राज्य में गठित आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण इकाई ने इन दस सालों में जो एकमात्र काम किया, वह था दो सौ गाँवों को भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील घोषित करना। मगर यह तंत्र आपदा के मुहाने में बसे गाँवों के लिए कोई कारगर योजना नहीं बना पाया और जमीन का प्रबंध न हो पाने से लाचार बना रहा। वन कानूनों की कठोरता और केन्द्र सरकार से फरियाद के बीच ये गाँव खतरनाक बने रहे। उधर सरकार केवल बचाव व राहत के लिए जागरूकता और टेलीफोन सुविधायुक्त नियंत्रण कक्षों को ही आपदा प्रबंधन मानती रही है। लेकिन हर साल ही सैकड़ों लोगों का जीवन आपदा की भेंट चढ़ता है और करोड़ों-करोड़ रुपयों का नुकसान हर साल प्रदेश को झेलना पड़ रहा है। दुर्घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने की बात हो या आपदा की मार खाये लोगों के लिए राहत पहुँचाने की तात्कालिक व्यवस्था, प्रदेश का आपदा प्रबंधन तंत्र लाचार ही नजर आता है। बरसात से पहले जिस जोशोखरोश के साथ शासन-प्रशासन जुटा रहता है वह वास्तविक आपदा के समय कहीं दिखाई नहीं देता। इस बरसात में भी तमाम संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोग खौफ व दहशत के साए में जी रहे हैं। भूस्खलन की चपेट में आ चुके ग्रामीण राहत कैंपों में शरण लिए आने वाले कल के लिए चिन्तित है। जनता ने राज्य सरकार से अपेक्षा पाल रखी है और राज्य सरकार केन्द्र का मुँह ताकती दिखाई देती है। नेताओं के घडि़याली आँसू साल भर जारी रहते हैं। कहने को तो जनपदों में आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ, सैटेलाइट फोन, पृथक आपदा प्रबंधन टास्क फोर्स हैं, लेकिन वास्तविकता में यह कार्यक्रम लोगों को बचाव और राहत देने में असफल साबित हो रहे हैं।
जब-जब राज्य में आपदाएँ आई, तब-तब सरकार मुँह बाये खड़ी रही। बचाव व नियंत्रण का काम पिछड़ा रहा और आपदा राहत कोष निष्प्रभावी साबित हुआ। मालपा, जमतड़, बालगंगाघाटी, खेतगांव, खेहार, हयूगाड़, ऊखीमठ, फांटा की सूची में अब कई दर्जन नए नाम जुड़ चुके हैं।