेवा में महत्वपूर्ण स्थान है। इनके 12 लाख से भी अधिक जवान कहीं 20 हजार फीट से अधिक ऊँचाई पर शून्य से 30 डिग्री नीचे तो रेगिस्तान में तपती रेत पर वे सीमाओं की रक्षा करते हैं। तमाम तरह की आपदाओं से निपटने का जिम्मा भी इन बलों के हिस्से है। भारत सरकार खुद मानती है कि बीते पाँच सालों में ही 8 हजार से अधिक जवानों ने अपना कर्तव्य करते हुए शहादत दी। युद्ध और आन्तरिक सुरक्षा के अतिरिक्त औद्योगिक क्षेत्रों में भी इन बलों के जवान अपनी उत्कृष्ट सेवायें देते हैं। खेल, पर्वतारोहण, साहसिक यात्राओं आदि में भी इनका गौरवमय इतिहास है।
इस सबके बावजूद केन्द्र सरकार की ओर से इनके साथ सौतेला व्यवहार होता है। तीसरे वेतन आयोग तक अर्द्धसैनिक बल के जवान को सेना के जवान से 15 रुपए अधिक मिलते थे। आज सेना का जवान अर्द्ध सैनिक बल के जवान से 2370 रुपए अधिक ले रहा है। सेना के जवान को वेतन का 70 प्रतिशत पेंशन में दिया जाता है तो वहीं अर्द्ध सैनिक बल में 50 प्रतिशत। सेना का जवान सेवानिवृत्ति के बाद डीएससी में फिर से अपनी सेवाएँ देता है, मगर अर्द्धसैनिक बल का जवान नौकरी के बाद केवल पेंशन पर निर्भर है। अनुमानतः 11 हजार से अधिक पूर्व अर्द्ध सैनिक इस नीति की मार झेल रहे हैं। उन्हें सबसे बड़ी आपत्ति तो इस बात पर हैं कि समान सेवा और योग्यता के बाद भी क्यों उन्हें अर्द्धसैनिक कहा जाता है ? क्यों उन्हें एक्ससर्विस मैन नहीं माना जाता ? उत्तराखण्ड पूर्व अर्द्धसैनिक कल्याण समिति के प्रदेश पदाधिकारी रूप सिंह बिष्ट के अनुसार ‘ऑल इण्डिया सेंट्रल पैरामिलिट्री फोर्सेस सर्विसमैन वैलफैयर एसोशिएसन’ के बैनर तले लड़ाई चल रही है। संगठन ने सरकार के समक्ष अपनी 23 प्रमुख माँगो को रखा है। कैंटीन व रम आदि की माँग बीते जुलाई में पूरी हुई है। अब पूर्व अर्द्धसैनिक व उसके परिवार को कैंटीन सुविधा मुहैया हो सकेगी। इसके अतिरिक्त एक रैंक एक पेंशन के दायरे में उन्हें लाने, बच्चों को सैनिकों की भाँति आरक्षण देने, जिलों में सैनिक कल्याण बोर्ड की भाँति सम्मान देने, पुनः रोजगार देने, आर्म फोर्स ट्रिब्यूनल की स्थापना, पृथक्क मंत्रालय की स्थापना आदि अन्य माँगों पर बातचीत चल रही है।