पुरुषोत्तम शर्मा
उत्तराखण्ड आपदा एवं पुनर्वास नीति 2011’ एकदम निराशाजनक है। इसमें भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करने के लिए आधुनिक सूचना तकनीकी का अधिकतम इस्तेमाल और आपदा पीडि़तों के स्थायी पुनर्वास के साथ उनके पुश्तैनी रोजगार की सुरक्षा के मुद्दे अहम होने थे। अखिल भारतीय किसान महासभा द्वारा इस बात पर राज्य सरकार को ज्ञापन भेजे गये और कई मंचों से इसे उठाया गया। मगर राज्य सरकार की नीति में ये दोनों मुद्दे नदारद हैं। इस नीति के अनुसार पुनर्वासित होने वाले सभी गाँवों व परिवारों को राज्य सरकार लगभग एक नाली आवासीय भूमि व तीन लाख रुपये आवास निर्माण के लिए देगी। इसके बाद खाली कराये गये गाँवों व लोगों की कृषि व आवासीय भूमि का सर्किल रेट से मुआवजा दे कर अधिग्रहण कर उस जमीन को राज्य के खाते में डाल देगी, ताकि पुनर्वासित लोग फिर कभी अपनी उस भूमि का उपयोग न कर सकें। इन गाँवों की वन पंचायतें, बेनाप, बंजर जमीन व चारागाह, जिनका उपयोग लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों व रोजगार के लिए करते थे, स्वतः ही सरकार के कब्जे में चले जायेंगे। हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कृषि व पशुपालन ग्रामीणों का पुश्तैनी रोजगार और आजीविका का मुख्य साधन है, जिसे इस नीति के जरिये छीन कर सरकार ने आपदा पीडि़तों को भुखमरी के लिए छोड़ दिया है।
इस नीति में मौसम विज्ञान पर आधारित नई तकनीक का इस्तेमाल कर आपदा के सम्भावित खतरों की पूर्व सूचना का तंत्र विकसित करने के लिए कोई योजना नहीं है। राज्य में आज तक प्राकृतिक आपदा से तबाह हुए लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ है। 23 गाँव वर्षों से पुनर्वास के इंतजार में पड़े हैं और पिछले साल की अतिवृष्टि के बाद लगभग 25 और गाँव इस लाइन में आ गये हैं। राज्य सरकार जमीन न होने का रोना रोकर इन गाँवों का पुनर्वास रोके हुए है। सिडकुल, एस.ई.जेड., ट्रस्टों, धार्मिक संस्थाओं, कम्पनियों और उद्योगपतियों को देने के लिये हजारों एकड़ जमीन है, मगर आपदा से प्रभावित ग्रामीणों के लिये नहीं। पहाड़ की 18 प्रतिशत बेनाप भूमि सन् 1893 के शासनादेश के प्रावधानों के तहत रक्षित वन भूमि की श्रेणी में पड़ी है। उसे उस श्रेणी से निकालने के कोई ठोस प्रयास राज्य सरकार नहीं कर रही है। इस जन विरोधी आपदा एवं पुनर्वास नीति का विरोध किया जाना चाहिए और प्राकृतिक आपदा से पीडि़त परिवारों की पुश्तैनी आजीविका की गारण्टी के लिए उन्हें आवास के बदले आवास, कृषि भूमि के बदले कृषि भूमि और वन पंचायत व चारागाह क्षेत्र के बदले वन पंचायत व चारागाह उपलब्ध कराया जाना सुनिश्चित होना चाहिए।