खुशी राम शर्मा
सम्पूर्ण भारत से अलग जोनसार-बाबर व सिरमौर में दीपावली का त्यौहार मनाने का विशिष्ट तरीका है। यहाँ बाकी देश से एक माह बाद दीवाली मनाई जाती है। किंवदन्ती है कि अयोध्या यहाँ से बहुत दूर होने के कारण भगवान रामचन्द्र के राज्याभिषेक का समाचार यहाँ एक माह बाद पहुँचा। लेकिन यह तर्क ज्यादा ठीक लगता है कि कार्तिक माह में फसल की कटाई और बुआई होने के कारण लोग बहुत अधिक व्यस्त रहते हैं। इसलिए एक माह बाद मंगसीर में यह त्योहार मनाते हैं। अमावस (अमावस्या) की रात्रि को सभी नर-नारी गाँव से कुछ दूर ’होला’ (मक्का) का पुंज तो कहीं पर लकड़ी का पुंज जलाते हैं। पांडवों तथा लोक देवता महासू के गीत गाये जाते हैं। पुरुष, खासकर बच्चे ’होलड़ा’ (होला) लेकर खेत के आस-पास हाथ में लेकर घुमाते हैं। दूसरे दिन गाँव के पुरुष गेहूँ, जौ की उगाई हरियाली लेकर आँगन में उतरते हैं। सर्वप्रथम औरतें कुल देवता को गोमूत्र व गंगाजल चढ़ाते हैं। इसके बाद पुरुष कान में हरियाली लगाते हैं और फिर नर-नारी आँगन में गीत गाते हैं। इस दिवस को ’भिरुड़ी’ कहते हैं।
आपसी वैमनस्य और मतभेद भुलाकर जौनसारी नर-नारी एक-दूसरे के घर जाकर, गले से गले मिलकर अखरोट, मुवड़ा (गेहूँ को उबाल कर) तथा चिवडे़ (चावल उबले व कुटे हुए) का आदान-प्रदान करते हैं। सात दिनों के इस पर्व के अन्तिम दो दिनों में किसी गाँव में हिरण व हाथी बनाकर गाँव का स्याण बैठकर नाचता है। टोंस नदी की सीमा से लगे सिरमौर जिले में भी दीवाली मनाने की यह परम्परा है। उत्तरकाशी के अनेक हिस्सों में भी इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाता हैं।
युवा पीढ़ी अब इस परम्परागत पर्व को मनाने में संकोच व शर्मिंदगी महसूस करती है। दफ्तरों व स्कूलों में छुट्टियाँ भी शहरी दीवाली पर होने के कारण उसे ही सर्वोपरि माना जाने लगा हैं। कहीं-कहीं पर अब भी दीवाली का बाँटा ( अखरोट, चिवडे़ व मुवड़ा) ससुराल गई लड़कियों को भेजने की परम्परा है, लेकिन अब वह टूट रही है। पहले ससुराल गई लड़कियाँ बेसब्री से इस मौके का इन्तजार करती थीं। अब पढ़-लिख जाने के बाद वे इसे ज्यादा महत्व नहीं देतीं। शायद समय के साथ यह बदलाव स्वाभाविक है। मगर सच्चाई यह है कि हम कितनी ही ऊँचाइयाँ क्यों न छूँ लें, अपनी पहचान तो अपनी ही सांस्कृतिक परम्पराओं से ही होती हैं। युवा पीढ़ी को इस धरोहर को युग-युगों तक सम्भालकर रखना चाहिए।
शर्मा जी,
जोनसार और सिरमौर की दीवाली अब इतिहास ही बन गया है, आज की युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ने में खुद की तौहीन समझती है, जरूरत है इसे बदलने की, हमें याद रखना चाहिए कि हम जिस थाती से जुड़े हैं, जो सांस्कृतिक परंपरा हमारी हैं उन परंपराओं और तीज त्योहारों को सामूहिक रूप से मनाने की शुरूआत करें। ताकि इससे हम अपनी आने वाली पीढ़ी को भी इनसे जोड़ सकेंगे। आपका लेख ज्ञानवर्धक और जानकारी पूर्ण है। इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं।
जय उत्तराखंड़